फिल्म समीक्षाः वस्त्रहीन दृश्य के अलावा भी बहुत कुछ दिखाती है 'Parched'
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-निर्देशकः लीना यादव
-सितारेः तनिष्ठा चटर्जी, राधिका आप्टे, सुरवीन चावला
रेटिंग **1/2
पहले एंग्री इंडियन गॉडेसेस, फिर पिंक और अब पार्च्ड। जो लोग इधर बन रहे स्त्री विमर्श के सिनेमा की परतों को पसंद करते हैं उनके लिए निर्देशक लीना यादव की यह फिल्म है। वैसे तीनों फिल्मों की भाषा हिंदी है मगर शीर्षक अंग्रेजी! क्या हिंदी के पास ऐसे शब्द नहीं जो कहानियों को नाम दे सकें? संभवतः ये फिल्में अंग्रेजी में ही बनें मगर इन्हें टिकट खिड़की पर चलाना भी है और बड़ा दर्शक वर्ग हिंदी का है। इन निर्माता-निर्देशकों के लिए हिंदी मजबूरी है।
पार्च्ड का अर्थ जानने के लिए बहुत लोगों को शब्दकोष की जरूरत पड़ सकती है। गूगल सर्च में इसका हिंदी अर्थ सूखा, भुना हुआ, झुलसा हुआ है। लीना इस शब्द से गुजरात के एक गांव की तीन स्त्रियों के माध्यम से रूखी-निर्मम तस्वीर पेश करने की कोशिश करती हैं। लीना की पिछली फिल्में शब्द और तीन पत्ती फ्लॉप थीं। पार्च्ड भी सीमित दर्शकों के लिए है। नायिकाओं की कथाओं में रानी (तनिष्ठा चटर्जी) का किरदार ही गहरा और विविध रंगी है।
मगर निर्देशक ने उसके विस्तार की संभावनाओं में रुचि नहीं लगी। जबकि लज्जो (राधिका आप्टे) और बिजली चश्मेवाली (सुरवीन चावला) एक-रैखिक हैं। लज्जो का पति उस बांझ बताते हुए उससे सदा पीटता है जबकि खुद ‘कमजोर’ है। बिजली मेले में नाचती है, जिसका अतीत-वर्तमान साफ नहीं है। फिल्म में स्त्री विमर्श के साथ यौन विमर्श का मिश्रण करते हुए पुरुषवादी सोच के लिए कड़ा संदेश हैः मर्द बनना छोड़, पहले इंसान बनना सीख।
फिल्म समीक्षाः वस्त्रहीन दृश्य के अलावा भी बहुत कुछ दिखाती है 'Parched'
फिल्म में ऐसा भी मोड़ आता है कि लगता है रानी नई मदर इंडिया बनेगी। बहू को प्रताड़ित करने वाले वेश्यागामी, कुमार्गी, कमबख्त बेटे को सबक सिखाएगी। परंतु यह नहीं होता। लीना मानव मन की गहराइयों में रुचि लेने के बजाय सेक्स के दायरे में बंधी रहीं। फिल्म का अंत किरदारों को किसी राह पर नहीं ले जाता। दर्शक भी नहीं जान पाता कि आखिर लीना समस्या का झंडा उठा कर क्या समाधान दे रही हैं? फिल्म की भाषा यौन संदर्भों और गालियों से भरी
है।
नायिकाओं के वस्त्रहीन दृश्य हैं। ब्लैकबोर्ड पर लिखे सफेद अक्षरों की तरह आप साफ पढ़ सकते हैं कि समाज और स्त्रियों के हालात बदले हों या न बदले हों, सिनेमा का चाल-चलन बदल गया है। तथाकथित कलात्मक रुचि की आड़ में क्या कहा और दिखाया नहीं जा सकता, फिल्म इसकी नजीर है। तनिष्ठा का अभिनय बहुत सहज है और वह किरदार में डूबी हैं। यह उनकी बेहतरीन भूमिकाओं में से है। जबकि राधिका खूबसूरत दिखके बावजूद बोलने-बतियाने के ढंग से कहीं-कहीं बाहरी लगती हैं। गुजरात की जमीन पर सुरवीन के शब्दों में पंजाबी लहजा झलक उठता है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि ग्लैमर पक्ष को उन्होंने खूब संभाला है।
उन पर फिल्माए गए दोनों गीत आकर्षक हैं। फिल्म को इसके कैमरावर्क के लिए देखा जा सकता है। जो बहुत खूबसूरत है। हालांकि कथा के लिहाज से कई दृश्य कृत्रिम और जबर्दस्ती गढ़े हुए हैं। बातें यथार्थ से अचानक फिल्मी हो जाती हैं। देखने वाला सूखा-सूखा जाता है, सूखा-सूखा आता है।