{"_id":"6a99a7e3347c9a717c0e04dc","slug":"jeeva-ya-bheema-con-movie-review-and-rating-in-hindi-arshad-warsi-vijay-raaz-sanjeeda-sheikh-2026-09-03","type":"wiki","status":"publish","title_hn":"जीवन या भीमा कॉन मूवी रिव्यू: अरशद का डबल रोल बेअसर; फिल्म देखकर हंसी आने से पहले आया एक सवाल- कब होगी खत्म?","category":{"title":"Movie Reviews","title_hn":"मूवी रिव्यूज","slug":"movie-review"}}
जीवन या भीमा कॉन मूवी रिव्यू: अरशद का डबल रोल बेअसर; फिल्म देखकर हंसी आने से पहले आया एक सवाल- कब होगी खत्म?
सार
Jeevan Ya Bheema Con? Movie Review : अरशद वारसी की फिल्म हो और कॉमेडी की उम्मीद न हो, ऐसा हो नहीं सकता। ‘जीवन या भीमा कॉन?’ भी शुरुआत में यही उम्मीद जगाती है। एक कर्ज में डूबा पति है... परेशान पत्नी है। दो करोड़ की बीमा पॉलिसी है। और पति की हूबहू शक्ल वाला एक अजनबी भी है। जानें कैसी है फिल्म ?
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फिल्म जीवन या भीमा कॉन?
- फोटो : अमर उजाला
Movie Review
'जीवन या भीमा कॉन?'
कलाकार
अरशद वारसी
,
संजीदा शेख
,
विजय राज
,
ब्रिजेंद्र काला
,
पूजा चोपड़ा
,
अतुल परचुरे
और
जयवंत वाडकर
लेखक
मुक्ता भट्ट
,
अभिषेक डोगरा
और
मेघव्रत सिंह गुर्जर
निर्देशक
अभिषेक डोगरा
निर्माता
अनशु मिश्रा
रिलीज डेट
4 सितंबर 2026
रेटिंग
2/5
विस्तार
अरशद वारसी अभिनीत फिल्म 'जीवन भीमा कॉन?' रिलीज हो चुकी है। इस कहानी में वह सारे एंगल हैं, जिससे एक मजेदार क्राइम-कॉमेडी बनाई जा सकती थी। लेकिन फिल्म देखते हुए उम्मीद धीरे-धीरे थकान में बदलने लगती है। शुरुआत में जो कॉन्सेप्ट दिलचस्प लगता है, वही आगे जाकर इतना खिंचता है कि इंटरवल के बाद कहानी क्या मोड़ लेगी, इससे ज्यादा चिंता यह होने लगती है कि फिल्म खत्म कब होगी।
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फिल्म जीवन या भीमा कॉन?
- फोटो : सोशल मीडिया
कहानी
जीवन (अरशद वारसी) और योजना (संजीदा शेख) कर्ज में डूबे हुए हैं। जीवन ने नौकरी छोड़कर अपना रेस्टोरेंट शुरू किया था। कारोबार नहीं चला और कर्ज बढ़ता गया।
ऐसे में जीवन को अपने जैसा दिखने वाला भीमा मिलता है। यहीं से उसके दिमाग में एक योजना आती है। इसमें दो करोड़ की बीमा पॉलिसी अहम है। योजना भी उसका साथ देती है। लेकिन जिस काम को दोनों आसान समझ रहे थे, उसमें जल्द ही दूसरे लोग शामिल हो जाते हैं।
विनायक (विजय राज) और उसका साथी मन्नू (ब्रिजेंद्र काला) कहानी को अपराध की तरफ ले जाते हैं। इसके बाद बीमा और पैसों का मामला एक बड़े खेल में बदलने लगता है।
यहां तक फिल्म का सेटअप दिलचस्प है। लगता है कि आगे काफी कुछ देखने को मिलेगा। लेकिन फिल्म इस मौके को ज्यादा देर तक संभाल नहीं पाती। कहानी धीरे-धीरे अपनी रफ्तार खो देती है।
जीवन (अरशद वारसी) और योजना (संजीदा शेख) कर्ज में डूबे हुए हैं। जीवन ने नौकरी छोड़कर अपना रेस्टोरेंट शुरू किया था। कारोबार नहीं चला और कर्ज बढ़ता गया।
ऐसे में जीवन को अपने जैसा दिखने वाला भीमा मिलता है। यहीं से उसके दिमाग में एक योजना आती है। इसमें दो करोड़ की बीमा पॉलिसी अहम है। योजना भी उसका साथ देती है। लेकिन जिस काम को दोनों आसान समझ रहे थे, उसमें जल्द ही दूसरे लोग शामिल हो जाते हैं।
विनायक (विजय राज) और उसका साथी मन्नू (ब्रिजेंद्र काला) कहानी को अपराध की तरफ ले जाते हैं। इसके बाद बीमा और पैसों का मामला एक बड़े खेल में बदलने लगता है।
यहां तक फिल्म का सेटअप दिलचस्प है। लगता है कि आगे काफी कुछ देखने को मिलेगा। लेकिन फिल्म इस मौके को ज्यादा देर तक संभाल नहीं पाती। कहानी धीरे-धीरे अपनी रफ्तार खो देती है।
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फिल्म जीवन या भीमा कॉन?
