फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   film review of 'david'

डेविडः फिल्म, जो अलग तो है पर अच्छी नहीं

Fri, 01 Feb 2013 03:24 PM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Fri, 01 Feb 2013 03:24 PM IST
विज्ञापन
film review of 'david'

'डेविड' एक ऐसी फिल्म है जो शुरू से लेकर आखिरी तक अपने अलग होने का एहसास कराती रहती है। फिल्म बताती है कि किसी प्रेम कहानी या रिश्तों को जटिलता को इस तरह से भी कहा जा सकता है। डायलॉग डिलवरी से लेकर दृश्यों की फिल्मिंग तक में दर्शकों को इस फिल्म में ताजगी दिख सकती है। बावजूद इसके यह फिल्म दर्शकों का मनोरंजन नहीं कर पाती है, जोकि किसी भी फिल्म की मूल जरूरत है।

विज्ञापन


फिल्म में तीन कहानियां हैं। पहली डेविड की कहानी पिता के साथ सही-गलत संवेदनशील रिश्तों की है। दूसरे डेविड की कहानी कथित धर्मवाद पर है। तीसरे डेविड की कहानी एक खामोशा लव स्टोरी है। निर्देशक इन तीनों ही कहानियों की तह तक उतरते हैं। रिश्तों और समाज का मनोविज्ञान बताने का प्रयास करते हैं लेकिन यह प्रयास ज्यादातर जगह एकतरफा रहता है। फिल्म कई जगह निर्देशक या उनके जैसी सोच रखने वालों की फिल्म बनकर रह जाती है। दर्शक नील नीतिन मुकेश की कहानी से गहरायी से जुड़ना चाहता है।
विज्ञापन


वह जानना चाहता है कि इस डेविड का असली पिता कौन है। लेकिन जैसे ही यह कहानी रिदम पकड़ रही होती है तभी दूसरे डेविड की कहानी आ टपकती है। धर्मांतरण की कहानी वाला ट्रैक थोड़ा अनप्रैक्टिकल होने के साथ कमजोर भी है। गूंगी बहरी लड़की के साथ प्रेम कहानी एक तरफा डेविड की है। दर्शकों के तंतु इस कहानी के साथ नहीं जुड़ पाते। कुल मिलाकर डेविड एक ऐसी फिल्म है जो फिल्मों की भीड़ से अलग तो है पर मनोरंजन की वाजिब जरूरत को पूरा नहीं करती। अब फैसला आप पर है कि फिल्म आप किन जरूरतों के लिए देखते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


कहानी
फिल्म की कहानी तीन अलग-अलग किरदारों की है। डेविड नाम के यह तीनों किरदार अलग-अलग समय में अलग-अलग शहरों में रह रहे होते हैं। पहले डेविड (नील नीतिन मुकेश) की कहानी 1975 में लंदन की है। जहां डेविड को आतंकी गनी का शार्गिद दिखाया गया है। गनी लंदन में रहकर भारत के खिलाफ आतंकी कारवाईयों में मशरूफ है। उसे मारने या पकड़ने के लिए भारतीय सेना के दो अधिकारी वहां पहुंचते हैं। बाद में यह दिखाया जाता है कि डेविड जिस गनी के साथ रह रहा होता है वह उसके पिता का हत्यारा है। बाद में यह भी पता चलता है कि वही उसका असली बाप है। एक समय वह भी आता है जब डेविड गनी को ही मारने के लिए तैयार हो जाता है। बाद की स्थितियां नाटकीय होती हैं और डेविड और गनी दोनों मारे जाते हैं।

दूसरी कहानी मुंबई की है। फिल्म का दूसरा डेविड (विनय विरमानी) मुंबई में रह रहा होता है। यह 1999 की मुंबई है। डेविड की संगीत में रुचि है और उसके पिता की समाज सेवा में। अचानक कुछ हिंदू संगठनों के लोगों द्वारा डेविड के पिता पर हमला बोल दिया जाता है। उस पर आरोप है कि वह हिंदुओं को धर्म बदलकर ईसाई बनने के लिए प्रेरित कर रहा है। डेविड अपने ढंग से उस संगठन के नेताओं से बदला लेने की नाकाम कोशिश करता है। अपने पिता से व्यक्तिगत तौर पर दुश्मीन रखने वाला डेविड बाद में खुद चर्च में फादर बन जाता है।

