Kota Factory Season 3 Review: कोटा की विज्ञापन फिल्म में बदली नेटफ्लिक्स सीरीज, इनके लिए मिडिल क्लास माने...
जैसे इन दिनों फिल्म और वेब सीरीज के तमाम ‘क्रिटिक’ अपने पाठकों के लिए लिख रहे हैं या सितारों, निर्माताओं या ओटीटी के लिए, उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा है। कुछ कुछ वैसे ही टीवीएफ को भी ये समझ नहीं आ रहा है कि ‘पंचायत’, ‘गुल्लक’ और ‘कोटा फैक्ट्री’ जैसी वेब सीरीज वह लोगों को डराने के लिए बना रहे हैं, उन्हें जिंदगी के संघर्ष से रोमांस करने के लिए बना रहे हैं या फिर कोई और ही एजेंडा है इन सीरीज का जो आम दर्शकों को समझाने से वह कतरा रहे हैं। ‘पंचायत’ के तीसरे सीजन में राष्ट्रीय विकास की पहली इकाई ग्राम पंचायत के कामकाज को लेकर इस बार कुछ नहीं है। ‘कोटा फैक्ट्री’ में भी उस बात को लेकर कोई आवाज नहीं है जिसके चलते एक शहर के नाम के साथ फैक्ट्री जैसा शब्द जुड़ चुका है।
साल 2019 में आया था ‘कोटा फैक्ट्री’ का पहला सीजन। तब से मयूर मोरे, रंजन राज, आलम खान, अहसास चानना और रेवती पिल्लई सब पांच पांच साल बड़े हो चुके हैं। बेचारों को कितनी तकलीफ होती होगी, उसी मानसिक स्तर पर अभिनय करने की जिस स्तर पर वह बीते पांच साल से लगातार करते आ रहे हैं। किशोरवय ये लगते नहीं। जवान उन्हें सीरीज बनाने वाले दिखने नहीं देना चाहते। और, इसी दुविधा में फंसकर रह गई है ‘कोटा फैक्ट्री’ के सीजन 3 की कहानी। ये सही बात है टीवीएफ की इन दिनों बन रही बाकी सीरीज को भी देखें तो सबमें गुडी गुडी फीलिंग है। मिडिल क्लास की ठुड्डी सहलाते कलाकार हैं। उसको मुन्नाभाई सरीखी जादू की झप्पी देने की भी कोशिश है लेकिन फिर क्या? क्या वाकई देश ऐसे ही चल रहा है। क्या वाकई ‘कोटा फैक्ट्री’ सीरीज राजस्थान के कोटा शहर में रोज हो रही आत्महत्याओं के बावजूद इस शहर में चल रहे कोचिंग संस्थानों की मार्केटिंग के लिए नहीं बनाई जा रही है? कहानी की शुरुआत से ही समझ आ जाता है कि मामला सिर्फ दर्शकों के मनोरंजन का नहीं है। मामला इस बार उन छद्म विज्ञापनों का भी है जिनकी बुनियाद से टीवीएफ का डीएनए बना है।
नेटफ्लिक्स को सिर्फ व्यूज से मतलब है। एक सीरीज को जितने ज्यादा से ज्यादा लोग देख लेते हैं, उनके लिए उस सीरीज का दूसरा सीजन शुरू करना उतना ही आसान होता है। ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ के दूसरे सीजन को मंजूरी मिल चुकी है। ‘हीरामंडी’ के दूसरे सीजन को मंजूरी मिल चुकी है। ‘कोटा फैक्ट्री’ के भी और सीजन बन जाएं तो किसी को क्या ही दिक्कत हो सकती है? बस, इन कहानियों को देखते समय दर्शकों को अपनी तीसरी आंख और छठी इंद्रिय भी अब खुली रखनी जरूरी है। पॉडकास्ट सुनने से कामयाबी मिलने का एक नया गणित भी इन दिनों मुंबई में खूब चल रहा है। पॉडकास्टर इसके एवज में मोटी रकम भी वसूल रहे हैं और इस ट्रेंड को चलन में लाने का सेहरा भी ‘कोटा फैक्ट्री’ का तीसरा सीजन अपने सिर बांधता दिख रहा है।
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सीरीज के तीसरे सीजन की कहानी एक छात्र की आत्महत्या के अपराधबोध से ग्रसित जीतू भैया के घर के कोने में लग रही काई से शुरू होती है और शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत तक पहुंचती तो है लेकिन जितनी आसानी से तीन कोट मारकर काई को छुपा दिया गया है, उतना आसान शिक्षा व्यवस्था में हो चुके संक्रमण से पार पाना है नहीं। पीढ़ियों को खराब करती जा रही समस्या का निदान क्या ही हो सकता है, जब राष्ट्रीय टेस्ट एजेंसी को अपनी ही कराई परीक्षाएं खुद रद्द करनी पड़ रही हों। ऐसे में मीना का ट्यूशन पढ़ाकर खुद ‘भैया’ बन जाना ही इस गोरखधंधे से बच निकलने का रास्ता बन सकता है लेकिन इससे ‘जीतू भैया’ जैसे मठाधीशों का अस्तित्व खतरे में हो सकता है जो खुद को अलग दिखाने की कोशिश करते करते इतने अलग दिखने लगे हैं कि उनके असली संस्करण की छवि अब नजर नहीं आती। ‘पंचायत’ के तीसरे सीजन के बाद जितेंद्र कुमार के हाथ से फिर एक बार कमान ‘कोटा फैक्ट्री’ के तीसरे सीजन में भी छूट गई है।
‘कोटा फैक्ट्री’ के असली सितारे मयूर मोरे, रंजन राज और आलम खान हैं। इसकी कहानियों का असली दर्द रिश्तेदार के आईपीएल में सेलेक्ट हो जाने के बाद वैभव की अकुलाहट में झलकता है। ये दर्द गर्दन तक भर आने के बाद तब छलक जाता है जब मीना सूखे की वजह से चिंतित अपने पिता को पैसे की चिंता न करने की बात कहता है। फिजिक्स टीचर जीतू भैया की जगह लेने के लिए केमिस्ट्री टीजर पूजा आ चुकी हैं। टीवीएफ की कहानियों पर तालियां बजाता रहा जमाना धीरे धीरे बदल रहा है लेकिन टीवीएफ जानबूझकर खुद अपने ही बनाए जमाने से बाहर नहीं आ रहा है। वह वहीं रुका रहना चाहता है जहां उसे लगता है कि उसकी विदेशी संगीत से चुराई धुनें गांव, देहात के दर्शक पकड़ नहीं पाएंगे। जहां, उन्हें लगता है कि भोर से पहले के समय की कहानियां उनकी अपनी ओरिजनल कहानियां ही मानी जाएंगी।