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'अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना...'
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 19 Jan 2013 04:56 PM IST
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जावेद अख्तर साहब के जन्मदिन पर पेश हैं उनकी कुछ चुनी हुई गजलें और गीत। यह वो गीत है जो हमेशा से ही लोगों की जुबां पर रहे हैं। इन गीतों ने संगीत की न जाने कितनी ही महफिलें लूटी हैं। जावेद साहब के यह गीत और गजल कई हिंदी फिल्मों को हिट बनाने में बड़ी भूमिका अदा करते रहे। कुछ वैसे ही जैसे उनके लिखे संवाद। आइए नजर डालते हैं कुछ खास गजल और गीतों पर,
प्यार मुझसे किया तो क्या पाओगी...
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालात की आंधी में बिखर जाओगी।
रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ
ये तो बस मैं हूँ की इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ।
ख़्वाब क्यूं देखूं वो, कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ
मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी।
क्यूं मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे।
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे
हमसफ़र मुझको बनाओगी तो पछताओगी।
एक मैं क्या अभी आएंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने।
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी
प्यार जो मुझसे किया तो क्या पाओगी।
तुमको देखा तो यह ख्याल आया..
तुमको देखा तो ये ख़याल आया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया।
आज फिर दिल ने एक तमन्ना की
आज फिर दिल को हमने समझाया।
तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया।
हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया।
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा..
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,
जैसे, खिलता गुलाब
जैसे, शायर का ख्वाब
जैसे, उजली किरन
जैसे, बन में हिरन
जैसे, चांदनी रात
जैसे नरमी की बात
जैसे, मन्दिर में हो एक जलता दिया, हो...
ओ... एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा।
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,
जैसे, सुबह का रूप
जैसे, सरदी की धूप
जैसे, वीणा की तान
जैसे, रंगों की जान
जैसे, बलखायें बेल
जैसे, लहरों का खेल
जैसे, खुशबू लिये आये ठंडी हवा, हो...
ओ... एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा।
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,
जैसे, नाचता मोर
जैसे, रेशम की डोर
जैसे, परियों का राग
जैसे, सन्दल की आग
जैसे, सोलह श्रृंगार
जैसे, रस की फुहार
जैसे, आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता नशा, हो।
ओ... एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा।
घर से निकलते ही...
घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही
रस्ते में है उसका घर।
कल सुबह देखा तो बाल बनती वो
खिड़की पे आयी नज़र।
मासूम चहरा, नीची निगाहें
भोली सी लड़की, भोली अदायें
न अप्सरा हैं, न कोई परी है
लेकिन यह उसकी जादूगरी है।
दीवाना कर के वो, एक रंग भर के वो
शर्मा के देखे जिधर।
घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही
रस्ते में है उसका घर ...
करता हूं उसके घर के मैं फेरे
हंसने लगे हैं अब दोस्त मेरे
सच कह रहा हूँ, उसकी कसम है
मैं फिर भी खुश हूँ, बस एक ग़म है।
जिसे प्यार करता हूँ, मैं जिसपे मरता हूँ
उसको नहीं है खबर
घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही
रस्ते में है उसका घर ...।
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो...
रूठ ना जाना तुम से कहूं तो
मैं इन आंखों में जो रहूं तो।
तुम ये जानो या ना जानो
मेरे जैसा दीवाना तुम पाओगे नहीं ।
याद करोगे मैं जो ना हूँ तो
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो।
मेरी ये दीवानगी कभी ना होगी कम
जितने भी चाहे तुम कर लो सितम।
मुझसे बोलो या ना बोलो
मुझको देखो या ना देखो
ये भी माना मुझसे मिलने आओगे नहीं।
सारे सितम हंसके मैं सहूं तो
रूठ न जाना जो तुमसे कहूं तो।
प्रेम के दरिया में लहरें हज़ार
लहरों में जो भी डुबा हुआ वही पार
ऊंची नीची नीची ऊंची
नीची ऊंची ऊंची नीची
लहरों में तुम देखूँ कैसे आओगे नहीं
मैं इन लहरों में जो बहूँ तो
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो।
पहले प्यार का पहला गम...
पहले प्यार का पहला ग़म
पहली बार हैं आँखें नम
पहला है तन्हाई का ये मौसम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम
हमने थे देखे साथ जो मिलके सपने रूठ गए
सारे खिलौने कांच के निकले छन से टूट गए
अब हम हैं तन्हाई है एक उदासी छाई है
धड़कन भी है जैसे मद्धम मद्धम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम।
तुम जो नहीं तो दुनिया हमको अच्छी नहीं लगती
तुम जो नहीं तो बात कोई हो सच्ची नहीं लगती
हमने दिल को समझाया सौ बातों से बहलाया
लेकिन दिल का दर्द नहीं होता कम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम
पहले प्यार का पहला गम...
कभी यूं भी तो हो..
कभी यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ।
कभी यूं भी तो हो परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो और तुम आओ।
कभी यूं भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें।
कभी यूं भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ।
कभी यूं भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से।
कभी यूं भी तो हो तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो और तुम आओ।
जाने के लिए मत आना..