तीसरी कहानी 2010 की है। शहर है गोवा। गोवा के इर्द-गिर्द बसे एक गांव में यह तीसरा डेविड (विक्रम) रह रहा होता है। उसकी शादी जिस लड़की से होनी होती है वह शादी के दिन ही अपने प्रेमी के साथ भाग जाती है। उसे दोबारा एक गूंगी-बहरी लड़की रोमा (ईशा शेरवानी) से प्यार होता है। रोमा की शादी डेविड के ही दोस्त से हो रही होती है। कई बार प्रयास करने के बाद भी डेविड रोमा तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाता। ठीक शादी के दिन वह रोमा से अपने प्यार का इजहार करने की सोचता है पर वह करता नहीं। अंत के कुछ मिनट में इन तीनों कहानियों को अतार्किक तरीके से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

अभिनय
लगभग तीन घंटे की यह फिल्म यदि चलती है तो बस अपने अभिनय की वजह से। हर कलाकार ने अपने किरदार के साथ जुड़ने की पूरी कोशिश की है। फिल्म की पटकथा ऐसी है कि उन्हें अभिनय करने के मौके भी खूब मिले हैं। फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभावित गूंगी बहरी लड़की के प्यार में डूबे विक्रम ने किया है। लगातार शराब पीने वाले मस्तमौला और बडे दिल के इंसान के रूप में विक्रम जंचे हैं। नील नीतिन मुकेश खामोश रहने वाली भूमिकाओं में अच्छे लगते हैं। घनी मूंछों वाले किरदार में नील की भूमिका प्रभावित करती है। नए कलाकार विनय विरमानी भी अपने किरदार को जी लेते हैं। छोटी-छोटी भूमिकाओं में तब्बू, ईशा सेरवानी, मोनिका डोगरा, लारा दत्ता और सौरभ शुक्ला भी अच्छे लगे हैं।

निर्देशन
विजॉय नॉबियार ने इस फिल्म के पहले 'शैतान' फिल्म बनायी है। 'शैतान' फिल्म का प्लाट कसा हुआ था। उस फिल्म के उलट इस फिल्म में पटकथा बहुत झोल लिए हुए हैं। आप फिल्म के बीच से निकलकर पांच मिनट बाद आइए फिल्म आपकों वहीं की वहीं मिलेंगी। 'डेविड' फिल्म में संवाद तो खूबसूरती के साथ रचे गए हैं, पर कहानी दर्शकों से रिलेट न हो पाने की वजह से वह संवाद प्रभावी नहीं रह गए हैं। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी उसका लंबा होना भी है। दर्शक एक घंटे के बाद ही फिल्म के खत्म होने का इंतजार करने लगते हैं। विजय नॉबियार ने अपने निर्देशकीय पसंद को दर्शकों की पसंद पर कई बार हावी हो जाने दिया है। कई दृश्य ऐसें हैं जिन पर फिल्म आलोचकों की वाह मिल सकती है पर वह दृश्य दर्शकों को समझ नहीं आते।


संगीत
अपनी पहली फिल्म 'शैतान' में विजय ने दो पुराने गानों 'हवा-हवाई' और 'खोया खोया चांद' के रिमिक्स पेश किये थे। इन गानों को इतने बेहतरीन तरीके से रिमिक्स किया गया था कि यह मूल से भी बेहतर लगते थे। इस फिल्म में एक पुराना गाना 'दमादम मस्त कलंदर' लिया गया है। यह गाना अच्छा बन पड़ा है। इस गाने के अलावा बाकी सारे गाने बैकग्राउंड में हैं। ज्यादातर जगहों पर यह गाने दृश्य के बैकग्राउंड म्यूजिक का काम करते हैं। जो फिल्म के साथ तो अच्छे लग सकते हैं पर फिल्म से इतर यह शायद ही सुने जाएं।

क्यों देखें
कुछ ऐसे विषयों के नए फिल्मांकन के लिए जिन पर रूटीन देख-देखकर पक चुके हों।

क्यों न देखें
यदि आप फिल्म से मनोरंजन की उम्मीद करते हों तो।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed