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फिल्म समीक्षा/मदारी: आवाज में असर नहीं

Fri, 22 Jul 2016 09:55 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई Updated Fri, 22 Jul 2016 09:55 AM IST
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film review madaari

निर्माताः शैलेष सिंह/सुतपा सिकदर

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निर्देशकः निशिकांत कामत
सितारेः इरफान, जिमी शेरगिल, विशेष बंसल, तुषार दलवी, उदय टिकेकर
रेटिंग **

बाज ने झपट कर चूहे को दबोच लिया। कहानी सच्ची है मगर सुन कर दुख होता है। जब चूहा पलट कर बाज पर हमला करता है तो कहानी सच्ची नहीं लगती लेकिन दिल खुश हो जाता है। निशिकांत कामत की मदारी आपको सच्चाई के रास्तों का आभास दिलाती हुई एक ऐसी ही फंतासी दुनिया में ले जाती है। जहां एक आम आदमी पुल गिरने से दब कर मर गए अपने बेटे का बदला लेने के लिए देश के गृहमंत्री के ‘राजकुमार’ का अपहरण कर लेता है। वह सत्ता से न्याय चाहता है कि जिन लोगों की भागीदारी पुल बनाने में रही उन्हें सजा मिले, तुरंत।

ऐसे मामलों में न्याय की रफ्तार कितनी फाइलों और कमेटियों से होकर गुजरती है यह किसी से छुपा नहीं है। वास्तव में फिल्म में आप न्याय होता हुआ नहीं देखते। यह जरूर नजर आता है कि एक रसूखदार का बच्चा गुम जाए तो सत्ता तथा प्रशासन में बैठे लोग कितनी तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। जमीन-आसमान एक कर देते हैं। वर्ना तो देश में गरीबों, अभावग्रस्तों और सत्ता संपर्क के लाभ से वंचितों के सैकड़ों बच्चे आए दिन गुमते हैं। उनके अपहरण/खरीद-बिक्री/हत्या तक की पुलिस समय पर रिपोर्ट नहीं लिखती। प्रशासनिक दफ्तरों में इसकी कोई सुनवाई नहीं होती।

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आम जन को जगाने की कोशिश करती है फिल्म

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मदारी आम जन को जगाने की कोशिश करती है लेकिन उसकी आवाज में वह दम नहीं कि सुन कर लोग सचमुच जाग जाएं। मदारी संघर्ष के लिए प्रेरित भी नहीं करती। यह बदला लेने के इच्छुक एक ऐसे व्यक्ति की कहानी दिखाती है, जो असमंजस में है कि वह वास्तव में पिता के रूप में अपने बेटे का बदला चाहता है या देश के आम इंसान के रूप में बड़े राजनैतिक/सामाजिक परिवर्तन का आह्वान कर रहा है?

अच्छे अभिनय और बहुरूपियेपन के बावजूद इरफान यहां अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाते। संभवतः एक साथ बहुत सारा कहने की कोशिश में ऐसा हुआ है। कहानी में घटनाक्रम अधिक नहीं हैं और इसलिए वह जल्द ही दर्शक को ढीला छोड़ देती है। स्क्रिप्ट में भी ऐसे बिंदु इक्का-दुक्का ही आते हैं जहां देखने वाले की भावनाओं का ज्वार उमड़े। कई जगह पर लगता है कि ड्रामा पूरी शिद्दत से नहीं उभर सका। फिल्म सच्ची लगते-लगते कभी नकली मालूम पड़ती है और कभी अचानक उसमें असली जैसे तेवर दिखने लगते हैं।

लेखक-निर्देशक पूरे घटनाक्रम के दो अंत दिखाते हैं। अब यह पूरी तरह से दर्शक पर है कि वह किसे स्वीकार करे। अंत में कोई दोषी हथकड़ी लगे या जेल जाते नहीं दिखता। उल्टा जो व्यक्ति अपने ढंग से न्याय मांग रहा था, वही कैद में होता है। यहां आम आदमी का नायकत्व या हीरोइज्म उभर कर नहीं आता। टीवी पर खबरें/भाषण/बहसें, बीते वर्षों में सड़क पर हुए जनांदोलनों के फुटेज और सोशल मीडिया के एकालाप मदारी की मदद नहीं करते। अतः फिल्म अंत तक अपील नहीं करती।

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