Accident Or Conspiracy Godhra Review: चुनाव के बाद आई चुनाव के पहले की फिल्म, जानिए गोधरा में आखिर हुआ क्या था
बहुत हिम्मत, हौसला और धैर्य चाहिए इन दिनों उन फिल्मों को देखने के लिए जो देश के नए या पुराने इतिहास की बात करती हैं। रचनाकारों की रचनाधर्मिता यही कहती है कि वह अतीत, वर्तमान या भविष्य पर कोई टिप्पणी करते समय सहज, संतुलित और निरपेक्ष रहेंगे लेकिन समय भाग रहा है। और, इतनी तेजी से भाग रहा है कि चुनाव के पहले रिलीज होने के लिए बनी फिल्में भी इसके साथ कदमताल करने में पीछे छूट जा रही हैं। मैं समय हूं, जैसी ही कुछ कुछ आवाज लिए अभिनेता शरद केलकर की आवाज यहां फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ में बार बार समय की याद दिलाती रहती है। समय साल 2002 का है। तब घटी घटना के बाद गोधरा और गुजरात मे जो हुआ और अखबारों में जो तस्वीरें उन दिनों की छपी, उनको हू ब हू रीक्रिएट करने की कोशिश करते हुए ये फिल्म इस अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) के साथ शुरू होती है कि ये फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित होने का दावा नहीं करती है। और, खत्म वहां होती है, जहां मुसलमानों की एक भीड़, रेलवे की एक बोगी में आग लगा रही है।
फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ दरअसल गोधरा रेलवे स्टेशन पर अयोध्या से आ रही एक ट्रेन में लगी आग में 59 लोगों के जिंदा जलकर मर जाने को लेकर बने जांच आयोग की कार्यवाही से शुरू होती है। इस सुनवाई के दौरान जिन जिन घटनाओं का जिक्र आता दिखता है, फिल्म में उनकी कहानियां परदे पर काल्पनिक रूप से रची जाती हैं। रणवीर शौरी और मनोज जोशी अलग अलग पक्षों के वकील बने हैं। दोनों का गेटअप ऐसा बनाया गया है कि न भी बताया जाए तो समझ में आ जाए कि कौन, किसकी वकालत कर रहा है। एक पक्ष का पूरा जोर इस घटना को दुर्घटना बताने पर है, दूसरा पक्ष कह रहा है कि नहीं, इसके पीछे पूरी सोची समझी साजिश है। बीच में गोधरा के स्टेशन मास्टर की पारिवारिक कहानी है। उसकी बीवी और बच्चा अयोध्या जा रहे हैं। मस्जिद में अलग अलग जगहों के लोग इकट्ठा हो रहे हैं। रेलवे प्लेटफॉर्म पर लोग मुस्तैद किए जा रहे हैं। खुफिया तंत्र क्या कर रहा होगा उन दिनों, बताया नहीं जाता! मामला बस ट्रेन यात्रियों, अदालत और इन यात्रियों के परिवारों के बीच ऊपर नीचे होता रहता है।
रणवीर शौरी काबिल कलाकार हैं। लेकिन, जिस तरह से वह यहां इस फिल्म में अपने संवाद बोल रहे हैं, उन्हें देखकर तरस आता है कि एक बेहतरीन कलाकार ये क्या कर रहा है? संवाद भी वह अटक अटक कर पढ़ते दिखते हैं और कई बार तो लगता है कि हाथ मे पकड़ी मुकदमे की फाइल में उनके संवाद के ही कागज रखे हैं, जिन्हें देख देखकर वह संवाद बोल रहे हैं। उनके सामने मनोज जोशी हैं। हिंदी सिनेमा के इन दिनों फेवरिट वकील। कभी कॉमेडी फिल्मों में अपने खास गुजराती लहजे के चलते खूब लोकप्रिय हुए मनोज जोशी को भी इस तरह के किरदारों में एक के बाद एक देखकर कोफ्त होती है।
फिल्म को हकीकत के करीब रखने की कोशिश में इसके लेखक-निर्देशक एम के शिवाक्ष ने कार सेवकों की पूरी टोली गुजरात से ही जुटाई है और इनमें से कुछ कलाकारों ने वाकई बेहद प्रभावी काम किया है। पूर्व विधायक हितू कनोडिया गुजराती सिनेमा के लोकप्रिय कलाकार हैं और फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ में स्टेशन मास्टर के किरदार में उनका अभिनय याद रह जाता है। उनकी पत्नी बनीं देनिशा घूमरा का अभिनय भी काफी प्रभावी है। दोनों चूंकि गुजराती के सिद्धहस्त कलाकार हैं लिहाजा हिंदी सिनेमा में हिंदी संवादों के साथ सहज होने में दोनों को समय लगता है लेकिन ट्रेन में आग लगने वाले दृश्य और उसके बाद के दृश्य में दोनों अपना असर छोड़ने मे कामयाब रहे हैं।
केवल क्लाइमेक्स ही रहा असरदार
फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ तकनीकी रूप से भी कमजोर फिल्म है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक यूं लगता है कि दर्शकों को बताता चलता है कि कहां उन्हें कैसे प्रतिक्रिया देनी है या परदे पर इस समय क्या चल रहा है! कला निर्देशन भी बहुत सामान्य है सिवाय ट्रेन में आग लगने वाले दृश्यों को छोड़कर। आग लगने के दृश्यों को फिल्म में बहुत कुशलता से फिल्माया गया है और ये पूरी घटना दर्शकों को विचलित भी कर सकती है। इन दृश्यों में फिल्म के स्टंट निर्देशक अमीत नायकर और मेकअप प्रभारी जैकी कुमार का काम बहुत प्रभावशाली बन पड़ा है। फिल्म में मनोरंजन के तत्व बिरले ही दिखते हैं। पूरी फिल्म एक गंभीर विषय पर बनी है और है भी बहुत गंभीर।