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दिलीप कुमार: उनके पैमाने को पार करना आसान नहीं रहा, सबको रुलाकर दुनिया से चला गया ‘ट्रेजेडी किंग’

Thu, 08 Jul 2021 05:50 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 08 Jul 2021 05:50 PM IST
सार

हिंदी सिनेमा के सबसे निडर अभिनेता होने का तमगा अपने साथ लिए चले गए दिलीप कुमार कुछ महीने और रुकते तो जमाना उनके सौ साल के होने का जश्न धूमधाम से मनाता। लेकिन, उससे पहले पूरे देश और दुनिया में मातम है।

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Legendary Actor Dilip Kumar Known As Tragedy King Know Here About Actor Life Journey
दिलीप कुमार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

विस्तार

रंगीन मुगल-ए-आजम के वक्त बोले, सिनेमा की तासीर मजहब के सारे मतभेद भुला देती है
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‘मैं किसी से नहीं डरता। मैं जिंदगी से नहीं डरता। मौत से नहीं डरता। मैं अंधेरों से नहीं डरता। डरता हूं तो बस खूबसूरती से।’ हिंदी सिनेमा के सबसे निडर अभिनेता होने का तमगा अपने साथ लिए चले गए दिलीप कुमार कुछ महीने और रुकते तो जमाना उनके सौ साल के होने का जश्न धूमधाम से मनाता। लेकिन, उससे पहले पूरे देश और दुनिया में मातम है। सांसों की आवाजाही में पिछले महीने भर से लगातार रुकावट होती रही। उनके नजदीकी उनके सेहतमंद होने की लगातार दुआ करते रहे। लेकिन, हर दुआ कुबूल ही कहां होती है। करोड़ों दुआओं पर ऊपरवाले की मर्जी भारी पड़ी और 11 दिसंबर 1922 को पेशावर, पाकिस्तान में जन्मे युसूफ खान बुधवार को यहां मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में चल बसे।

दिलीप कुमार ने अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी हिंदी सिनेमा के नाम कर दी थी। पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ (1944) से लेकर ‘किला’ (1998) तक वह करोड़ों दिलों पर राज करते रहे। उनकी मेथड एक्टिंग को हिंदी सिनेमा में पीढ़ी दर पीढ़ी तमाम अभिनेताओं ने आगे बढ़ाया। लेकिन, फिर कोई दूसरा दिलीप कुमार न हुआ, न ही आगे होगा। फिल्म ‘मुगले-ए-आजम’ के रंगीन संस्करण की रिलीज पर उन्होंने कहा था, ‘सिनेमा का रंग बदल सकता है। लेकिन, इसकी तासीर ऐसी है जो हर मजहब के इंसान को कंधे से कंधा मिलाकर तीन घंटे एक बंद कमरे में साथ रोने और साथ हंसने के लिए मजबूर कर देती है। सिनेमा की तासीर मजहब के सारे मतभेद भुला देती है।’
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Legendary Actor Dilip Kumar Known As Tragedy King Know Here About Actor Life Journey
दिलीप कुमार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

पहली हिट फिल्म थी जुगनू
- 1955 में आई देवदास से मिला ट्रेजेडी किंग का खिताब
दिलीप कुमार के पूरे करियर को अगर साल दर साल देखें तो उनकी पहली हिट फिल्म ‘जुगनू’ मानी जाती है। उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ का उससे पहले कोई खास असर हुआ नहीं था। उसके बाद बीती सदी के पांचवें दशक में उन्होंने ‘मेला’, ‘अंदाज’, ‘दीदार’ जैसी हिट फिल्मों की लाइन लगा दी। साल 1955 में आई फिल्म ‘देवदास’ ने उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ का खिताब दिया।

राज कपूर-देव आनंद का साथ, हिंदी सिनेमा पर बरसों तक राज
राज कपूर और देव आनंद के दौर में दिलीप कुमार का रुतबा बुलंद से और बुलंद ही होता गया। तीनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा पर साथ-साथ बरसों तक राज किया। लेकिन, ट्रेजेडी किंग की इमेज ने ही दिलीप कुमार को पहली बार दिल का रोग भी दिया। डॉक्टरों ने उन्हें उस दौर में हल्के-फुल्के रोल करने को कहा था।

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हाजी सुल्तान, दिलीप कुमार और सोना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

