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व्यवस्था को लेकर गुस्सा है तो देखे यह फिल्म
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Fri, 10 Oct 2014 03:43 PM IST
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यदि आपके अंदर व्यवस्था को लेकर गुस्सा है तो इक्कीस तोपों की सलामी फिल्म आपके लिए है। समीक्षा पढ़कर जाने क्यों?
सम्मान से जी नहीं सके तो कम से कम मौत सम्मान की मिले। आम आदमी को लेकर यह ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ की फिलॉसफी है। लेकिन इसमें व्यंग्य है। लेखक-निर्देशक रवींद्र गौतम की यह पहली फिल्म है और इस लिहाज से देखें तो उन्होंने एक कठिन विषय का सहज-सटीक ढंग से निर्वाह किया है।
कहानी और फिल्म पर उनकी पकड़ नजर आती है। फिल्म उन दर्शकों को पसंद आएगी जो राजनीतिक धार का सिनेमा पसंद करते हैं। जिनके मन में इस व्यवस्था को लेकर गुस्सा है, मगर वे उसे कहीं दाग नहीं पाते। फिल्म ऐसे लोगों के दिलों को इक्कीस तोपों की सलामी है।
मुंबई में एक सफाई कर्मचारी पुरुषोत्तम नारायण जोशी (अनुपम खेर) रिटायर होने को है। उसने पूरा जीवन इतनी ईमानदारी से जीया कि बेटे शेखर (मनु ऋषि) और सुभाष (दिव्येंदु शुक्ला) तक उसे दुश्मन की नजरों से देखते हैं। मुख्यमंत्री के भाषण लिखने वाली तान्या (अदिति शर्मा) और सुभाष के बीच प्रेम है।
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भ्रष्ट मुख्यमंत्री रंगीन मिजाज भी है और बॉलीवुड स्टार बनने का ख्वाह देखने वाली जयाप्रभा (नेहा धूपिया) से मन बहलाता है। एक तरफ ईमानदारी की नौकरी करते हुए चोरी का आरोप न सह पाने वाले जोशी की मृत्यु होती है और दूसरी तरफ बेईमान मुख्यमंत्री इस सदमे में मर जाता है कि उस पर सिर्फ 12 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है, जबकि हजार करोड़ से कम के घोटाले के नीचे तो कोई स्टेटस नहीं बनता।
मरते हुए जोशी अपने नाराज बेटों से सवाल करता है कि अगर जीते-जी उसकी ईमानदारी की कद्र नहीं हुई तो क्या मरने पर वे उसे 21 तोपों की सलामी दिलवा सकेंगे? पिता की मृत्यु बेटों की आंखें खोल देती है और वे उसकी आखिरी इच्छा पूरी करने के मिशन में जुट जाते हैं।
भ्रष्ट व्यवस्था में ईमानदारी किस कचरापेटी में जा पड़ती है, किसी को खबर तक नहीं होती। लेकिन अच्छा यह है कि तमाम अंधेरे के बीच भी रोशनी की किरण हमेशा जिंदा रहती है। अतः सबसे पहली बात तो यह कि फिल्म की कहानी में नयापन है, जो बेहतर कल की उम्मीद में हमारे आज की बुराइयों पर झाड़ू चलाती नजर आती है। इसमें राजनीतिक व्यवस्था पर तीखे व्यंग्य हैं।
भ्रष्टाचार पर इसमें वार है तो वंशवाद के चेहरे के दाग भी दिखाए गए हैं। फिल्म के कुछ दृश्य बहुत अच्छे हैं और याद रह जाते हैं। ऐसा इधर की फिल्मों में कम होता है। हाल के वर्षों में लीक से हट कर बनी अच्छी फिल्मों में ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ शुमार की जा सकती है।
यहां सभी अभिनेताओं का काम अच्छा है। खास तौर पर दिव्येंदु और अदिति प्रभाव छोड़ते हैं। फिल्म का कैमरावर्क आकर्षक है और दृश्यों को खूबसूरती से शूट किया गया है। इन बातों के बावजूद दर्शकों को बांधे रखने का श्रेय निर्देशक के हिस्से जाता है। जिन्होंने कहानी को भटकने नहीं दिया। गंभीर टिप्पणियों के बीच-बीच में लगातार गुदगुदाते रहे। भविष्य में उनसे और बेहतर सिनेमा की उम्मीद की जा सकती है।
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सम्मान से जी नहीं सके तो कम से कम मौत सम्मान की मिले। आम आदमी को लेकर यह ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ की फिलॉसफी है। लेकिन इसमें व्यंग्य है। लेखक-निर्देशक रवींद्र गौतम की यह पहली फिल्म है और इस लिहाज से देखें तो उन्होंने एक कठिन विषय का सहज-सटीक ढंग से निर्वाह किया है।
कहानी और फिल्म पर उनकी पकड़ नजर आती है। फिल्म उन दर्शकों को पसंद आएगी जो राजनीतिक धार का सिनेमा पसंद करते हैं। जिनके मन में इस व्यवस्था को लेकर गुस्सा है, मगर वे उसे कहीं दाग नहीं पाते। फिल्म ऐसे लोगों के दिलों को इक्कीस तोपों की सलामी है।
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मुंबई में एक सफाई कर्मचारी पुरुषोत्तम नारायण जोशी (अनुपम खेर) रिटायर होने को है। उसने पूरा जीवन इतनी ईमानदारी से जीया कि बेटे शेखर (मनु ऋषि) और सुभाष (दिव्येंदु शुक्ला) तक उसे दुश्मन की नजरों से देखते हैं। मुख्यमंत्री के भाषण लिखने वाली तान्या (अदिति शर्मा) और सुभाष के बीच प्रेम है।
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भ्रष्ट मुख्यमंत्री रंगीन मिजाज भी है और बॉलीवुड स्टार बनने का ख्वाह देखने वाली जयाप्रभा (नेहा धूपिया) से मन बहलाता है। एक तरफ ईमानदारी की नौकरी करते हुए चोरी का आरोप न सह पाने वाले जोशी की मृत्यु होती है और दूसरी तरफ बेईमान मुख्यमंत्री इस सदमे में मर जाता है कि उस पर सिर्फ 12 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है, जबकि हजार करोड़ से कम के घोटाले के नीचे तो कोई स्टेटस नहीं बनता।
मरते हुए जोशी अपने नाराज बेटों से सवाल करता है कि अगर जीते-जी उसकी ईमानदारी की कद्र नहीं हुई तो क्या मरने पर वे उसे 21 तोपों की सलामी दिलवा सकेंगे? पिता की मृत्यु बेटों की आंखें खोल देती है और वे उसकी आखिरी इच्छा पूरी करने के मिशन में जुट जाते हैं।
भ्रष्ट व्यवस्था में ईमानदारी किस कचरापेटी में जा पड़ती है, किसी को खबर तक नहीं होती। लेकिन अच्छा यह है कि तमाम अंधेरे के बीच भी रोशनी की किरण हमेशा जिंदा रहती है। अतः सबसे पहली बात तो यह कि फिल्म की कहानी में नयापन है, जो बेहतर कल की उम्मीद में हमारे आज की बुराइयों पर झाड़ू चलाती नजर आती है। इसमें राजनीतिक व्यवस्था पर तीखे व्यंग्य हैं।
भ्रष्टाचार पर इसमें वार है तो वंशवाद के चेहरे के दाग भी दिखाए गए हैं। फिल्म के कुछ दृश्य बहुत अच्छे हैं और याद रह जाते हैं। ऐसा इधर की फिल्मों में कम होता है। हाल के वर्षों में लीक से हट कर बनी अच्छी फिल्मों में ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ शुमार की जा सकती है।
यहां सभी अभिनेताओं का काम अच्छा है। खास तौर पर दिव्येंदु और अदिति प्रभाव छोड़ते हैं। फिल्म का कैमरावर्क आकर्षक है और दृश्यों को खूबसूरती से शूट किया गया है। इन बातों के बावजूद दर्शकों को बांधे रखने का श्रेय निर्देशक के हिस्से जाता है। जिन्होंने कहानी को भटकने नहीं दिया। गंभीर टिप्पणियों के बीच-बीच में लगातार गुदगुदाते रहे। भविष्य में उनसे और बेहतर सिनेमा की उम्मीद की जा सकती है।