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Doordarshan Review: इस फिल्म में जान है, जरूर देखिए मनु ऋषि चड्ढा की संजीव कुमार जैसी अदाकारी

Wed, 26 Feb 2020 11:42 PM IST
Mishra Mishra पंकज शुक्ल, मुंबई
पंकज शुक्ल, मुंबई Published by: Mishra Mishra Updated Wed, 26 Feb 2020 11:42 PM IST
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Doordarshan film review by Pankaj Shukla manu rishi chaddha mahie gill dolly Ahluwalia starrer
Doordarshan - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

Movie Review: दूरदर्शन

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कलाकार: मनु ऋषि चड्ढा, माही गिल, शार्दूल राणा, सुमित गुलाटी, सुप्रिया शुक्ला, राजेश शर्मा और डॉली अहलूवालिया आदि
निर्देशक: गगन पुरी
निर्माता: ऋतु आर्या, संदीप आर्या
रेटिंग: ***


मुंबई में कहानियां हर दूसरे इंसान के पास हैं। हर तीसरा इंसान फिल्म निर्देशक भी बनना चाहता है। ऐसे में किस्मत वाले होते हैं बाहर से आने वाले ऐसे निर्माता जिनकी फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज भी हो जाती हैं। पीवीआर पिक्चर्स ने फिल्म दूरदर्शन रिलीज करके एक तरह से देखें तो बड़ा काम किया है। ये फिल्म ऐसी है जिसे किसी स्टूडियो ने हाथ नहीं लगाया। संजय मिश्रा की फिल्म हर किसी के हिस्से कामयाब की तरह इस फिल्म की किस्मत नहीं है जिसे शाहरुख खान की कंपनी का नाम मिल गया। दूरदर्शन अपने ही नाम से सिनेमाघरों तक पहुंची है। अगर आपने ओटीटी पर ये मेरी फैमिली और गुल्लक जैसी वेब सीरीज देखीं हैं और पसंद की है तो फिर ये फिल्म आपके लिए उसी जायके की है।

Doordarshan film review by Pankaj Shukla manu rishi chaddha mahie gill dolly Ahluwalia starrer
Doordarshan - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

चमचमाती, दमदमाती और दुनिया भर के स्पेशल इफेक्ट्स से लैस फिल्मों के दौर में दूरदर्शन जैसी फिल्में ऋषिकेष मुखर्जी के दौर के सिनेमा की याद दिलाती हैं जहां फिल्म किसी सुपरस्टार पर नहीं बल्कि कहानी पर टिकी होती। फिल्म दूरदर्शन की कहानी एक ऐसे परिवार की है जिसका हर सदस्य अपनी अलग दुनिया में जी रहा है। घर का मालिक सुनील अपनी पत्नी प्रिया के अलग जाकर रहने से परेशान है। बेटा सनी कॉलेज की पढ़ाई से परेशान है। बिटिया की अलग चिंता है। और, घर के एक कमरे में तीस साल से कोमा में लेटी हैं बीजी। सनी को अश्लील किताबें पढ़ने का शौक है और एक दिन बीजी के कमरे में ऐसी ही एक किताब के सस्वर वाचन के दौरान बीजी को होश आ जाता है। बीजी को झटका न लगे सो पूरे घर वाले दूरदर्शन के सुनहरे दिनों वाले दौर को उनके सामने पेश करने के लिए तरह तरह के स्वांग रचते रहते हैं।

फिल्म की शुरुआत ही थोड़ा अतरंगी है। निर्देशक गगन पुरी ने अपनी फिल्म की लिखाई ऐसे की है जैसे सिलाई से बुना जाने वाला स्वेटर। फंदा दर फंदा सिलाई खिसकती जाती है और फिल्म ऊपर चढ़ती रहती है। दूरदर्शन जैसी फिल्में देखने जाने वालों को ज्यादा कुछ उम्मीद फिल्म से नहीं होती लेकिन इस फिल्म के जज्बात आपको रुलाते भी हैं और हंसाते भी। खासतौर से मनु ऋषि चड्ढा और डॉली अहलूवालिया वाले दृश्य फिल्म की जान हैं। मां जब इस बात पर चौंकती है कि बेटा इतने दिनों से उनका मल मूत्र साफ करता रहा है और बेटा जब अपने बचपन में मां की मेहनतों की बात करता है तो माहौल संजीदा हो ही जाता है।

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Doordarshan - फोटो : Social Media

मनु ऋषि चड्ढा मूलत: लेखक हैं। लिखना उनका पेशा नहीं जुनून है। पर, वह अभिनेता भी उतने ही संजीदा बनते जा रहे हैं। फिल्म दर फिल्म उनके भीतर का अभिनेता निखर रहा है। शुभ मंगल ज्यादा सावधान में वह तालियां बटोर चुके हैं। अब दूरदर्शन में वह पुरस्कार जीतने लायक काम कर गए हैं। उन्हें देख संजीव कुमार की याद आती है। अगर उन्हें हिंदी सिनेमा का नया संजीव कुमार कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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Doordarshan film review by Pankaj Shukla manu rishi chaddha mahie gill dolly Ahluwalia starrer
Doordarshan - फोटो : Social Media

बाकी कलाकारों में प्रिया के किरदार में माही गिल के शुरुआती दृश्य थोड़े असहज हैं क्योंकि उनका हिंदी उच्चारण वहां स्पष्ट सुनाई नहीं देता। लेकिन, दिल्ली की सड़कों पर माही को बुलेट की सवारी करते देखना दर्शकों को अच्छा लगता है। और, बेटा जब पिता को उल्टा सीधा कहता है तो तलाक लेने के लिए वापस घर पर रहने आई मां का अपने पति की तरफदारी करने वाला दृश्य उनके अभिनय को खरा साबित कर जाता है। डॉली अहलूवालिया तो बनी ही ऐसे ही किरदारों के लिए हैं। सनी की किताब की नायिका बिमला का नाम सुनते ही उनका गश खाना बहुत सहज बन पड़ा है। मकान मालिक दोस्त के किरदार में राजेश शर्मा और उनकी पत्नी के किरदार में सुप्रिया शुक्ला ने भी फिल्म को सही सहारा दिया है। शार्दूल राणा और सुमित गुलाटी भी स्कूल के दिनों की दोस्ती के अच्छे रंग जमाते हैं।

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Doordarshan - फोटो : Social Media

फिल्म की कमजोर कड़ियां अगर गिनी जाएं तो वह है इसकी जरूरत से ज्यादा लंबी पटकथा और फिल्म का संगीत। गगन पुरी को अपनी ये कहानी थोड़ा और कम समय में समेटनी चाहिए थी और फिल्म का संगीत ऐसा रखना चाहिए था जो फिल्म के कलेवर के हिसाब का हो। फिल्म में एकाध पुराने दौर के संगीत जैसा गाना रखना जरूरी था। सोनी सिंह की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और दिल्ली का माहौल बनाने में कामयाब रहती है। शुभम श्रीवास्तव की एडीटिंग फिल्म की शुरुआत में माहौल जमाने में मदद करती है। अमर उजाला मूवी रिव्यू में फिल्म दूरदर्शन को मिलते हैं तीन स्टार।

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