रखा ऐसा पैमाना जिसे कोई पार न कर सका
-गंगा जमुना से बने प्रोड्यूसर
बीती सदी का सिनेमा सातवें दशक में आई दिलीप कुमार की कालजयी फिल्म मुगले-ए-आजम के नाम रहा। फिल्म में अपने पिता अकबर से बगावत करने वाले शहजादा सलीम का उनका किया हुआ रोल हिंदी सिनेमा का वह पैमाना है, जिसके पार अब तक कोई दूसरा न जा सका। फिल्म गंगा जमुना से दिलीप कुमार प्रोड्यूसर भी बने।

फिल्म दर फिल्म किरदारों से प्रयोग
-हॉलीवुड फिल्म में लीड रोल ठुकरा दिया
फिल्म ‘राम और श्याम’ में उनकी दोहरी भूमिका देखकर तो जमाना उनका दीवाना ही हो गया था। वह फिल्म दर फिल्म अपने किरदारों के साथ प्रयोग करते रहे। और, हॉलीवुड की फिल्मों में चिंदी सा रोल पाकर भी इतराने वाले आज के दौर के कलाकारों से दशकों पहले दिलीप कुमार ने फिल्म ‘लॉरेंस ऑफ अरेबिया’ (1962) का लीड रोल ठुकरा दिया था।

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दिलीप कुमार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

स्टार आते रहे, पर घटा नहीं रुतबा
गुजरती सदी का अगला दशक हिंदी सिनेमा में तमाम नए सितारे लेकर आया। एक तरफ राजेश खन्ना जैसा सुपरस्टार हुआ, जिसने एक के बाद एक हिट फिल्मों की लाइन लगा दी। हिंदी सिनेमा को एंग्री यंगमैन भी मिला, जिसने आशिकों की दुबकती सिसकती इमेज बदल दी। लेकिन, दिलीप कुमार का रुतबा फिर भी कम नहीं हुआ।

बैराग के बाद रुके, फिर चरित्र अभिनेता के तौर पर शुरू सफर
लोग दिलीप कुमार से मोहब्बत करते रहे, दिलीप कुमार अपने किरदारों में नए रंग भरने की कोशिश करते रहे। हालांकि, फिल्म ‘बैराग’ में तीन-तीन दिलीप कुमार भी सिनेमा का वो तिलिस्म जगाने में नाकाम रहे, जिनकी उनसे लोगों ने उम्मीद की थी। वह यहां कुछ वक्त सुस्ताने के लिए रुके। और, फिर 70 एमएम स्क्रीन पर हुई सिनेमा की क्रांति। खुद को दिलीप कुमार का एकलव्य मानने वाले सिनेमा सम्राट मनोज कुमार ने दिलीप कुमार को पहली बार एक चरित्र अभिनेता के तौर पर पेश किया फिल्म ‘क्रांति’ (1981) में। जमाना फिर उन पर निछावर हो गया। वह फिर से जमाने के करीब आ गए। इसके बाद तो ‘शक्ति’, ‘विधाता’, ‘मशाल’ और ‘कर्मा’ तक आते आते वह बीती सदी के इस नौवें दशक के सुपर सितारों की लोकप्रियता पर भारी पड़ने लगे थे।

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दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आमिर-शाहरुख में भी दिलीप कुमार के अभिनय का अक्स
फिर हिंदी सिनेमा में आए सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख खान। और बड़े परदे पर शो मैन सुभाष घई लेकर आए सौदागर (1991)। अपने समकालीन अभिनेता राजकुमार के साथ दिलीप कुमार ने जो ‘इमली का बूटा बेरी का बेर’ गाया तो लोगों को लगा सिनेमा का असली जादू तो यही है। ‘जादू तेरी नजर..’ गाने वाले शाहरुख खान तो दिलीप कुमार की विरासत उन दिनों आगे बढ़ा ही रहे थे, आमिर खान की एक्टिंग में भी अक्सर दिलीप कुमार के अभिनय का अक्स नजर आया।

अधूरा रह गया निर्देशक बनने का ख्वाब
‘सौदागर’ रिलीज होने के पांच साल बाद दिलीप कुमार ने कैमरे के पीछे की कमान भी संभालनी चाही। लेकिन, उनका फिल्म निर्देशक बनने का ख्वाब अधूरा ही रह गया।

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