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Babuji Dheere Chalna Review: रिश्तों की डगर पर ओम कटारे की व्यंग्यात्मक पेशकश, ठहाके लगाकर खूब हंसे दर्शक

Wed, 30 Aug 2023 01:29 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 30 Aug 2023 01:29 PM IST
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BabuJi Dheere Chalna Hindi Play Review by Pankaj Shukla Om Katare Kakal Sonkar Chinica Madurkar Yatri
बाबूजी धीरे चलना रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
बाबूजी धीरे चलना (हिंदी नाटक)
कलाकार
ओम कटारे , काजल सोनकर , चिनिका मदुरकर , साहिल रवि और नमन मुखर्जी आदि
लेखक
ओम कटारे
निर्देशक
ओम कटारे
निर्माता
यात्री थियेटर ग्रुप
रिलीज
29 अगस्त 2023
रेटिंग
4/5

मुंबई के मनोरंजन जगत में सिनेमा और रंगमंच का रिश्ता कुछ कुछ कृष्ण और सुदामा की दोस्ती जैसा है। दोनों का अपना स्वाभिमान है और दोनों के पास एक दूसरे को देने को बहुत कुछ। मुंबई में रंगमंच के दर्शकों का अपना अलग और अनूठा विस्तार है। सप्ताहांत में तो विभिन्न नाट्यगृहों में नाटक देखने वालों का समंदर उमड़ता ही है, कार्यदिवसों में भी इनका उत्साह देखना एक अलग अनुभव है। मुंबई की सबसे प्रतिष्ठित रंगशाला पृथ्वी थियेटर में मंगलवार की शाम लेखक-निर्देशक ओम कटारे और उनके थियेटर ग्रुप यात्री की टीम के नाम रही। हिंदी रंगमंच के वरिष्ठतम कलाकारों में शुमार ओम के नाटकों से जो परिचित हैं, वे जानते है कि उनके व्यंग्य की धार कितनी पैनी होती है। वह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के नाटक बनाते रहे हैं लेकिन उनके हर नाटक में कोई न कोई सामयिक सामाजिक टीस जरूर छुपी होती है। इस बार वह लाए हैं नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’!

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BabuJi Dheere Chalna Hindi Play Review by Pankaj Shukla Om Katare Kakal Sonkar Chinica Madurkar Yatri
बाबूजी धीरे चलना रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कामकाजी पुरुष की प्रेम कहानी
तकरीबन 90 मिनट का हिंदी नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ अपने प्रवाह में ही उत्तम है। नाटक के पहले दो दृश्य ऐसे हैं कि दर्शक खुद को समझाना शुरू कर देता है। पहले दृश्य में एक नवयौवना के साथ प्रेम आलिंगन में बंधा अरविंद अगले ही दृश्य में एक प्रौढ़ महिला के साथ दिखता है। दोनों जगह वह एक ही वेशभूषा में है और फिर धीरे धीरे समझ आना शुरू होता है कि ओम ने लिखावट का वो फॉर्मूला यहां इस्तेमाल किया है जो दर्शकों को शुरू से ही आगे सोचते रहने का विस्तार दे देता है। अब नाटक अपनी गति से आगे बढ़ता है और उधर दर्शक आने वाले दृश्यों के बारे में दर्शक मन ही मन पूर्वानुमान लगाना शुरू कर देते हैं। शैली ये थ्रिलर की है, लेकिन नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ भरपूर कॉमेडी है। सूत्रधार के रूप में यहां अरविंद की अंतरात्मा है। अरविंद के खुद से तमाम सवाल हैं लेकिन ये सवाल ऐसे हैं जो कंधा, आंसू और रूमाल से होते हुए पूरे समाज में बिखरे दिखते हैं। पुरुष और स्त्री के संबंधों की दैहिक, मानसिक और आयुजन्य परिभाषाओं के उत्तर तलाशता नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ वहां सम्पन्न होता है, जहां तक पहुंचने का अगर किसी स्त्री ने मन बना लिया तो सामाजिक ‘क्रांति’ हो सकती है। उसके बाद शायद ही कोई पुरुष ऐसी गलती दोबारा करे।

