36 Farmhouse Movie Review: संजय-विजय की ओवरएक्टिंग ने बिगाड़ा खेल, पहले ओटीटी प्रयोग में घई की प्रयोगशाला फेल
सुभाष घई की कंपनी मुक्ता आर्ट्स लंबे समय से नए निर्देशकों को फिल्म मेकिंग का मौका देती रही है। मुकुल एस आनंद की फिल्म ‘त्रिमूर्ति’ से लेकर राम रमेश शर्मा की ’36 फार्महाउस’ तक का मुक्ता आर्ट्स का सफर भी अपने आप में किसी फिल्म से कम नहीं है। राज कपूर के बाद हिंदी सिनेमा के दूसरे शो मैन कहलाए सुभाष घई को खुद निर्देशन से दूर हुए आठ साल हो चुके हैं। संजय लीला भंसाली अब नए शो मैन हो चुके है। हालांकि, बीते कुछ साल में सुभाष घई अपनी तमाम सुपरहिट फिल्मों की सीक्वेल को लेकर खूब चर्चा में रहे हैं। पर सुभाष घई के प्रशंसक इन सीक्वेल का अब इंतजार भी नहीं करते। उनको भी पता है बदले माहौल में फिल्में बनाना इतना आसान काम नहीं रहा। बतौर निर्माता घई ने सूरज पंचोली की फिल्म ‘हीरो’ के बाद अब जाकर ये फिल्म बनाई है। फिल्म सुभाष घई और मुक्ता आर्ट्स दोनों की ब्रांडिंग को कमजोर करने वाली एक और फिल्म बनकर रह गई है।
फिल्म ’36 फार्महाउस’ निठल्ला चिंतन है। देश भर में कोरोना फैला हुआ है। सब अपने अपने गांव भाग रहे हैं। बीच रास्ते उतार दिए एक खानसामा को रास्ते में मिली हाउसकीपर एक हवेलीनुमा बंगले में खाना बनाने के लिए ले आती है। बंगले पर जिसका राज है, उसकी मां के दो और बेटे इस बंगले में अपना हिस्सा चाहते हैं। हवेली का रसोइया खाना कम खिचड़ी ज्यादा पकाता है। उसकी एक्सरे जैसी निगाहें उसे किसी जासूस का सा चोला पहनाते चलती है। घर परिवार से विमुख हो चुका बेटा भी इसी बंगले में जब आ धमकता है तो कहानी का रास्ता बदल जाता है। खानसामा पहले ही दावा कर चुका है कि उसके बीवी बच्चे नहीं है। बेटा जिस युवती के साथ आया है, वह बंगले की मालकिन की नातिन है। फिल्म शुरू होते ही एक कत्ल हो चुका है। लाश जिस कुएं में है, उसी के पास खूब धींगामश्ती रची जाती है। कहानी जलेबी सी गोल गोल घूमती हुई जहां पहुंचती है, वहां आकर लगता यही है कि आपने अपने जीवन के सौ मिनट एक ऐसी फिल्म पर जाया कर दिए, जिसका हासिल कुछ नहीं है।
सुभाष घई ने फिल्म ’36 फार्महाउस’ अपनी ही कहानी पर बनाई है। फिल्म की पटकथा में नाम मुक्ता स्टोरी लैब का। फिल्म है भी एक प्रयोगशाला जैसी। लेकिन, ये केमिस्ट्री फेल है। इसका फॉर्मूला ही गड़बड़ निकला। जिस फिल्म में कलाकार अपना गाना तक लिप सिंक न कर सके और निर्देशक भी उसे जैसे तैसे एडिट करके ओटीटी पर ठेल दे तो ये तो किसी भी तरह फिल्म बनाकर रिलीज कर देने की मजबूरी ही हो सकती है। हो ये भी सकता है कि जी5 की प्रयोगशाला की क्वालिटी चेक खिड़की भविष्य की आशंकाओं को देखते हुए बंद हो चुकी हो। सुभाष घई की कंपनी की फिल्म उद्योग में रही साख पर बट्टा लगे बीस बरस हो चुके हैं। चोटी पर पहुंच रहे सितारे ऋतिक रोशन के साथ बनाई उनकी फिल्म ‘यादें’ उनके शानदार करियर का आखिरी चमकता पत्थर रही है। उसके बाद से ये रास्ता अब जिस ’36 फार्महाउस’ तक पहुंचा है, वहां आकर कोई उम्मीद आगे की दिखती नहीं है।
बतौर निर्माता अपनी पिछली फिल्म सूरज पंचोली के साथ बनाने वाली कंपनी मुक्ता आर्ट्स की नई फिल्म ’36 फार्महाउस’ के हीरो विजय राज और संजय मिश्रा हैं। एक दिलचस्प कहानी पर अगर पटकथा अच्छी लिखी गई होती तो मामला ‘विक्टोरिया नंबर 203’ जैसा हो सकता था लेकिन फिल्म की पटकथा और इसका निर्देशन दोनों दोयम स्तर का है। संजय मिश्रा और विजय राज दोनों ओवरएक्टिंग के शिकार हैं। दोनों को ये समझना बाकी है कि उनके प्रशंसक जरूर लाखों में हैं लेकिन वे उनके अभिनय के प्रशंसक हैं, नाम के नहीं। संजय मिश्रा और विजय राज के बाद अश्विनी कलसेकर ने भी ओवरएक्टिंग कम नहीं की है। फिल्म में थोड़ी रौनक बनती दिखती है अमोल पाराशर के बंगले तक पहुंचने के बाद लेकिन तब तक दर्शक का फिल्म देखने का जोश ठंडा पड़ चुका होता है।
बतौर निर्देशक सुभाष घई की फिल्मों में संगीत सबसे मजबूत पक्ष रहा है। अगर ये कहा जाए कि उनकी फिल्मों को धमाकेदार ओपनिंग दिलाने में हर बार उनकी फिल्मों के संगीत ने ही असली काम किया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन, अब वह संजय लीला भंसाली को फॉलो कर रहे हैं। उनकी तरह खुद भी संगीत रच रहे हैं। दोनों का कोई मुकाबला नहीं है। घई खुद को भंसाली के मुकाबले में रखने की कोशिश करना चाहें तो ये उनकी अपनी पसंद है। फिल्म तकनीकी रूप से भी काफी कमजोर फिल्म है। फिल्म देखने में किसी टीवी सीरियल के महाएपीसोड जैसी है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक, संपादन और सिनेमैटोग्राफी में भी कुछ ऐसा नहीं है जिसका अलग से उल्लेख किया जा सके।