कल्याणजी ने कभी मन्नाडे के बारे में कहा था..

वेद विलास उनियाल/दिल्ली Updated Thu, 24 Oct 2013 06:40 PM IST
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Memoir on manna dey

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कल्याण जी से मिलने जो भी जाता था, वह पूछते अमिताभ से मिले हो कभी। उनका बंगला देखा है कभी। अगर कोई इंकार करता तो कहते अरे मुंबई में आकर फिर क्या किया? जंजीर फिल्म ने एक अध्याय खोला था।
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यहीं से अमिताभ को उंचाई मिली थी। लेकिन बात यहां जंजीर के उस गीत से है, जो अमिताभ पर तो नहीं फिल्माया गया था, लेकिन जंजीर के उस गीत की खासी शौहरत थी।
यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी। मन्नाडे के स्वरों में यह गीत हर जगह गूंज रहा था। कल्याणजी आनंदजी इस धारा के साथ खड़े हो गए। पर्दे पर प्राण पठान बन कर गा रहे थे और पार्श्व में मन्ना डे के स्वर थे।
गीत संगीत की तैयारी ऐसी कि सचमुच पठानी माहौल सा बन गया।  तब जाना कि रबाब बजाने वाले को भी काबुल से बुलाया गया था। मन्ना डे ने उससे कई तरह की जानकारी लेते रहे। वहां के मिजाज को समझते रहे। आप यकीन करेंगे।

उन्होंने गीत का एक एक शब्द का सही उच्चारण समझने की कोशिश की थी। रबाब ढोल और तीन वायलेन के साथ सजा था यह गीत। मन्नाडे ने पूरे रंग में गाया।

कौन कह सकता था कि शास्त्रीय और उदासी के स्वरों के लिए जाने गए मन्ना दा इस तरह के गीत को भी इतनी बखूबी गवा सकते हैं। एक बार उन्होंने कहा कि हम एसडी बर्मन के संगीत के कायल थे।

वह दृश्य सा उत्पन्न कर देते थे। उनके बाउल भटियाली संगीत को सुनते हुए हमारे मन में भी ऐसी धुन सृजन का मन था। सफर का संगीत बनाते हुए एक गीत हमारे पास आया।

नदिया चले चले रे धारा, तुझको चलना होगा। हमने यही सोचा कि इसे मन्ना डे से गवाएंगे। इस गीत के अलापों में चढ़ने उतरने का आभास है।

मन्ना डे को गीत गाना था, साथ में अलाप के लिए हमने बंगाल के लोकगायकों को बुलाया। उनसे कहा गया कि कुछ समय मांझियों के साथ बिताकर देखें।

पानी की लहरों का आभास देने के लिए कागज को हिलाकर देखा गया। पीतल को भी बजाया। बात नहीं जमी। फिर सूप में उड़द की दाल को उछाल उछाल कर देखा गया।

पानी की उछाल का स्वर हमें मिल गया। दार्शनिक गीत को मन्ना डे ने बहुत सुंदरता से गाया था। गीत पूरा होते होते हम समझ गए थे  मन्ना दा बड़ा काम कर गए हैं।

प्यारे लाल की यादों में मन्ना दा


मन्ना डे की गायकी में विविधता और तन्मयता है। इसका अहसास किसी मधुर बयार की तरह है। उनको सुनना ऐसे सुगंधित झोंके की तरह है जो आपको आनंद में डुबा देता है।

शास्त्रीय संगीत, कव्वाली, लोकधुन, और रोमाटिंक गीत क्या नहीं गाया उन्होंने। उनके भटियाली गीतों को हम बहुत मुग्ध होकर सुनते रहे।

अक्सर कहा जाता है कि फिल्म जगत को मन्नाडे से और कुछ मिल सकता था। उनकी प्रतिभा का पूरा उपयोग नहीं हुआ। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर की चर्चा उनके बिना अधूरी है।

वे ऐसे गायक थे, जो पहले गीत संगीत से संतुष्ट होते थे, फिर रियाज करने बैठते थे।बहुत तन्मय होकर गाते थे।  फिल्मों में बहुत से शास्त्रीय गीत इसलिए बन पाए कि मन्नाडे जैसी शख्सियत हमारे पास थी।

सुर ना सजे, लपक झपक तू आ रे बदरवा, कौन आया मेरे मन के द्वारे। बहुत से गीत हैं उनके। उनको हम तबसे देखते आए हैं जब शंकर जयकिशन के साथ हम लोग म्यूजिक में सहयोग दिया करते थे।

दिल का हाल सुने दिल वाला, मुड़ मुड़ के ना देख मुड़ मुड़ के गीतों की याद हमें हैं। बहुत मगन होकर गाते थे।  प्यारेलाल उनके बारे में बता रहे थे, क्या तारीफ करूं उनकी। उनमें हर रंग की गायकी थी।
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