- फोटो : सोशल मीडिया
अभिनय
अरशद वारसी को इस फिल्म में देखकर सबसे पहले यही लगता है कि अभिनेता को पता है कि कॉमेडी कहां करनी है। लेकिन फिल्म को पता ही नहीं कि कॉमेडी कैसे लिखनी है। डबल रोल में अरशद दोनों किरदारों को अलग अंदाज देने की कोशिश करते हैं। लेकिन उन्हें वैसी सिचुएशन नहीं मिलती, जहां उनकी कॉमेडी अपने आप निकलकर आए। वह अपने जाने-पहचाने अंदाज में कई जगह अच्छा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन कमजोर डायलाग उनका साथ छोड़ देते हैं। ऐसा लगता है कि अभिनेता तैयार है, बस सीन में मजा नहीं है।
संजीदा शेख योजना के किरदार में ठीक लगती हैं। वह इमोशनल और कॉमेडी सीन में अपनी तरफ से कोशिश करती हैं। लेकिन उनका किरदार इतना मजबूत लिखा ही नहीं गया कि वह फिल्म पर अपनी छाप छोड़ सकें।
विजय राज आते हैं तो उम्मीद बंधती है कि शायद अब फिल्म थोड़ी संभलेगी। लेकिन उनके विनायक को भी ऐसे डायलाग मिले हैं, जो उनके अभिनय से ज्यादा लेखन की कमजोरी दिखाते हैं। ब्रिजेंद्र काला भी अपने अनुभव के बावजूद उस कॉमेडी को नहीं बचा पाते, जिसकी उनसे उम्मीद की गई है।
पूजा चोपड़ा मकान मालकिन के किरदार में हैं। कहानी जरूरत पड़ने पर उन्हें बुलाती है... काम कराती है और फिर आगे बढ़ जाती है।
अरशद वारसी को इस फिल्म में देखकर सबसे पहले यही लगता है कि अभिनेता को पता है कि कॉमेडी कहां करनी है। लेकिन फिल्म को पता ही नहीं कि कॉमेडी कैसे लिखनी है। डबल रोल में अरशद दोनों किरदारों को अलग अंदाज देने की कोशिश करते हैं। लेकिन उन्हें वैसी सिचुएशन नहीं मिलती, जहां उनकी कॉमेडी अपने आप निकलकर आए। वह अपने जाने-पहचाने अंदाज में कई जगह अच्छा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन कमजोर डायलाग उनका साथ छोड़ देते हैं। ऐसा लगता है कि अभिनेता तैयार है, बस सीन में मजा नहीं है।
संजीदा शेख योजना के किरदार में ठीक लगती हैं। वह इमोशनल और कॉमेडी सीन में अपनी तरफ से कोशिश करती हैं। लेकिन उनका किरदार इतना मजबूत लिखा ही नहीं गया कि वह फिल्म पर अपनी छाप छोड़ सकें।
विजय राज आते हैं तो उम्मीद बंधती है कि शायद अब फिल्म थोड़ी संभलेगी। लेकिन उनके विनायक को भी ऐसे डायलाग मिले हैं, जो उनके अभिनय से ज्यादा लेखन की कमजोरी दिखाते हैं। ब्रिजेंद्र काला भी अपने अनुभव के बावजूद उस कॉमेडी को नहीं बचा पाते, जिसकी उनसे उम्मीद की गई है।
पूजा चोपड़ा मकान मालकिन के किरदार में हैं। कहानी जरूरत पड़ने पर उन्हें बुलाती है... काम कराती है और फिर आगे बढ़ जाती है।
फिल्म जीवन या भीमा कॉन?
- फोटो : इंस्टाग्राम- @arshad_warsi
निर्देशन
अभिषेक डोगरा का निर्देशन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक है। ज्यादातर कहानी एक ही घर और एक ही कमरे में चलती है। सीमित लोकेशन अपने आप में दिक्कत नहीं है। लेकिन यहां कुछ देर बाद लगता है कि किरदार एक-दूसरे के सामने बैठे हैं। बारी-बारी से कहानी समझा रहे हैं।
दूसरे हिस्से में हंगामा बढ़ता है... किरदार बढ़ते हैं। आवाजें बढ़ती हैं। लेकिन मजा नहीं बढ़ता। कई सीन्स में जबरदस्ती हंसाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। सीन शुरू होते ही अंदाजा हो जाता है कि अब कॉमेडी परोसी जाएगी।
एक सीन में अरशद का किरदार खुद कहता है कि ‘यह मजेदार है’। मजेदार बात यह है कि उस सीन पर दर्शक हंसता नहीं है। यही फिल्म की सबसे बड़ी विडंबना है।
अभिषेक डोगरा का निर्देशन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक है। ज्यादातर कहानी एक ही घर और एक ही कमरे में चलती है। सीमित लोकेशन अपने आप में दिक्कत नहीं है। लेकिन यहां कुछ देर बाद लगता है कि किरदार एक-दूसरे के सामने बैठे हैं। बारी-बारी से कहानी समझा रहे हैं।
दूसरे हिस्से में हंगामा बढ़ता है... किरदार बढ़ते हैं। आवाजें बढ़ती हैं। लेकिन मजा नहीं बढ़ता। कई सीन्स में जबरदस्ती हंसाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। सीन शुरू होते ही अंदाजा हो जाता है कि अब कॉमेडी परोसी जाएगी।
एक सीन में अरशद का किरदार खुद कहता है कि ‘यह मजेदार है’। मजेदार बात यह है कि उस सीन पर दर्शक हंसता नहीं है। यही फिल्म की सबसे बड़ी विडंबना है।
फिल्म जीवन या भीमा कॉन?
