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कुछ ऐसा है फिल्मों में संगीत का किस्सा

Sat, 04 May 2013 05:38 PM IST
वेद विलास उनियाल
वेद विलास उनियाल Updated Sat, 04 May 2013 05:38 PM IST
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interesting story of  indian film music

भारतीय फिल्म संगीत अनेक सुनहरे पड़ावों से गुजरा है। 'आलम आरा' पहली बोलती हुई फिल्म थी। लेकिन इससे पहले भी फिल्मों में संगीत था। बेशक यह पार्श्व संगीत नहीं था। फिल्म के पर्दे पर चलते चित्रों के मुताबिक साजिंदे संगीत बजाया करते थे। वह फिल्म के पर्दे के निकट बैठे होते थे। तबला, हारमोनियम और सारंगी बजती। लोग पास में ही बज रहे इस संगीत का मजा लेते थे और उनकी नजरें फिल्म के परदे पर होती थीं।

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लेकिन जब 'आलमआरा' आई तो सब कुछ बदल गया। संगीत बनाना तब भी इतना सरल नहीं था। पहले शूटिंग की जगह पर संगीत रिकॉर्ड होता था। साजिंदे नजर न आएं इसलिए उन्हें वहीं पास में पेड़ या किसी और जगह छिपा कर रखा जाता था। उनकी पहचान छिपाने के लिए कभी-कभार तो उनके शरीर को पत्तों या किसी झाड़ी से भी लपेट दिया जाता था।
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फिल्म संगीत में हमें अपनी संस्कृति के कई रंग दिखे। इन गीतों में सावन के झूले भी हैं, उड़ती पतंगे हैं, गरजती घटाएं है, विरहन की आग है तो बागों की बहार है। प्यार के नग्मों के लिए ऐसी धुनें बजी कि युवा उसमें खो गए। विरहन के ऐसे गीत बजे कि उसकी सिसक चुपचाप सुनी गई। यही भारतीय फिल्म संगीत है, जहां हारमोनियम भी बजा, तो स्पेनिश गिटार भी। जहां मुजरे का संगीत भी सुना गया तो देश प्रेम के तराने भी और हां भारतीय जीवन में रचा बसा भक्ति संगीत भी।
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भारतीय संगीत के इन अलग अलग पड़ावों को समझना जानना भी जरूरी है। यही वह अनमोल चीज है जिसके लिए भारतीय अपने ऊपर नाज कर सकते हैं। तीस के दशक से शुरू हुई यह संगीत यात्रा कई प्रयोगों के साथ आज भी चल रही है। बेशक आज के संगीत पर और बिना अर्थ के गीतों पर कुछ ऐतराज हो सकता है। पर यह भी एक प्रयोगवादी दौर है। कुछ समय यह चलता रहेगा। फिर हमें कुछ नया मिल जाएगा।

1931 में 14 मार्च को मुंबई के मैजिस्टिक सिनेमा में जब पहली बोलती हुई फिल्म 'आलमआरा' आई, तो उसकी पहली अभिव्यक्ति गीत के रूप में ही थी। फिल्म में भिखारी बना पात्र गा रहा था, "दे दे खुदा के नाम पर"। डब्लू एमखान फिल्मों के पहले गायक थे। अफसोस 'आलम आरा' के प्रिंट गीत संगीत अब सुरक्षित नहीं है। 'आलम आरा' क्या बनी फिर तो सवाक फिल्मों की बाढ़ आ गई। 'इंद्रसभा' आई तो अपने साथ 71 गीत लाई। मास्टर निसार की आवाज का जादू छाया।

बताया जाता है कि नितिन बोस के दिमाग में सबसे पहले प्लेबैक सिंगिग की कल्पना आई। 'धूपछांव' में पार्श्वगायन की पहली तकनीक का प्रयोग किया गया। इसमें थोड़ा विवाद है कि पार्श्वगायन की पहला प्रयोग नितिन बोस ने किया या सरस्वती देवी ने। लेकिन यह सब साथ साथ हुआ और फिल्म संगीत में नई हलचल हो गई। गायकों के लिए भी सुविधा हो गई। अब साजिंदे उनसे दूर नहीं बैठते थे।

