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रिस्की भी हो सकता है रीमेक बनाना

Sun, 07 Jul 2013 01:39 PM IST
रमा शर्मा/फीचर डेस्क
रमा शर्मा/फीचर डेस्क Updated Sun, 07 Jul 2013 01:39 PM IST
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hindi film remake may be risky

इधर रीमेक फिल्मों की बाढ़ आयी है। 70 और 80 के बाद अब 90 के दशक की फिल्मों के रीमेक फिल्में भी बन रही हैं। अभी तक जिन भी फिल्मों के रीमेक बने हैं उनकी प्रतिक्रिया मिली जुली ही रही है।

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बॉलीवुड में अब रीमेक के दौर में एक और आयाम जुड़ता दिखाई दे रहा है। बॉलीवुड क्लासिक फिल्मों का मजा एक बार फिर से हिंदी दर्शक उठा सकेंगे, क्योंकि आने वाले समय में आपको कई मशहूर बॉलीवुड क्लासिक फिल्मों के रीमेक देखने को मिलेंगे।
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फिल्म `गोलमाल’ पर `बोल बच्चन’ तो पहले ही बन चुकी है और हिट भी हो गई है। अमिताभ बच्चन की हिट फिल्म `डॉन’ पर फिल्म बनी। साजिद खान ने `हिम्मतवाला’ बनाकर अजय देवगन और तमन्ना के माध्यम से जीतेंद्र और श्रीदेवी का जादू जगाने की कोशिश की। अब यह सिलसिला कभी-कभार नहीं, लगातार चलने वाला है।
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सुना है कि आने वाले समय में फिल्म `अंगूर’, `नरम-गरम’, `चुपके-चुपके’, `खूबसूरत’ के रीमेक भी बनेंगे। `जंजीर' पर रीमेक पूरी होने की प्रक्रिया में है। फिल्म में साउथ के एक्शन हीरो रामचरन तेजा और हीरोइन प्रियंका चोपड़ा हैं।

इनके अलावा `अग्निपथ’, `उमराव जान’ और `शोले’ की भी रीमेक बनीं। `अग्निपथ’ और `उमराव जान’ की रीमेक में तो नाम भी समान ही रखे गए, लेकिन `शोले' की रीमेक चूंकि राम गोपाल वर्मा ने की, तो किरदारों में काफी बदलाव मिला।

हालांकि इन फिल्मों के रीमेक में कहानी, दृश्य संयोजन, किरदारों का चित्रण वगैरह करना इतना कठिन नहीं होगा, लेकिन फिर भी ये रीमेक डायरेक्टर और एक्टर के लिए तलवार की धार पर चलने वाले साबित होंगे।

साउथ की फिल्मों की रीमेक हिंदी दर्शकों के सामने रखना इसलिए आसान साबित होता है, क्योंकि उसमें दर्शक ओरिजनल कहानी से लेकर किरदार, एक्टिंग आदि सबसे नावाकिफ होते हैं। लेकिन एक एवरग्रीन हिंदी फिल्म को वापस परदे पर नए कलेवर में उतारना एक चुनौती है। दर्शक उसके अंदाज, कहानी से अच्छी तरह परिचित होंगे।

उस पुराने हीरो और फिल्म के फैन होंगे। ऐसे में उस छवि को मिटाकर रीमेक को स्थापित करना कहीं ज्यादा कठिन है। उस पर फिल्में अगर ऋषिकेश मुखर्जी जैसे मंझे हुए निर्माता-निर्देशक की हों, तो और मुशि्कल है। अगर इसमें चूके, तो साख पर बन जाने की बात है।

यहां दक्षिण के दर्शक और हिंदी के दर्शकों की भिन्न रुचियों का बहाना नहीं चलने वाला। `हिम्मतवाला’ के रीमेक के बाद साजिद खान की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा में आई कमी इसका ज्वलंत उदाहरण है।


'अंगूर', और `खूबसूरत' जैसी फिल्मों के रीमेक की सूचना आते ही दर्शक भी दिल थाम कर अपनी पसंदीदा फिल्म को एक बार फिर परदे पर साकार किए जाने की प्रतीक्षा करने लगता है।

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