Jalsa Movie Review: सिनेमा में महिला किरदारों को मिली तवज्जो का ‘जलसा’, विद्या और शेफाली दोनों अव्वल नंबर
सिनेमा क्या है? सवाल सीधा सा है। जवाब शायद उतना सपाट देना मुश्किल है। यह कल्पनाओं की एक दुनिया है। भावनाओं का सैलाब है। इसमें आइनों के छोटे-छोटे टुकड़े तैरते रहते हैं। अक्स दिखाते हैं। दुनिया का भी। दुनिया को भी। होता है कभी-कभी जिंदगी में, मन में कोई चोर छुपा होता है। एक अपराध बोध-सा रहता है। उससे मुक्ति पाने की कोशिश कहें, या पश्चाताप, जिससे ये उसे भुगतना चाहता है। पर समाज में जो उसकी हैसियत है, वह उसे खुलकर पश्चाताप भी करने नहीं देती। जिसके प्रति अपराध हुआ, वह इसी दुखी आत्मा से मदद पा रहा है। और, उसे पता नहीं कि जो दया उस पर की जा रही है, दरअसल वह तो उसके हक से कहीं ज्यादा है। जीवन के जलसे ऐसे ही होते हैं। सब अपना-अपना तंबू तानने में लगे रहते हैं। पता भी नहीं चलता कि शामियाने में लगे किस बांस पर किसकी शातिर निगाह लगी हुई है। फिल्म ‘जलसा’ ऐसी ही एक कहानी है। जिंदगी से छूटती और जिंदगी को पकड़ती कुछ धड़कनों की कहानी, जिसके सारे अहम सिरे महिलाओं ने पकड़ रखे हैं। ये सिनेमा में महिला किरदारों को मिली तवज्जो का ‘जलसा’ है।
विद्या बालन को अपनी फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ से हिंदी सिनेमा की लीक बदले 10 साल से ज्यादा हो गए। कोरोना में लॉकडाउन लगा तो उनकी पिक्चर ‘शकुंतला देवी’ प्राइम वीडियो पर ‘गुलाबो सिताबो’ के बाद सबसे ज्यादा देखी गई फिल्म बनी। फिर ‘शेरनी’ में वह दहाड़ीं और अब अभिनय का उनका ये नया ‘जलसा’ है। साथ में उनके शेफाली शाह हैं और शेफाली शाह को इन दिनों कैमरा देखकर जो हो रहा है, वह सामान्य नहीं है। विद्या बालन की फिल्म में उनके नीचे से कालीन खींच ले जाने की इतनी कुव्वत शायद ही पहले किसी कलाकार ने बीते 10 साल में दिखाई हो। खैर, उस पर भी आते हैं। पहले थोड़ा ‘कहानी’ बताते हैं। विद्या यहां न्यूज पोर्टल की हिट एंकर हैं माया मेनन। इंटर्न, ट्रेनी पत्रकारों के लिए ‘भगवान’ सरीखी, जिनका मोबाइल नंबर मिलना भी वरदान से कम नहीं है। माया के घर में काम करती है रुकसाना। माया की मां हैं। पति अलग होकर नया परिवार बसा चुका है। और, एक बेटा भी है। दिखने में अजब, पर अक्लमंदों से कहीं ज्यादा गजब। काम के बोझ की मारी माया को कार चलाते झपकी आती है और हादसा हो जाता है।
