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चश्मेबद्दूरः कहानी वही, मगर 'वो' बात नहीं
रोहित मिश्र
Updated Fri, 05 Apr 2013 03:09 PM IST
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1981 की 'चश्मेबद्दूर' को डेविड धवन ने आज की 'चश्मेबद्दूर' में तब्दील किया है। चूंकि फिल्म 2013 की है इसलिए उन्होंने फिल्म का कैनवास आज की तरह ही रखा है। इस बार दिल्ली की सूनी सड़कें नहीं बल्कि गोवा में समंदर का किनारा है।
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फिल्म का खाका वही है बस इस बार जानबूझ कर चटपटापन थोड़ा बढ़ाया गया है। इसे चटपटेपन को हर दर्शक अलग तरीके से डिफाइन कर सकता है। कुछ को फिल्म में जोड़े गए नए दृश्य हंसा सकते हैं तो कुछ को यह लाउड ऐक्टिंग लग सकती है।
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कॉमेडी की डेविड धवन स्टाईल उन दर्शकों के सर हथौड़े जरूर बरसाएगी जिन्हें संई परंजपे की 'चश्मेबद्दूर' अपनी सिचुएशनल कॉमेडी की वजह से रास आयी थी।
लेकिन ऐसे भी दर्शक होंगे जिन्हें मूल फिल्म थोड़ी धीमी और डल लगेगी। और यह नयी 'चश्मेबद्दूर' 90 के बाद जन्मी उसी पीढ़ी के लिए है।
एक लड़की और तीन प्रेमी
गोवा में सिड (अली जाफर), जय (सिद्धार्थ) और ओमी (दिव्येंदू शर्मा) एक साथ रहते हैं। यह तीनों पक्के दोस्त बेरोजगार हैं। फ्री में रहने के साथ यह फ्री में खाने की भी तरकीबें खोजते हैं। एक दिन इनके पड़ोस में एक खूबसूरत लड़की सीमा (तापसी पन्नू) रहने आती है।
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जय और ओमी बारी-बारी से उसे पटाने में लग जाते हैं। सीमा इन दोनों को ही सबक सिखाती है, लेकिन यह दोनों सिड को कुछ अलग ही कहानी सुनाते हैं। इस बीच सीमा की मुलाकत सिड से होती है। दोनों के बीच प्यार बढ़ने लगता है।
अपना राज खुल जाने के डर से जय और ओमी, सिद्धार्थ की नजरों में सीमा की इमेज गिराने के लिए रोज नई-नई चालें चलते हैं। इनकी चाल सफल हो जाती है। लेकिन जब इन दोनों को लगता है कि सिड, सीमा से सच्चा प्यार करता है तो वे उसकी मदद करने में लग जाते हैं।
बाद में कंन्फ्यूजन साफ होते हैं और सीमा को सिड मिल जाती है। इस कहानी के साथ-साथ फिल्म में जोसफ (ऋषि कपूर) और जोसफनी (लिलिट दूबे) की लव स्टोरी भी चलती है। फिल्म में एक ट्रैक सीमा के पापा और अंकल (अनुपम खेर डबल रोल में) का भी है।
पुराने कलाकारों के आगे फीके
चूंकि फिल्म की स्टाईल नयी है इसलिए अली जाफर, सिद्धार्थ और दिव्येंदू शर्मा की तुलना पिछली फिल्म में यही किरदार करने वाले फारूख शेख, रवि वासवानी और राकेश बेदी से करना गलत होगा। उन्होंने अपने दौर की कॉमेडी की थी और यह डेविड धवन मार्का की कॉमेडी कर रहे थे।
अभिनय में सबसे कमजोर कड़ी सिद्वार्थ लगे हैं। कई बरस पहले 'रंग दे बसंती' में एक छोटी सी भूमिका से ही प्रभावित करने वाले सिद्वार्थ कॉमेडी का सही मटेरियल नहीं लगते। कॉमेडी के अच्छे दृश्यों में उन्होंने ओवरऐक्टिंग की है।
अली जाफर अपनी टाइमिंग से प्रभावित करते हैं। फिल्म के जिन दृश्यों में अली हैं वह दृश्य मेच्योर दिखते हैं। 'प्यार का पंचनामा' फिल्म से अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाले दिव्येंदू शर्मा की यूएसपी उनकी परफेक्ट डायलॉग डिलवरी है। दिव्येंदु के हिस्से सिर्फ शायरी आयी हैं। जो कहीं हंसाती हैं तो कहीं बोर करती हैं। उनका सही इस्तेमाल फिल्म में नहीं होता।
तापसी को हर हीरो के साथ एक-एक गाना गाना था। मुस्कुराना था। जिद्दी लड़की बनना था और बाद में मान जाना था। यह उन्होंने ठीक-ठाक ही कर लिया है। यदि उनसे कुछ अभिनय कराया जाता तो पता पड़ता कि उनके पास अभिनय के नाम पर क्या है।
अनुपम खेर के लिए अभिनय नौकरी करने जैसा हो गया है। जहां का हर दिन याद रखने लायक नहीं होता। ऋषि कपूर ने यह फिल्म शायद दोस्ती निभाने के लिए की है।
खुद को दोहरा रहे हैं डेविड
मूल रूप से सिचुवेशनल कॉमेडी को डेविड धवन ने अपनी स्टाईल से रीमेक किया है। उनकी फिल्म में नायिका अपने प्रेमी को कुत्ते से कटवाती है। झाड़ू से पीटती है। मां अपने बेटे पर चांटों की बरसात करती है। दर्शक लगभग ऐसे ही दृश्यों को जाने कितने ही बार उलट-पलट कर देख चुके होते हैं। उन्हें अब कुछ और चाहिए।
भ्रम और गलतियों के इस प्लाट में कॉमेडी के नए किस्से गढ़े जा सकते थे। मनचले प्रेमी को सबक सिखाने के तरीके दूसरे भी खोजे जा सकते थे। लेकिन शायद डेविड धवन को अभी भी यह लगता है कि दर्शक इतने भर से खुश हैं।
एक निर्देशक के रूप में डेविड इस फिल्म में औसत हैं। उनकी मेकिंग स्टाईल में दोहराव-तिहराव है जिसे वह शायद अपनी विशेषता मान बैठे हैं।
गाने अच्छे हैं, पर हैं ज्यादा
फिल्म के गाने अच्छे हैं और उनका फिल्मांकन मनोरंजक। नए गानों के अलावा 90 के दशक के हिट फिल्मी गानों के मुखडों का प्रयोग चार जगह पर किया गया है। गाने के यह छोटे-छोटे टुकड़े सही जगह प्रयोग किए गए हैं।
"हर एक फ्रेंड कमीना होता है" ऐसा गाना है जिसे फिल्म देख रहा दर्शक साथ में गाना चाहेगा। "अर्ली मार्निंग" और "अंधा घोड़ा रेस में" भी सुनने में अच्छे लगते हैं। फिल्म में गाने अच्छे हैं लेकिन वह इतने ज्यादा हैं कि वह कहीं-कहीं बेझल लगने लगते हैं।
क्यों देखें
एक हल्की फुल्की कॉमेडी फिल्म के लिए जो आपको कम से कम बोर नहीं करेगी।
क्यों न देखें
इसे पुरानी 'चश्मेबद्दूर' जैसी सिचुवेशनल कॉमेडी फिल्म समझकर देखने न जाएं।