Jhund Movie Review: हाशिये पर अटके समाज की एक और कहानी लाए मंजुले, बिग बी की शोहरत पर पूरा दारोमदार
जब तक मैंने बताया नहीं मेरे पारिवारिक और सामाजिक दायरे के तमाम किशोर और युवा इसे ‘झंड’ ही पढ़ते रहे। बहुत बाद में ट्रेलर वगैरह देखने के दौरान उन्हें ‘कैवल्य’ प्राप्त हुआ कि फिल्म का असली नाम ‘झुंड’ है। झुंड यानी जमावड़ा। चंद ऐसे किशोरों और युवाओं को जिन्हें देखते ही दुनिया ‘जज’ करती है। ये फिल्म भी यही करती है। फिल्म के निर्देशक नागराज मंजुले, पूरा नाम नागराज पोपटराव मंजुले, भी यही करते हैं। वह दर्शकों से उम्मीद करते हैं कि वे जब फिल्म देखकर बाहर निकलें तो ऐसा न करें। मंजुले का सिनेमा एक तय लकीर पर बरसों से चल रहा है। ‘फैंड्री’, ‘सैराट’, ‘वैकुंठ’ और अब ‘झुंड’ सबकी अंतर्धारा एक है। बतौर तकनीशियन वह कमाल कर रहे हैं। बतौर निर्देशक वह वहीं खड़े हैं जहां वह अपनी पहली फिल्म में थे। मंजुले की नई फिल्म दर्शकों को भीतर से झकझोरती है। अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ की रिलीज 50 साल 3 मार्च को पूरे हो रहे हैं। इस दरम्यान दर्शकों की कोई तीन चार पीढ़ियां आ चुकी हैं। अमिताभ बच्चन हैं तो ‘झुंड’ सिनेमाघरों तक पहुंची है। थिएटर में देखने के लिए फिल्म थोड़ी बोझिल है। ओटीटी पर देखने के लिए ये बिल्कुल परफेक्ट है।
फिल्म ‘झुंड’ की कहानी एक लाइन की है जिसमें एक कोच समाज के हाशिये पर पड़े लोगों के एक ‘झुंड’ को टीम बनाने निकलता है। और, इसमें कमोबेश कामयाब भी हो जाता है। सवाल यही है कि ऐसे कितने कोच सिर्फ सिनेमा देखकर समाज बना सकता है और जिन्होंने अंबेडकर की नीतियों को समाज में प्रसारित कर समाज को बदलने की बड़ी बड़ी बातें की, उन्होंने खुद को कितना बदला और समाज को अपने बराबर लाने का कितना काम किया? छोटी सी घटना है लेकिन यहां के लिए सामयिक है। हमारी सोसाइटी के सफाईकर्मियों का नियमित सम्मान होता रहता है। उन्हें फूलमालाएं पहनाई जाती हैं। खुद को बड़ा बनाने के फेर में सब उन्हें नकद धनराशि भी देते हैं। इस बार सब मेरे सामने हो रहा था तो मैंने उनकी आंखों में कुछ और ही देखा। एकाएक सबको इकट्ठा कर मैं उनके बीच जा बैठा। कंधों पर बाहें पसारी। गले लगाया और इसके बाद उनकी आंखों में जो चमक दिखी, मुझे लगा कि यही वे चाहते थे। वे चुनाव के मौकों पर साथ बैठकर भोजन करने के लिए लालायित नहीं हैं। ये ‘झुंड’ हर दिन साथ चलने, साथ खड़े होने और साथ उठने बैठने का मौका पाने के लिए लालायित है।
फिल्म ‘झुंड’ एक भाष्य का निर्धारण करती फिल्म है। फिल्म के पहले अध्याय से दर्शकों को पता होता है कि वह क्या देखने वाला है? ये कहानी तमाम फिल्मों में पहले भी दिखाई जा चुकी है। एक जिद्दी कोच है। तमाम बिगड़ैल बच्चे हैं। कोच को बार बार कोसने वाले कुछ लोग हैं। घर बाहर सब जगह उसकी लड़ाई चलती रहती है। कभी सिस्टम के खिलाफ तो कभी समाज के खिलाफ। नागराज मंजुले लीक पर चलती इस कहानी में घुमाव लाने की कुछ कोशिशें भी करते हैं। लेकिन रास्ता फिर भी नदी किनारे पगडंडियों सा ही रहता है। वह घुमंतू हैं। लेकिन, निर्देशक की मंजिल न हो तो सिनेमा भी ठौर तक पहुंच नहीं पाता। दलितों की हालत दिखाने में मंजुले को वैसी ही महारत हासिल है जैसी कभी हिंदी सिनेमा में समानांतर सिनेमा का तमगा देकर हाशिये पर धकेल दी गईं ‘दामुल’ और ‘पार’ जैसी फिल्मों के निर्देशकों ने अपने कथ्य में हासिल की थी। मंजुले को बदलते दौर की पीढ़ी से तारतम्य बिठाना जरूरी है। उस पीढ़ी से जो जाति, पाति, धर्म, वर्ग भेद को शायद ही मानती हो। ये वह पीढ़ी है जिसे यूक्रेन पर हो रहे हमले सोने नहीं देते। और जो सवाल करती है कि विश्वगुरु बनने की रट लगाते रहने वाला देश इसका मौका आने पर तटस्थ क्यों हो जाता है?
