Dhokha Round D Corner Review: माधवन की साख पर टी सीरीज का बट्टा, खुशाली कुमार ही फिल्म का इकलौता हासिल
रंगनाथन माधवन उर्फ आर माधवन को चाहने वाले लाखों में हैं। उनका चेहरा पोस्टर पर हो तो कम से कम लोग ठिठक कर पोस्टर देख तो लेते हैं। फिल्म ‘रॉकेट्री द नंबी इफेक्ट’ में कमरतोड़ मेहनत के बाद माधवन इस बार पिकनिक मनाने के मूड में दिखते हैं। फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ देखने की इकलौती वजह भी अधिकतर दर्शकों के लिए माधवन ही हैं और इन दिनों बेसिर पैर के गाने और फिल्में बनाने वाली कंपनी टी सीरीज चलाने वाले भी माधवन की ये कीमत जानते हैं। माधवन को पैसे चाहिए। टी सीरीज के मालिक भूषण कुमार की बहन को हीरोइन बनने के लिए एक हीरो चाहिए। निर्देशक कूकी गुलाटी को कुछ ऐसे लोग चाहिए जिनको एक फिल्म के लिए इकट्ठा करके वह खुशाली को हीरोइन बनाकर एक फिल्म में पेश कर सकें। कूकी को फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ में इतना ही काम करना था और वह उन्होंने कर भी दिया। कैसे? चलिए जानने की कोशिश करते हैं।
मुंबई के बोरीबंदर इलाके में समंदर से उठता कैमरा पूरा मुंबई दर्शन कराता हुआ एक ऊंची सी इमारत में दाखिल होता है। जुबिन नौटियाल का गाना बज रहा है। गाना अच्छा भी है। म्यूजिक वीडियो के तौर पर यूट्यूब पर देखा जा सकता है। जुबिन इन दिनों टी सीरीज के नए अरिजीत सिंह बनने की कोशिश में हैं। टी सीरीज के पास नए गायकों को तलाशने, तराशने का वक्त नहीं है। नोरा फतेही को हीरोइन नंबर वन बनाने की कोशिशों में लगी रहने वाली कंपनी का ध्यान फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ पर कतई नहीं रहा, ये इस फिल्म के पहले सीन से मालूम होने लगता है। बढ़िया सोसाइटी है। खूबसूरत सा घर है। घर में मोहब्बत करते करते नफरत करने लगा दंपती है। और, है एक कश्मीरी आतंकवादी जिसका सिर्फ नाम और बोलने का लहजा ही उसे आतंकवादी बताने के लिए काफी है। अपारशक्ति मेहनत अपार करते हैं, लेकिन एक्टिंग की ये मेहनत उनकी कैमरे की पकड़ में बार बार आ जाती है।
फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ की कहानी बहुत सीमित दायरे में रहती है। नाम ही फिल्म का धोखा है तो निर्देशक शुरू से लेकर आखिर तक दर्शकों को भी धोखा देने की जुगत में लगा रहता है। दर्शक जो भी परदे पर देख रहा होता है, निर्देशक थोड़ी देर बाद बताता है कि वह धोखा है। कहानी में धोखे के तत्व एक सीमा के बाद किरदारों के लिए नहीं दर्शकों के लिए डालने शुरू कर दिए जाते हैं और बस यहीं से फिल्म पर से इसे बनाने वालों की पकड़ छूट जाती है। पति दफ्तर गया है। नौकरानी सामान लेने। बीवी अकेले है और आतंकवादी पुलिसवाले की पिस्तौल लेकर बहुमंजिला इमारत की इतनी ऊंचाई वाले फ्लैट में घुस आया है कि वह ऊपर से बोले तो पुलिसवालों को साफ सुनाई दे लेकिन पुलिस वाले बोलें तो उन्हें मेगाफोन लेना पड़े।
किरदारों को लेकर फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ में इतनी अफरातफरी है कि फिल्म देखना अपने आप में एक चुनौती बन जाता है। अगर पुलिस को पता है कि आतंकवादी किस फ्लैट में घुसा है तो उसके निशानेबाज बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर सोसाइटी के लॉन में चहलकदमी क्यों करते रहेंगे? वे तो फ्लैट की ऊंचाई वाली किसी सामने की जगह पर जाकर निशाना साधेंगे और पहले मौके पर ही जब आतंकवादी अकेला खिड़की खोलकर झांकने की कोशिश करेगा तो उसे ढेर कर देंगे। लेकिन, ये टी सीरीज की फिल्म है। अभी खुशाली कुमार को थोड़ा मोहक, थोड़ा मादक दिखना है। फिल्म बनाने का पूरा मकसद ही खुशाली को लॉन्च करना है, और कम से कम इस मामले में टी सीरीज को संतोष हो सकता है कि उसे घऱ में पहले से मौजूद एक हीरोइन से बेहतर हीरोइन इस फिल्म में मिल गई है।
फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ का बस खुशाली कुमार ही हासिल हैं। दिलचस्प ये है कि इस हफ्ते सिनेमाघरों तक पहुंची दोनों प्रमुख फिल्में ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ और ‘चुप रिवेंज ऑफ द आर्टिस्ट’ उन निर्देशकों की फिल्में है जो खुद को एक विचारशील फिल्मकार के रूप में हिंदी सिनेमा में स्थापित करने की इच्छा रखते हैं। लेकिन, दोनों सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों के साथ दिक्कत एक ही है और वह ये कि ये दोनों फिल्में उनके सिनेमा पर दर्शकों के भरोसे पर खरी नहीं उतरती हैं। फिल्म ‘धोखा राउंड द कॉर्नर’ दोनों में कमतर इसलिए है क्योंकि यहां धोखा इतनी बार और कहानी को इतनी बार तोड़ मरोड़ कर दिया गया है कि फिल्म खत्म होने के बाद एक के बाद एक बजने वाले दोनों गाने देखने के लिए सिनेमा हॉल में रुकने का किसी का मन ही नहीं करता।