पूरी कहानी बताकर मैं यहां आपका इस फिल्म को देखने का मजा किरकिरा नहीं करना चाहता। हां, यह जरूर बताना चाहूंगा कि ये फिल्म मैंने देखनी शुरू की थी विद्या बालन की ओटीटी पर संभावित हैट्रिक के हिसाब से और फिल्म खत्म हुई तो अकेले बैठे-बैठे मैंने तालियां भी बजाईं, लेकिन विद्या बालन के साथ-साथ शेफाली शाह, सूर्या, रोहिणी, विधात्री और श्रीकांत मोहन यादव के काम पर। फिल्म खत्म होती है तो लिखकर आता है, ‘ए फिल्म बाई सुरेश त्रिवेणी एंड टीम।’ सुरेश त्रिवेणी का अपनी टीम को इस तरह साथ में सम्मान देना ही उनके सिनेमा के अलहदा रंग सजा जाता है। ‘तुम्हारी सुलु’ से उनकी जोड़ी विद्या के साथ जमनी शुरू हुई। सिनेमा में सुरेश के अनकहे का असर कहे से ज्यादा है। वह संवादों के बीच की जो शांति है, उसमें खेलते हैं। क्लाइमैक्स में समुद्र तट पर मालकिन के बेटे के साथ रुकसाना का पूरा सीक्वेंस फिल्म की जान है। और, उससे पहले हादसे के बाद की माया की घबराहट और उसका चीत्कार।
फिल्म ‘जलसा’ मसाला फिल्म नहीं है। इसमें कोई टोटका, आइटम सॉन्ग या श्रीवल्ली सरीखा नैन मटक्का भी नहीं। यह इंसानी रिश्तों की कहानी है। ऐसी कहानी, जिसमें अपराधी को खुद अपराध बोध होता है। हादसे की गाज जिन पर गिरी, वह इन सबसे अनजान हैं। इंसानी जान की कीमत लगती है। और, फिल्म बड़ा सवाल यह करती है कि क्या हो, अगर गरीब को अमीर की जान की कीमत लगाने का मौका मिल जाए। इस पूरे संतुलन के दो सिरे हैं विद्या बालन और शेफाली शाह। विद्या बालन ने वैसा ही उम्दा काम किया, जिसकी उनसे उम्मीद थी। वह लीक से इतर विषयों पर बनने वाली फिल्मों की सुपरस्टार हैं। ‘विकी डोनर’ और उसके बाद की पिक्चरों के फल विद्या के लगाए पौधे पर ही फूले हैं। उसी धारा में बहती नई नावों की पतवारें तापसी पन्नू, कृति सैनन और शेफाली शाह जैसी अदाकाराओं ने थाम रखी हैं। बस, इस बार विद्या ने कहानी के उत्प्रेरक का काम किया है और रंगमच छोड़ दिया है बाकी कलाकारों के करतब के लिए।
फिल्म ‘जलसा’ की कहानी, इसके कलाकारों की अदाकारी, इसके संवाद और इसका निर्देशन लाजवाब है। पटकथा इसकी थोड़ी और कसावट मांगती है। फिल्म की दो घंटे 10 मिनट के करीब की अवधि शायद इसे सिनेमाघरों मे रिलीज करने के हिसाब से रखी गई। सौरभ गोस्वामी का कैमरा और शिव कुमार पैनिकर का संपादन भी उसी हिसाब से फिल्म में चलता है। हालांकि, फिल्म के निर्माताओं को चाहिए यह था कि डिजिटल रिलीज तय होने के बाद इसकी लंबाई थोड़ी कम कर लेते। 90 मिनट की यह एक अद्भुत डिजिटल फिल्म होती। फिल्म बीच-बीच में जहां ढीली होती है, उसमें भी इसके कलाकार लगातार अदाकारी का तंबू ताने रहते हैं। फिल्म का एक और मजबूत पक्ष है इसका बैकग्राउंड स्कोर। गौरव चटर्जी और जॉर्ज जोसेफ ने लाइव ऑर्केस्ट्रा की मदद से फिल्म के मनोभावों के साथ फिल्म के कथानक का आरोह, अवरोह पुख्ता करने में निर्देशक की उम्दा मदद की है। फिल्म पूरे परिवार के साथ देखी जा सकती है और होली की छुट्टी में यह आपका बढ़िया पारिवारिक मनोरंजन कर सकती है।