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जिंदगी 50-50:बचकानी और भटकी हुई फिल्म
रोहित मिश्र
Updated Sat, 25 May 2013 10:55 AM IST
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'जिंदगी 50-50' देखते हुए बार-बार ऐसा लगता है कि हम किसी कस्बे में बैठकर कांति शाह जैसे किसी निर्देशक की कोई ब्रीगेड फिल्म देख रहे हैं। लेकिन बीच में रिया सेन, आर्य बब्बर और मुरली शर्मा जैसे जाने पहचाने चेहरे आ जाते हैं तो यह भ्रम कुछ पलों के लिए टूट जाता है।
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दरअसल 'जिंदगी 50-50' इतनी बुरी फिल्म है कि उसे फिल्म का दर्जा देते हुए भी कष्ट होता है। भौंडे और बचकाने दृश्यों से भरी यह फिल्म आंख, कान और दिमाग तीनों को ही टार्चर ही हद तक ले जाती है। 'जिंदगी 50-50' कई बार फिल्म न लगकर कई दृश्यों का एक कोलाज लगती है जिसका संपादन भी खराब तरीके से किया गया है।
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वीना मलिक के कुछ बोल्ड दृश्यों को प्रमोट करके मल्टीप्लेक्स में जगह बनाने वाली यह फिल्म असल में उन दर्शकों को भी निराश करती है कि जो वीना मलिक को पहली बार बड़े पर्दे पर देखने गए थे।
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लेकिन एक सवाल का उत्तर दर्शकों को नहीं मिल पाता कि रिया सेन, आर्य बब्बर तो छोड़िए राजपाल यादव, रेखा भारद्वाज, बप्पी लहरी, मीका सिंह, शब्बीर अहमद, राहत फतेह अली खान जैसे बड़े नाम इस फिल्म के साथ क्या कर रहे थे।
उलझी हुई बचकानी कहानियां
फिल्म में दरअसल कोई कहानी है नहीं। यह फिल्म कुछ किरदारों की बात जरूर करती है। मुख्यतः तीन किरदार फिल्म में दिखते हैं। दिल्ली से भागकर मुंबई के रेड लाइट एरिया में आयी माधुरी (वीना मलिक) की कहानी के साथ यह फिल्मों के दो स्ट्रगलर आदि (आर्य बब्बर) और नैना (रिया सेन) की भी बात करती है।
एक बेहद बचकाना ट्रैक बिरजू (राजन वर्मा) और उसकी पत्नी रूपा (सुप्रिया कुमारी) का भी है। रुपा मुंबई में अपना घर पाने के लिए एक अजीब किस्म का समझौता करती है। इन तीनों ही कहानियों को इस सारांश के साथ जोड़ा जाता है कि जिंदगी में कुछ पाने के लिए हमें कई बार अपना बहुत कुछ खोना पड़ता है।
चीखता दिखा हर किरदार
आर्य बब्बर, राजपाल यादव और रिया सेन जैसे कलाकारों ने इस फिल्म में इतनी घटिया और लाउड ऐक्टिंग की है जिसे देखकर विश्वास ही नहीं होता कि यह वही एक्टर हैं जिनसे हम थोड़ा-बहुत भी परिचित हैं। हर कलाकार ने अपनी पूरी दम लगाकर चीखकर डायलॉग बोले हैं।
वीना मलिक की यह रिलीज हुई पहली हिंदी फिल्म है। उन्हें थोड़ी बहुत ऐक्टिंग सीखनी चाहिए क्योंकि सुनते हैं उनको टक्कर देने वाली शर्लिन चोपड़ा, पूनम पांडेय और सनी लियोन ऐक्टिंग सीख रही हैं।
निर्देशन ही सबसे कमजोर कड़ी
निर्देशन इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। राजीव एस रुईया की यह पहली फिल्म बताती है कि उन्हें फिल्म मेकिंग बेसिक भी ठीक से नहीं आती हैं। अच्छे कलाकारों से भी उन्होंने बहुत ही खराब लिया है। उन्हें पहले खुद को कमरे में बंद करके कुछ हिंदी फिल्में देखनी चाहिए जिससे उनको यह पता चले कि फिल्म दरअसल होती क्या है।
एक गाना तो चौंकाता है
रेखा भारद्वाज द्वारा गाया हुआ एक गाना "तोहसे नैना लागे रे" फिल्म की एकमात्र अच्छाई है। शब्बीर अहमद ने इस गाने के लिरक्सि बहुत ही खूबसूरती से लिखे हैं। फिल्म के दूसरे गाने "रब्बा" और "तू सामने जो आए" भी फिल्म से बेहतर हैं।
क्यों देखें
यदि आप इस सप्ताह या पिछले सप्ताह रिलीज हुई सारी फिल्म देख चुके हैं और मल्टीप्लेक्स में मौजूद हर फिल्म देखने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं।
क्यों न देखें
इस फिल्म में फिल्म जैसा कुछ भी नहीं है। साथ ही वीना मलिक भी अपने उस रूप में नहीं हैं जिसे सोचकर आप फिल्म देखने जाएं।