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क्लाइमेक्स हल्का, बाकी सब 'चुलबुल' स्टाईल का

Fri, 21 Dec 2012 03:02 PM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Fri, 21 Dec 2012 03:02 PM IST
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film review of dabangg 2

अगर खामियां निकालने बैठे तो 'दबंग 2' के हर फ्रेम में गलतियां मिल सकती हैं। खासकर फिल्मी समझ और तथ्यों की। लेकिन ऐसा होता नहीं है। 'दबंग 2' जैसी फिल्में देखने वाले दर्शक इन गलतियों पर ध्यान देने या गलतियों की समीक्षा करने नहीं आए हुए होते हैं। उन्हें ढाई घंटे के एक मनोरंजन चाहिए होता है जिसे सलमान खान की यह फिल्म गिरते-पड़ते पूरा कर देती है।

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चंद सेकेंड पहले एक कड़क संवाद बोलने वाले सलमान खान जब कुछ ही देर बाद सामने बज रहे गाने पर नाचने लगते हैं तो दर्शकों को यह सलमान स्टाईल अच्छा लगता है। जब तक यह स्टाईल दर्शकों को अच्छा लगता रहेगा ऐसी माइंड लेस फिल्मी बनती रहेंगी। 'दबंग 2' की अच्छी बात यह है कि यह फिल्म लगातार फिल्म ही लगती है। फिल्म ऐसी एप्रोच नहीं करती कि दर्शक इस फिल्म से अपने को कनेक्ट करें।
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खलनायक से छोटे-छोटे टकरावों, छिट-पुट कॉमेडी और गानों के बीच चल रही इस फिल्म में दर्शकों को सबसे ज्यादा इंतजार क्लाइमेक्स का होता है। पूरी फिल्म में दर्शक क्लाइमेक्स में एक बड़े टकराव की उम्मीद कर रहे होते हैं। पर ऐसा हूबहू नहीं होता। क्लाइमेक्स बड़ा आनन-फानन निपटा दिया जाता है। इस जल्दबाजी की वजह से चुलबुल पांडेय दर्शकों को उतने बड़े नहीं लगते जैसी कि फिल्म में उनकी ओपनिंग होती है। ओपनिंग स्टाईल रजनीकांत से कम नहीं है।
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कहानी
'दबंग टू' की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां से 'दबंग' की कहानी खत्म हुई होती है। फर्क बस इतना है कि 'दबंग' के चुलबुल पांडेय(सलमान खान) लालगंज कस्बे को छोड़कर कानपुर शहर आ जाते हैं। कानपुर की बिगड़ी हुई कानून व्यवस्था को संभालने के लिए। रज्जो(सोनाक्षी सिन्हा), मक्खी(अरबाज खान) और पिता जी(विनोद खन्ना) उनके साथ हैं। छेदी सिंह(सोनू सूद), दबंग फिल्म में खत्म हो चुके हैं। अब कानपुर में उनके सामने दूसरे बड़े बिलेन बच्चा भईया(प्रकाश राज) हैं। प्रकाश राज गैरकानूनी काम करते हैं। एक इंस्पेक्टर होने के बावजूद सलमान खान उनके हर गलत काम को रोकने का प्रयास करते हैं। अकेले दम।

सलमान और उनके बीच चोर-पुलिस की यह जंग तब व्यक्तिगत बन जाती है जब सलमान, बच्चा भईया के एक छोटे भाई को जान से मार देते हैं। बदले में बच्चा भईया चुलबुल के भाई मक्खी और उनकी पत्नी रज्जो पर हमला करते हैं। इस हमले में रज्जो के पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो जाती है। इसी बात का इंतकाम फिल्म का क्लाइमेक्स है। फिल्म में इस कथा के अलावा कोई भी उपकथा या किरदार नहीं है।

