दिलीप कुमार की तरह एक्टर बनना चाह रहे थे यश

सुमंत मिश्र/अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 23 Oct 2012 11:27 AM IST
yash wanted to be an actor like dilip kumar
यश चोपड़ा फिल्मों में आए तो थे नायक बनने लेकिन उनके बड़े भाई बीआर चोपड़ा ने उनके कंधे पर निर्देशन की जिम्मेवारी डाल दी। मगर उनमें प्रतिभा इससे भी कहीं बढ़ कर थी।



वे एक संपूर्ण रचनाकार और शिल्पकार थे। इसीलिए जब फिल्म से संन्यास लेने की बात उनकी जुबान से निकली तो वे चिरकाल के लिए इस विधा से दूर चले गए। वह कई बार साक्षात्कारों के दौरान कह चुके थे कि जब तक मेरे शरीर में जान है फिल्म बनाता रहूंगा।



शायद इसीलिए उन्होंने अपनी अंतिम फिल्म का नाम अभी दो महीने पहले रखा था-जब तक है जान। क्या उन्होंने मृत्यु के कदमों की आहट सुन ली थी? यश चोपड़ा अपने पिता से लड़-झगड़ कर पंजाब से बीआर चोपड़ा के पास मुंबई चले आए थे।



दिलीप कुमार के अदाकारी के वे कायल थे और उन्हीं की तरह हीरो बनना चाहते थे। जबकि पिता चाहते थे कि वे इंजीनियर या आईसीएस बनें। लेकिन आठ भाई-बहनों में सबसे छोटे होने के कारण वह सबके लाडले थे। सो बीआर भी उन्हें ना नहीं कर सके।



यश को उन्होंने आईएस जौहर के पास भेजा जो उनके लिए ‘अफसाना’ फिल्म लिख रहे थे। लेकिन जौहर जिस तीखे अंदाज में लोगों से बात कर रहे थे, वह देख कर यश कुछ ही घंटे बाद वापस आ गए। उन्होंने भाई से कहा कि मैं सिर्फ आपके साथ काम करूंगा।



तब पहला काम जो उन्हें सौंपा गया, वह था कलाकारों को शॉट के लिए सेट पर बुलाना, उनके मेकअप रूम में कॉस्ट्यूम लेकर जाना और उनके लिए चाय-नाश्ता से लेकर खाने का इंतजाम कराना। इसी दौरान ‘चांदनी चौक’ की शूटिंग के दौरान वे मीना कुमारी पर फिदा हो गए।



कॉलेज के दिनों से उन्हें शेरो-शायरी का शौक था और साहिर लुधियानवी उनके प्रिय शायर थे। यही कारण था कि मीना कुमारी जब भी शॉट से खाली होती वे उन्हें अपनी शायरी सुनाने लगते। मीना कुमारी को उनकी यह अदा पसंद आई।



जब वह ‘एक ही रास्ता’ की शूटिंग कर रही थी तो उन्होंने भोलेपन से कहा कि यश तुम हीरो क्यों नहीं बन जाते? मैं तुम्हारी सिफारिश भी कर देती हूं। उस समय वे युवा थे और सिर पर अच्छे-खासे बाल भी थे। वे अक्सर कंघी से बाल संवारते रहते थे। इश्क का भूत उन पर ‘आदमी और इंसान’ के समय भी चढ़ा।



जब वह मुमताज के प्यार में दीवाने हुए थे। तब भी वह हीरो बनना चाहते थे। लेकिन जब बीआर चोपड़ा ‘नया दौर’ बना रहे थे, तो फिल्म की हीरोइन वैजयंती माला ने कहा कि हीरो बनने का सपना छोड़ो। तुम बहुत ही अच्छे

निर्देशक बन सकते हो

माला ने कहा कि मैं बीआर साहब से तुम्हारी सिफारिश कर देती हूं। इसके बाद ‘साधना’ के समय वैजयंती माला ने चोपड़ा साहब के सामने यश की तारीफ की तो उन्होंने भी अपने भाई पर भरोसा जताया और ‘धूल का फूल’ के निर्देशन की बागडोर उन्हें सौंप दी।



उनकी पहली फिल्म का विषय बहुत ही संवेदनशील था। लेकिन उन्होंने यथार्थ रूप में इसे परदे पर पेश किया और बड़े भाई का दिल जीत लिया। इसके बाद उन्होंने ‘धर्मपुत्र’ और ‘वक्त’ बनाई। ‘वक्त’ ने कामयाबी के उस घोड़े पर उसे सवार किया, जो उन्हें अपने समकालीनों से दौड़ में सबसे आगे ले गया।

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