- फोटो : सोशल मीडिया
पटकथा और लेखन
पटकथा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कई चीजें कहानी का हिस्सा कम ....उसे आगे बढ़ाने का जरिया ज्यादा लगती हैं। जहां कहानी अटकती है, वहां कोई नया किरदार या नई जानकारी आ जाती है। योजना का नर्स होना इसका एक उदाहरण है। शुरुआत में लगता है कि यह बात आगे काम आएगी। लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल एक छोटी-सी जानकारी तक ही रह जाता है।
मकान मालकिन का ट्रैक भी अचानक जुड़ता है। फिर कहानी में उसकी जरूरत महसूस होने लगती है। बीमा एजेंट का शक करना और पुलिस तक पहुंचना भी कहानी को आगे ले जाने की कोशिश है। लेकिन तब तक फिल्म इतनी धीमी हो चुकी होती है कि नया मोड़ भी खास उत्सुकता नहीं जगाता।
पहले भाग में घटनाएं तेजी से आगे बढ़ती हैं। दूसरे भाग में कहानी एक ही जगह अटक जाती है। इतने सारे किरदारों और उलझनों को संभालने के लिए जिस कसावट की जरूरत थी, वह यहां नहीं दिखती।
पटकथा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कई चीजें कहानी का हिस्सा कम ....उसे आगे बढ़ाने का जरिया ज्यादा लगती हैं। जहां कहानी अटकती है, वहां कोई नया किरदार या नई जानकारी आ जाती है। योजना का नर्स होना इसका एक उदाहरण है। शुरुआत में लगता है कि यह बात आगे काम आएगी। लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल एक छोटी-सी जानकारी तक ही रह जाता है।
मकान मालकिन का ट्रैक भी अचानक जुड़ता है। फिर कहानी में उसकी जरूरत महसूस होने लगती है। बीमा एजेंट का शक करना और पुलिस तक पहुंचना भी कहानी को आगे ले जाने की कोशिश है। लेकिन तब तक फिल्म इतनी धीमी हो चुकी होती है कि नया मोड़ भी खास उत्सुकता नहीं जगाता।
पहले भाग में घटनाएं तेजी से आगे बढ़ती हैं। दूसरे भाग में कहानी एक ही जगह अटक जाती है। इतने सारे किरदारों और उलझनों को संभालने के लिए जिस कसावट की जरूरत थी, वह यहां नहीं दिखती।
अरशद वारसी
- फोटो : इंस्टाग्राम@arshad_warsi
देखें या नहीं?
‘जीवन या भीमा कॉन?’ को देखकर सबसे ज्यादा निराशा इसलिए होती है क्योंकि शुरुआत देखकर लगता है कि मामला दिलचस्प हो सकता है। लेकिन फिल्म आगे बढ़ती है तो लगता है कि कहानी से ज्यादा उसे खींचने पर जोर दिया गया है।
अरशद वारसी हैं...डबल रोल है। क्राइम है..बीमा है...हीरों का खेल है। ऊपर से हमशक्ल वाला मामला भी है। फिर भी फिल्म वह मजा नहीं दे पाती, जिसके लिए ऑडियंस क्राइम-कॉमेडी देखने बैठता है।
अगर अरशद वारसी आपके पसंदीदा कलाकार हैं, तो भी फिल्म से बहुत उम्मीद लेकर न बैठें। बाकी ऑडियंस के लिए सलाह सीधी है - इस बीमा में अपना दो घंटे का समय मत लगाइए।
‘जीवन या भीमा कॉन?’ को देखकर सबसे ज्यादा निराशा इसलिए होती है क्योंकि शुरुआत देखकर लगता है कि मामला दिलचस्प हो सकता है। लेकिन फिल्म आगे बढ़ती है तो लगता है कि कहानी से ज्यादा उसे खींचने पर जोर दिया गया है।
अरशद वारसी हैं...डबल रोल है। क्राइम है..बीमा है...हीरों का खेल है। ऊपर से हमशक्ल वाला मामला भी है। फिर भी फिल्म वह मजा नहीं दे पाती, जिसके लिए ऑडियंस क्राइम-कॉमेडी देखने बैठता है।
अगर अरशद वारसी आपके पसंदीदा कलाकार हैं, तो भी फिल्म से बहुत उम्मीद लेकर न बैठें। बाकी ऑडियंस के लिए सलाह सीधी है - इस बीमा में अपना दो घंटे का समय मत लगाइए।