अभिनय
फिल्म पूरी तरह से सलमान खान पर केंद्रित है। यदि दूसरा कलाकार स्क्रीन पर होता भी है तब भी उसके साथ सलमान खान स्क्रीन शेयर कर रहे होते हैं। फिल्म के कुछ मिनट ही ऐसे हैं जब सलमान स्क्रीन से बाहर हैं। अभिनय के मामले में सलमान पिछली फिल्म 'दबंग' की फोटो कॉपी जैसे ही लगे हैं। वही फाइटिंग का स्टाईल, वही चुलबुलापन, वही गुस्से के जेस्चर और वही डांस करने का अंदाज। कुछ भी अलग या जुदा इस फिल्म में नहीं रहा। फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा, अरबाज खान और विनोद खन्ना के किरदार बहुत ही सतही तरीके से लिखे और गढ़े गए हैं। इन किरदारों के पास करने के लिए कुछ भी नहीं है। सबसे ज्यादा निराश सोनाक्षी सिन्हा करती हैं। दबंग में तो उनके पास कहने के लिए 'थप्पड़ से नहीं प्यार से डर लगता है साहब' जैसे कुछ संवाद थे भी पर इस फिल्म में उनके पास वह भी नहीं हैं।

वह सलमान खान की पत्नी बनी हैं जो कि बात-बात में रुठ जाती हैं और बिना मनाए मान भी जाती हैं। लंबी चोटी और फुल आस्तीन वाले ब्लाऊज पहने बिल्कुल फिल्मी घरेलू औरत। फिल्म के क्लाइमेक्स सीन में जब उनका बच्चा कोख में ही मर गया होता है तब उनके पास अभिनय करने के चंद सेकेंड होते हैं पर वह, वे मौके भी गवा देती हैं। प्रकाश राज की भूमिका तो अच्छी है पर वह फिल्म में उतने बड़े विलेन नहीं लगे हैं जितने कि वह होने का वह बार-बार दावा करते हैं। प्रतिभाशाली दीपक डोबरियाल का यह फिल्म करना समझ से परे है। फिल्म में उनकी ही नहीं उनके किरदार की भी हत्या हो जाती है।

निर्देशन
'दबंग' का निर्देशन करने वाले अनुभव सिन्हा के हटने के बाद इस फिल्म को अरबाज ने निर्देशित किया है। सलमान जिस तरह के सिनेमा की पैरोकारी करते हैं उसको देखते हुए लगता है कि यह फिल्म सलमान ने खुद अपने लिए डायरेक्ट की है। एक निर्देशक के रूप में अरबाज खान ऐसा कोई जादू नहीं जगाते जिसे देखकर लोग यह कहते कि हां यार अरबाज ने फिल्म अच्छी डायरेक्ट की है। फिल्म के संवाद औसत और सस्ते किस्म के हैं। अरबाज ने इस फिल्म में एक्टिंग भी है। फिल्म में सलमान के सामने उनका किरदार जिस कमजोर ढंग से बिहेव करता है निर्देशन के मामले में भी उन्होंने सलमान खान के सामने वैसे ही हथियार डाले हैं। फिल्म के लेखक दिलीप शुक्ला भी कोई खास प्रभाव पैदा नहीं करते।


संगीत
फिल्म का सबसे बेहतर पक्ष संगीत है। साजिद-वाजिद ने जरूरत के हिसाब से गाने रचे हैं। फिल्म के गाने अलग-अलग पिच और फ्लेवर के हैं। राहत फतेह अली खान और श्रेया घोषाल की आवाज में गाया गया 'तेरे नैना दगाबाज रे' फिल्म को थोड़ा भव्य बनाता है। 'पांडेय जी सीटी' का फ्लेवर वैसा ही है जैसे कि फिल्म का। करीना पर फिल्माया गया आइटम सॉन्ग 'फेवीकोल' सुनने में शरारती और देखने में मनोरंजक लगता है।

क्यों देखें
यदि सलमान के फैन हों तो। यदि नहीं हैं तो ऐसी फिल्म का हिस्सा बनने के लिए जो 200 करोड़ कमाने जा रही है।

क्यों न देखें
यदि इस विश्वास के साथ फिल्म देखने जाएं कि फिल्म हमें प्रभावित कर दे। या यह कुछ ऐसा बताए जो हमें नहीं मालूम था और जिसे जानकर हम बेहतर हुए हों तो।




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