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मैं कलाकार हूं और आने वाले कल को आकार देने निकला हूं: कैलाश खेर

Wed, 20 Nov 2019 04:11 PM IST
अपूर्वा राय अपूर्वा राय, अमर उजाला
अपूर्वा राय, अमर उजाला Published by: अपूर्वा राय Updated Wed, 20 Nov 2019 04:11 PM IST
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Kailash Kher Special Interview With Amar ujala on his life and Struggle
कैलाश खेर - फोटो : instagram

कैलाश खेर... वो शख्सियत हैं जो सिर्फ गाते नहीं हैं बल्कि जिंदगी को महसूस करके सुरों में ढालते भी हैं। 14 साल की उम्र में संगीत के लिए घर छोड़ देने वाले कैलाश खेर ने बिना किसी गुरु के संगीत सीखा और ऐसा सीखा कि लोग उन्हें सूफी गायक मानने लगे। लेकिन कैलाश खेर खुद को निर्गुण गायक कहलवाना पसंद करते हैं। सफलता के मुकाम पर खड़े कैलाश खेर संगीत को कुछ नया देना चाहते हैं।

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भारतीय लोकगीत और सूफी संगीत को और बढ़ावा देने के लिए कैलाश खेर 21 नवंबर को दिल्ली में 'मेहर रंगत फेस्टिवल' का आयोजन करने वाले हैं। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं कलाकार हूं और आने वाले कल को आकार देने निकला हूं। 'बीती बीती को जाने दें, रह गई को साथ लें', कल को आकार देने के लिए अपने पिता की याद में 21 नवंबर को होने वाले कार्यक्रम के सिलसिले में कैलाश खेर अमर उजाला के दफ्तर में थे। कार्यक्रम नई दिल्ली के इंडिया गेट में शाम पांच बजे से होगा। खेर ने खुद को निर्गुण गायक मानते हुए कहा कि परंपरा को बचाए रखने के लिए वो इस तरह के कार्यक्रम करते रहना चाहते हैं।
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पिता से विरासत में मिला आध्यात्म

कैलाश खेर ने कभी फिल्मी संगीत नहीं सुना लेकिन घर का माहौल धार्मिक था। उनके पिता जी पंडित थे और छोटे-मोटे कार्यक्रम में, मंदिरों में लोकगीत गाया करते थे। इस बारे में कैलाश खेर कहते हैं- मैंने संगीत अपने पिताजी से सीखा, वो भी शौकिया तौर पर। आध्यात्म से मेरा परिचय उनकी गायकी के द्वारा हुआ। बचपन से ही गायकी से पहले मुझे आध्यात्म का परिचय मिला। मैं भी अपने पिता को संगीत और जीवन में अपना गुरु मानता हूं। 

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Kailash Kher Special Interview With Amar ujala on his life and Struggle
कैलाश खेर

पिता की गायन शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया

बचपन में अपनी आवाज से सबका मन मोह लेने वाले कैलाश के लिए आगे की राह आसान नहीं थी। जब उन्होंने गायकी को अपनी जिंदगी बनाने की ठानी तो उनके परिवार ने इसका विरोध किया लेकिन कैलाश भी कहां हार मानने वाले थे। उन्होंने 14 साल की उम्र में संगीत के लिए अपना घर छोड़ दिया। इस दौरान कैलाश काफी घूमे-फिरे। वो जगह-जगह जाकर लोक संगीत के बारे में पढ़ने-जानने लगे। कैलाश के लिए इतनी कम उम्र में इस रास्ते पर निकलना आसान नहीं था। रोजी-रोटी के लिए कैलाश बच्चों को संगीत के ट्यूशन देने लगे।

दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद कैलाश ने साल 2001 में मुंबई का रुख किया। वहां कैलाश गुजारा करने के लिए गायकी के जो ऑफर मिलते, तुरंत अपना लेते। उनके पास स्टूडियो जाने के पैसे नहीं होते थे। घिसी हुई चप्पलें पहने कर कैलाश मुंबई की गलियां छानते थे। कैलाश के लिए ये शहर नया जरूर था लेकिन संगीत के जूनून ने उन्हें इस मुश्किल दौर में हिम्मत दी। इसके बाद कैलाश खेर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने इंडस्ट्री को 'तेरी दीवानी', 'सइयां', 'अल्लाह के बंदे' और 'या रब्बा' जैसे सुपरहिट गाने दिए हैं।

Kailash Kher Special Interview With Amar ujala on his life and Struggle
कैलाश खेर - फोटो : instagram

संगीत में बनाएं करियर

अमर उजाला से हुई बातचीत में कैलाश खेर ने बताया कि वह चाहते हैं कि लोग संगीत को बतौर करियर भी चुनें। इसमें परिवार की तरफ से भी प्रोत्साहन मिलना। वो इस भ्रम को तोड़ना चाहते हैं जिसमें कहा जाता है- संगीत केवल शौक तक ठीक है। इससे पेट नहीं भर सकता।' कैलाश खेर का मानना है कि माता-पिता को संगीत में बच्चे की रुचि जानते हुए उनका समर्थन करना चाहिए। संगीत के कलाकार को तब तक महत्व नहीं दिया जाता जब तक वह फेमस न हो जाए। 

संस्कृति में आईं विकृतियों की दूर करना मकसद

कैलाश खेर कहते हैं हमारी संस्कृति में धीरे-धीरे विकृतियां आ रही हैं जिसे हम तरक्की कहते हैं। संस्कृति का पुनरुत्थान करने के लिए मैं इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहा हूं। इस कार्यक्रम में सात फोक म्यूजिशियन की मंडली परफॉर्म करने जा रही है। मेहर रंगत लोक संगीत और संगीतकारों को बढ़ावा देने के लिए है।  इस कार्यक्रम में ढोल, ताशे, नगाड़े और डुगडुगी जैसे वाद्यों की धुनों पर कैलाश खेर खास प्रस्तुति देंगे।

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