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
मैंने पलकों पे तमन्नाएं सजा रखी हैं
दिल में उम्मीद की सौ शम्मे जला रखी हैं
ये हसीं शम्मे बुझाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
प्यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
अब तुम आना जो तुम्हें मुझसे मुहब्बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्म निभाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
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प्यार मुझसे किया तो क्या पाओगी...
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालात की आंधी में बिखर जाओगी।
रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ
ये तो बस मैं हूँ की इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ।
ख़्वाब क्यूं देखूं वो, कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ
मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी।
क्यूं मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे।
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे
हमसफ़र मुझको बनाओगी तो पछताओगी।
एक मैं क्या अभी आएंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने।
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी
प्यार जो मुझसे किया तो क्या पाओगी।
तुमको देखा तो यह ख्याल आया..
तुमको देखा तो ये ख़याल आया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया।
आज फिर दिल ने एक तमन्ना की
आज फिर दिल को हमने समझाया।
तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया।
हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया।
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा..
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,
जैसे, खिलता गुलाब
जैसे, शायर का ख्वाब
जैसे, उजली किरन
जैसे, बन में हिरन
जैसे, चांदनी रात
जैसे नरमी की बात
जैसे, मन्दिर में हो एक जलता दिया, हो...
ओ... एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा।
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,
जैसे, सुबह का रूप
जैसे, सरदी की धूप
जैसे, वीणा की तान
जैसे, रंगों की जान
जैसे, बलखायें बेल
जैसे, लहरों का खेल
जैसे, खुशबू लिये आये ठंडी हवा, हो...
ओ... एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा।
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,
जैसे, नाचता मोर
जैसे, रेशम की डोर
जैसे, परियों का राग
जैसे, सन्दल की आग
जैसे, सोलह श्रृंगार
जैसे, रस की फुहार
जैसे, आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता नशा, हो।
ओ... एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा।
घर से निकलते ही...
घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही
रस्ते में है उसका घर।
कल सुबह देखा तो बाल बनती वो
खिड़की पे आयी नज़र।
मासूम चहरा, नीची निगाहें
भोली सी लड़की, भोली अदायें
न अप्सरा हैं, न कोई परी है
लेकिन यह उसकी जादूगरी है।
दीवाना कर के वो, एक रंग भर के वो
शर्मा के देखे जिधर।
घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही
रस्ते में है उसका घर ...
करता हूं उसके घर के मैं फेरे
हंसने लगे हैं अब दोस्त मेरे
सच कह रहा हूँ, उसकी कसम है
मैं फिर भी खुश हूँ, बस एक ग़म है।
जिसे प्यार करता हूँ, मैं जिसपे मरता हूँ
उसको नहीं है खबर
घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही
रस्ते में है उसका घर ...।
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो...
रूठ ना जाना तुम से कहूं तो
मैं इन आंखों में जो रहूं तो।
तुम ये जानो या ना जानो
मेरे जैसा दीवाना तुम पाओगे नहीं ।
याद करोगे मैं जो ना हूँ तो
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो।
मेरी ये दीवानगी कभी ना होगी कम
जितने भी चाहे तुम कर लो सितम।
मुझसे बोलो या ना बोलो
मुझको देखो या ना देखो
ये भी माना मुझसे मिलने आओगे नहीं।
सारे सितम हंसके मैं सहूं तो
रूठ न जाना जो तुमसे कहूं तो।
प्रेम के दरिया में लहरें हज़ार
लहरों में जो भी डुबा हुआ वही पार
ऊंची नीची नीची ऊंची
नीची ऊंची ऊंची नीची
लहरों में तुम देखूँ कैसे आओगे नहीं
मैं इन लहरों में जो बहूँ तो
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो।
पहले प्यार का पहला गम...
पहले प्यार का पहला ग़म
पहली बार हैं आँखें नम
पहला है तन्हाई का ये मौसम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम
हमने थे देखे साथ जो मिलके सपने रूठ गए
सारे खिलौने कांच के निकले छन से टूट गए
अब हम हैं तन्हाई है एक उदासी छाई है
धड़कन भी है जैसे मद्धम मद्धम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम।
तुम जो नहीं तो दुनिया हमको अच्छी नहीं लगती
तुम जो नहीं तो बात कोई हो सच्ची नहीं लगती
हमने दिल को समझाया सौ बातों से बहलाया
लेकिन दिल का दर्द नहीं होता कम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम
पहले प्यार का पहला गम...
कभी यूं भी तो हो..
कभी यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ।
कभी यूं भी तो हो परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो और तुम आओ।
कभी यूं भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें।
कभी यूं भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ।
कभी यूं भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से।
कभी यूं भी तो हो तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो और तुम आओ।
जाने के लिए मत आना..
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
मैंने पलकों पे तमन्नाएं सजा रखी हैं
दिल में उम्मीद की सौ शम्मे जला रखी हैं
ये हसीं शम्मे बुझाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
प्यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।
अब तुम आना जो तुम्हें मुझसे मुहब्बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्म निभाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना।