फिल्म समीक्षाः सनी देओल के फैन्स को पसंद आएगी 'घायल वंस अगेन'
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-निर्माता-निर्देशकः सनी देओल
-सितारेः सनी देओल, सोहा अली खान, ओम पुरी, टिस्का चोपड़ा
-रेटिंग **1/2
अगर हम सच के साथ हैं तो जीतने तक हार नहीं माननी चाहिए। यह दिल से निकली आवाज है। इसी को सुनते हुए सनी देओल अपनी 26 साल पुरानी सुपर हिट फिल्म घायल के आगे की कहानी लेकर आए हैं। फिल्म को बनाने और रिलीज कराने में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
घायल वंस अगेन सनी के फैन्स के लिए है। जिन्हें उनका ऐक्शन, अंगारे बरसाती आंखें और दुश्मन को दहला देने वाले डायलॉग पसंद आते हैं। वे पाएंगे कि इस ढाई किलो के हाथ में अब भी दम है।
हां, अगर आप कहानी देखना पसंद करते हैं और सिनेमा में लगातार कुछ नया ढूंढना चाहते हैं तो फिल्म निराश करेगी। नई पीढ़ी जुड़ सके इसलिए फिल्म में चार युवा चेहरे हैं, लेकिन वह खास मददगार साबित नहीं होंगे।
पहले से कहीं कूल हो गए हैं सनी देओल
फिल्म में घायल के अजय मेहरा (सनी देओल) को जब आप वंस अगेन देखेंगे तो पाएंगे कि वह पहले से कहीं कूल हो गया है। दिल के साथ दिमाग से भी सोचने लगा है। इसके बावजूद अन्याय के प्रति लड़ने का जज्बा पहले जैसा ही है।
यही वजह है कि अब वह खबरों की दुनिया के बिजनेस में उतर कर ‘हार्ड हिटिंग’ सच सामने लाता है। हालांकि उसकी जिंदगी बहुत आसान नहीं है और भावनाओं को नियंत्रित करना अब भी उसके लिए कठिन है।
फिल्म की मुश्किल यह है कि इसमें भी चंचल राजनीति, अहंकारी गुंडागर्दी, भ्रष्ट बिजनेस और रेप जैसे विषय केंद्र में हैं। अतः इनसे लड़ाई के हीरो के औजार भी पुराने हैं।
कॉलेज के मस्तमौला चार युवा सामाजिक सरोकारों के प्रति चैतन्य हैं और एक दिन वे रिटायर्ड पुलिस अफसर (ओम पुरी) की हत्या के गवाह हो जाते हैं। परंतु अनियंत्रित शक्ति के दम पर बिजनेस और राजनीति में शिखर तक पहुंचे हत्यारे अब इन्हें भी खत्म करना चाहते हैं।
ऐक्शन दृश्य आकर्षक हैं
यहां अजय मेहरा इन युवाओं के सामने ढाल बन कर खड़ा होता है। उसका वह रूप दिखता है जिसके लिए सिनेमाहॉल में तालियां और सीटियां बजती हैं।
फिल्म का भार अकेले सनी के कंधों पर है। विलेन उनके सामने मजबूत नहीं दिखते। यह फिल्म की कमजोर कड़ी है। ऐक्शन दृश्य जरूर आकर्षक हैं और कहानी में कहीं-कहीं ट्विस्ट रोचक हैं।
फिर भी काफी कुछ ऐसा है जिसमें नई सोच का अभाव साफ है। सोहा अली खान प्रभावित करती हैं। फिल्म का इमोशल पक्ष संभालने में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी।
टिस्का चोपड़ा भी अपनी भूमिका में फिट हैं। सनी को इस फिल्म के लिए अपनी ही तरह एक मजबूत टीम की जरूरत थी। समय के साथ सिनेमा में कहानी कहने के अंदाज और दर्शकों का विकास हुआ है। तकनीकी पक्ष के साथ इस बात पर भी ध्यान दिया जाता तो फिल्म और बेहतर होती।