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BabuJi Dheere Chalna Hindi Play Review by Pankaj Shukla Om Katare Kakal Sonkar Chinica Madurkar Yatri
बाबूजी धीरे चलना रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जीना इसी का नाम है...
मशहूर निर्माता निर्देशक सुभाष घई भी ये नाटक देखने पहुंचे। जो शख्स 47 साल से फिल्में बना रहा हो, उसे हंसने खिलखिलाने पर मजबूर कर देना ही नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ की बड़ी जीत है। 90 मिनट का ये नाटक ओटीटी पर एक धमाल ओटीटी फिल्म की तरह ही है लेकिन सजीव। ओम कटारे हिंदी रंगमंच का ब्रांड बन चुके हैं। उनका नाटक देखने के लिए समय का निवेश करना कभी दर्शकों का गलत फैसला नहीं होता। लोग रंगशाला में दिन भर का तनाव लिए प्रवेश करते हैं और नाटक खत्म होन के बाद बाहर निकलते हैं तो सबके चेहरों पर शांति दिखती है। होठों पर मुस्कुराहट होती है और आंखें स्थिरचित्त होने का प्रमाण देती हैं। अपने ही लिखे नाटक को ओम ने यहां भी स्वयं ही निर्देशित किया है और नाटक का मुख्य पुरुष पात्र अरविंद निभाया भी है। उनके एकपंक्तीय हास्य संवाद कमाल के होते हैं और उन्हें प्रस्तुत भी वह बहुत ही उत्साह के साथ करते हैं।

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बाबूजी धीरे चलना रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अंतरात्मा से संवाद का अनूठा प्रयोग
करीब ढाई महीने की रिहर्सल के बाद हुए नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ के पहले शो में अगर काजल सोनकर की तरफ से पहले ही दृश्य में योग मुद्रा बनाने में हुई छोटी सी गलती को छोड़ दिया जाए तो पूरा नाटक बहुत ही सामंजस्य के साथ सारे कलाकारों ने प्रस्तुत किया। ओम कटारे बतौर अरविंद दो पाटों के बीच फंसे उम्रदराज नौकरीपेशा पुरुष की मनोदशा को बखूबी जीते हैं। और, उनके साथ उनकी अंतरात्मा बने साहिल रवि का संवाद तारतम्य बहुत ही अच्छा है। साहिल रवि नाटक में ठीक उसी समय प्रकट हो जाते हैं जब नाटक जरा सा भी बोझिल होता दिखता है। नाटक की दोनों मुख्य महिला पात्रों तनवी और काव्या की कल्पना भी लेखकीय दृष्टि से बहुत सामयिक है।

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बाबूजी धीरे चलना रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

काजल और चिनिका का प्रशंसनीय अभिनय
नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ में तनवी का किरदार निभाने वाली काजल सोनकर ने अरविंद की मादक, मोहक प्रेयसी के रूप में अच्छा काम किया है। उनकी संवाद अदायगी और इसके साथ में घोली गई कामुकता को वह रंगमंच की पूरी शालीनता के साथ प्रस्तुत करने में सफल रही हैं। हालांकि, काव्या का किरदार निभा रहीं चिनिका मदुरकर के पास अभिनय के लिहाज से मौका इस नाटक में बेहतर है, पर दोनों का संतुलन इस नाटक का ड्रामा अच्छे से अंत तक ले आता है। कबीर के चरित्र में नमन मुखर्जी का काम प्रभावित करता है। खासतौर से उन दृश्यों में जहां वह अरविंद से काव्या के संग अपने रिश्तों की बात कर रहे होते हैं। डिलीवरी बॉय बने राज कुमार और वेटर बने रिदम राठौड़ भी अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे।

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बाबूजी धीरे चलना रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जरा हल्के, हल्के, हल्के..!
नाटक ‘बाबूजी धीरे चलना’ हाल के दिनों में आए दूसरे हिंदी नाटकों से तकनीकी रूप से भी बेहतर नजर आता है। ज्योति मदनानी सिंह की रची वेशभूषा इस नाटक को वास्तविकता के काफी करीब बनाए रखती है। इनायत सामी ने सेट के पूरे भौगोलिक विस्तार का अपने प्रकाश संयोजन के जरिये बेहतर इस्तेमाल करने का मौका नाटक के कलाकारों को देने में सफलता पाई है। क्रुणाल शाह का रचा संगीत नाटक का अभिन्न अंग है और पुराने गाने की एक लाइन तो पूरे नाटक की टैगलाइन ही बन जाती है। ओम कटारे और उनके यात्री थियेटर ग्रुप की टीम ने एक बार फिर सराहनीय नाटक प्रस्तुत करने में सफलता पाई है।

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