खैर, जो तटस्थ हैं, समय तो उनका भी इतिहास लिखता ही है। लिखा ये भी जा रहा है कि आखिर हमारे सिस्टम में ऐसी क्या गड़बड़ है कि हजारों छात्रों देश में डॉक्टर बनने का मौका ही नहीं हासिल कर पाते हैं। यहां मामला उन बस्तियों का है जिनके युवाओं को इंसान बनने का मौका नहीं मिल पा रहा। समाज बस उनके माथे पर उनकी हरकतों के हिसाब से चिप्पियां चिपकाता जा रहा है। किसी को उनके सपनों की परवाह नहीं। परवाह ये भी नहीं कि उनकी असल काबिलियत क्या है? अमिताभ बच्चन को बड़े परदे पर मिला सबसे लोकप्रिय नाम विजय सिनेमा में समाज का सबसे बड़ा बागी रहा है। यहां भी वह बगावत करता है और इस ‘झुंड’ को एक टीम में तब्दील करने में कामयाब रहता है। अमिताभ बच्चन की चाल में अब उनकी उम्र दिखने लगी है। इसके बावजूद ये उनके मोनोलॉग ही हैं जो दर्शकों को उनके सिनेमा तक अब भी खींच ले जाते हैं। वह समानांतर सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा का पुल बनने की कोशिश अपने करियर में शुरू से करते रहे हैं, और इस बात के लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए, कम है।
फिल्म ‘झुंड’ में आपको तमाम और कलाकार भी ऐसे दिखेंगे जिनके चेहरे जाने पहचाने हैं। रिंकू राजगुरु को हिंदी पट्टी के दर्शक अब खूब पहचानते हैं। उनके साथ फिल्म ‘सैराट’ के जोड़ीदार भी हैं। लेकिन, दोनों का चोला अब भी पहले जैसा ही है। हां, ‘फैंड्री’ से चमके केशव कदम ने जरूर बतौर अभिनेता इस फिल्म में बड़ी छलांग लगाई है। महाराष्ट्र का संगीत जोशीला संगीत है। अजय अतुल इसके उस्ताद माने जाते हैं। वह फिल्म का टैंपो हाई रखने में कामयाब भी होते हैं। लेकिन इसका बैकग्राउंड म्यूजिक कई बार फिल्म की कहानी से तारतम्य बिठाने से चूक जाता है। फिल्म ‘झुंड’ की पूरी अंतर्धारा को इसके निर्देशक के हिसाब से दिखाने में सिनेमैटोग्राफर सुधाकर ने कामयाबी हासिल की है। फिल्म का संपादन कमजोर है। कोई तीन घंटे तक फिसलती फिल्म ‘झुंड’ कम अवधि की एक अच्छी ओटीटी फिल्म हो सकती थी। लेकिन, तब शायद इसके ‘वैकुंठ’ की तरह कहीं खो जाने का भी खतरा रहता। बदलते दौर के सिनेदर्शकों की पसंद के साथ तारतम्य बिठाना ही नागराज मंजुले के भविष्य के सिनेमा की सबसे बड़ी चुनौती होगी और सिर्फ कथानक आधारित सिनेमा के बूते अपनी बात कहने की जिद से भी उनको आगे निकलना ही होगा।