Kingdom Of The Planet Of The Apes Review: मूक इंसानों, तिलकधारी भक्तों के बीच शहजादे की हुंकार, मामला लीथल है
‘प्लैनेट ऑफ द एप्स’ सीरीज की कहानियों का सिलसिला साल 1968 से चला आ रहा है। एंडी सरकिस की अगुआई वाली इसकी पिछली फिल्मत्रयी ने इसमें तकनीक का अद्भुत समावेश किया। हॉलीवुड फिल्मों में दिलचस्पी रखने वालों को एंडी का वो वीडियो तो याद ही होगा, जिसमें मोशन कैप्चर फिल्ममेकिंग और कंप्यूटर जनित स्पेशल इफेक्ट्स के जरिये उनके अभिनय के साथ उनका चेहरा एक लंगूर के रूप में बदलता दिखाया गया था। ये फिल्ममेकिंग की वह तकनीक है जिसमें असल अभिनेताओं की अदाकारी पर स्पेशल इफेक्ट्स के जरिये किसी भी जानवर का चोला चढ़ाया जा सकता है। एंडी सरकिस का किरदार सीजर पिछली फिल्मत्रयी की आखिरी फिल्म ‘वॉर ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ में शहीद होता है। उसके कुछ उसूल रहे हैं। वह नई पीढ़ी का नेता भी था। और, फिल्म ‘किंगडम ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ एक तरह से इस फ्रेंचाइजी के इसी किरदार को दी गई एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है और पिछली सीरीज से कई पीढ़ियों के बाद की कहानी है।
‘प्लैनेट ऑफ द एप्स’ सीरीज की कहानियां अगर किसी दर्शक ने अब तक नहीं भी देखी हैं, तो भी इस फिल्म का एक स्वतंत्र फिल्म के रूप में आनंद लिया जा सकता है। फिल्म शुरू में ही बता देती है कि इसका भूगोल क्या है। मनुष्य ने एक विषाणु (वायरस) का निर्माण किया जिसने बंदरों की प्रजाति को इतना बुद्धिमान बना दिया कि वे न सिर्फ बोल सकते हैं, बल्कि इंसानों की तरह सोचने भी लगे हैं। प्रेम, घृणा, विरक्ति, हास्य, श्रृंगार, करुणा सारे भाव उनमें आ चुके हैं। और, इंसान? इस विषाणु के प्रभाव में आकर वे बोलना भूल गए। कुछ इस विषाणु से और कुछ लंगूरों को धरती पर बनते साम्राज्य के संघर्ष में मारे गए। फिल्म ‘किंगडम ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ इसी पृष्ठभूमि की कहानी है। बंदरों की भी आपस में गुटबंदी हो चुकी है। कुछ आजादी से अपने अपने कुनबों के साथ रह रहे हैं, और कुछ हैं जिनका एक नेता सबको अपने अधीन कर लेना चाहता है। उसके अड्डे पर लाल झंडे फहराते हैं। उसके सामने घुटने टेकने वाले माथे पर तिलक लगाते हैं और वहीं करते हैं जो कुछ उनका ये नेता करता है।
कहानी शुरू होती है एक शहजादे के साहस के प्रदर्शन से। ये शहजादा बंदरों के उस कुनबे का है जिसे चीलों को पालतू पक्षी बनाने में महारत हासिल है। शहजादा अपने दो दोस्तों के साथ चील के अंडों की तलाश में खंडहर हो चुकी एक गगनचुंबी इमारत के सबसे ऊपरी तल्ले तक जाता है। सबसे लंबी छलांग लगाकर चील का अंडा भी ले आता है। अगले दिन उसकी लाई और अंडे में मौजूद इस नई जान के साथ नए रिश्ते का समारोह होना है पर उससे पहले रात में ही उसकी भिड़ंत एक इंसान से हो जाती है। इंसान और जानवर के रिश्ते की यहां से एक नई पहेली शुरू होती है। कुनबे का राजा मारा जाता है। उसके लोग गुलाम बना लिए जाते हैं। शहजादा अपने कुनबे की तलाश में निकलता है। रास्ते में उसे एक बुजुर्ग दोस्त मिलता है। जिस इंसान से आमना सामना होने के बाद शहजादे की जिंदगी बदल जाती है, वह बोल सकने वाली इंसान है। मे नामक इस युवती को इस शहजादे में इंसानों के भविष्य को बचा सकने का माद्दा दिखता है, और कहानी तिलकधारियों के खेमे तक जा पहुंचती है।
‘हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’ टाइप की फिल्म ‘किंगडम ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ की कहानी कई मायनों में सामयिक है। बिम्ब यहां मौजूदा समय के साफ साफ दिखाई देते हैं। तानाशाही की राह पर चल पड़े एक विशालकाय लंगूर से एक छोटे से बंदर के भिड़ने की ये कहानी साहस, हौसले और अपने समाज के लिए कुछ कर दिखाने की कहानी है। ये एक ऐसा गठबंधन भी बनाती चलती है जिसमें अप्रत्याशित समर्थनों से बाजी पलटती नजर आती है। इतिहास को नए सिरे से जानने की इसमें कोशिशे हैं और किताबी ज्ञान को जमीनी हकीकत तक लाकर मनुष्य का भविष्य बचा लेने की इसमें मिन्नतें भी शामिल हैं। शहजादे को तो फिर भी अपने पिता को दिए वचन का पालन करना है, लेकिन उसके साथ आई युवती के पास ऐसी कोई विरासत नहीं है। वह बियाबान में सिर्फ इसलिए भटक रही है कि किसी तरह, कहीं भी कोई इंसानी प्रजाति जीवित बची हो तो वह उसकी जुबान लौटा सके। गूंगों की बस्ती में तब्दील हो चुकी धरती में मुट्ठी भर लोग बचे हैं, ऐसे लोग जो अब भी बोल सकते हैं, और उनके जुटान में इस युवती का आगमन इस कड़ी की अगली फिल्मों मे रोचक मोड़ ला सकती है।
सिनेमाई तकनीक की उत्कृष्टता के साथ साथ फिल्म ‘किंगडम ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ इसके निर्देशक वेस बॉल की इंसानी जज्बात पर हासिल महारत से भी खूब मदद पाती है। ‘मेज रनर’ सीरीज की तीनों फिल्मों का निर्देशन कर चुके वेस को अपनी काबिलियत की कुछ और करामातें दिखाने का इस फिल्म में अवसर मिला है और इस मौके को उन्होंने दोनों हाथों से भुनाया है। ‘प्लैनेट ऑफ एप्स’ की पिछली फिल्मत्रयी में जो कुछ एंडी सरकिस ने खुद से सीखा, वह उन्होंने इस नई फिल्म के कलाकारों को पूरी तल्लीनता से सिखाया है। और, इसी के चलते फिल्म ‘किंगडम ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ के सभी कलाकारों के अभिनय में बहुत ही मौलिकता नजर आती है।
फिल्म ‘किंगडम ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स’ की कहानी शुरू में थोड़ा सुस्त है, लेकिन इसकी वजह शायद नए दर्शकों को फिल्म से जोड़ने की रही होगी। एक बार फिल्म जब रफ्तार में आती है तो क्लाइमेक्स तक पूरे प्रभाव का प्रवाह अपने साथ बनाए रखती है। शहजादे बंदर नोआ के किरदार में ओवेन टीग ने प्रभावशाली अभिनय किया है, फ्रेया एलन यहां मे के किरदार में खूब जमती हैं और राका बने पीटर मैकन फिल्म में हास्य का संतुलन बनाने में कामयाब रहे। हालांकि, प्रीमियस सीजर का खूंखार किरदार निभाने में केविन डुरांड के चेहरे के भाव सीजीआई से बने इस बंदर कीमदद नहीं कर पाते हैं। इसकी एक बड़ी वजह इस चेहरे की बनावट भी हो सकती है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कमाल की है। संपादन थोड़ा और चुस्त होता तो फिल्म की अवधि कुछ कम की जा सकती थी। बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के वातावरण को सजाने का काम करता है और अच्छा है। फिल्म युवाओं के पसंद की है। परिवार के साथ भी इस सप्ताहांत इसका आनंद सिनेमाघरों में लिया जा सकता है।