हालांकि तब भी टीन की दीवार और छत वाले स्टूडियो होते थे। कुछ संगीत निर्देशकों ने इसमे अपने ढंग से प्रयोग भी किए। यह वह दौर था जब कलाकार ही अपने गीत गाते थे। हां इसी समय ग्रामोफोन किसी अजूबे की तरह नजर आया। लोग उसे चहक चहक कर देखते थे, उसमें रस भरे गीत शुरू होते तो उसका आनंद लेते। संकेत यही था कि संगीत अब बदल रहा है। नई तकनीक संगीत को उड़ान देने वाली हैं।

फिल्म संगीत में अगला दौर कुंदन लाल सहगल, पंकज मलिक, आरसी बोराल का था। गायकी में शुद्धता, गजल शायरी और दरबारी परंपरा की झलक भी थी। देखते ही देखते कुंदन लाल के गाए गीत लोगों के मन में बस गए। 'सरस्वती देवी' पहली महिला म्यूजिक डायरेक्टर बनी। नूरजहां, जोहराबाई अंबालेवाली, शमशाद बेगम की आवाज में दिलकश गीत सुने गए। केसी डे, पंकज मलिक और तिमिर बरन, गुलाम हैदर जैसे संगीतकार एक से बढ़ कर एक धुन दे रहे थे। नौशाद, 'शाहजहां' फिल्म के मधुर संगीत से अपनी दस्तक दे चुके थे। "जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करें" गीत हर जगह बज रहा था।

इसके कुछ ही बाद 'बरसात' और 'आवारा' फिल्म के गीतों ने संगीत को नयी परिभाषा दी। सौ सौ सांजिदों के साथ शंकर जयकिशन ने 'बरसात' के लिए अविस्मरणीय धुन बनाई। हर जुंबा पर था, "बरसात में हम से मिले तुम सजन",  "हवा में उड़ता जाए"। या फिर 'आवारा' का गीत "आवारा हूं", रूस, पौलेंड में भी पहुंच गया। रूस में किसी भारतीय को देखते ही वहां लोग गाने लगते थे,  "आवारा हूं"।

इसके बाद का समय भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्ण दौर कहा जा सकता है। संगीत में शंकर जयकिशन, एसडी बर्मन, मदन मोहन, खैय्याम, कल्याणजी आनंदजी, सलिल चौधरी, बसंत देसाई, रामलाल आदि ने नयी किस्म की धुने दीं। उन धुनों पर शानदार गीत लिखे गए। इसी समय लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आरडी बर्मन का जादू भी छाया। मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, शकील, हजरत जयपुरी, भरत व्यास आदि गीतकारों ने बहुत सुंदर नग्मे लिखे।

'मुगले आजम', 'श्री 420', 'मदर इंडिया', 'अनाड़ी', 'सुजाता', 'बंदिनी,'  'पाकिजा' ...   किस फिल्म का नाम छोड़ा जा सकता है। लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश, किशोर, आशा भोसले, गीता दत्त, मन्नाडे के स्वर में बहुत सुंदर गीत लोगों को सुनने को मिले। इस दौर में सुर की बरसात हुई। इस समय हर तरह के गीत बने।  शास्त्रीय, कव्वाली  मुजरा हर रंग का संगीत सुनाई दिया। इस दौर में फिल्मी गीतों से किसी फिल्म को अपना प्रचार मिलता था।

राजेश खन्ना पहले सुपर स्टार बन गए थे, और 'आराधना', 'हाथी मेरे साथी', 'आप की कसम', 'सफर' जैसी फिल्मों के तराने गूंज रहे थे। इसी समय 'बॉबी' आई और युवाओं ने उसे हाथो हाथ ले लिया। 'झूठ बोले कव्वा काटे', 'देता है दिल दे', 'अखियों को रहने दे' गीत का माधुर्य छा गया। इसके बाद जमाना अमिताभ बच्चन का था। 'जंजीर', 'मुकद्रर का सिकंदर', 'डॉन' जैसी फिल्मों के गीत खूब बजे।

इसके बाद फिल्म संगीत करवट लेने लगा। अस्सी के आते आते डिस्को छा गया। जींस में हरे पीले बल्व लगाकर युवा मंच पर थिरकने लगे। इस बीच आया एक गाना "आई एम ए डिस्को डांसर" हर वर्ग में खूब लोकप्रिय हुआ। उधर माइकल जैक्सन का प्रभाव भी दिखा। गीतों का प्रभाव हुआ तो लोग स्टेज शो में गजल की तरफ मुड़ गए। पंकज उदास और अनूप जलोटा को ज्यादा सुना जाने लगा। डिस्को पाश्चात संगीत से प्रभावित रहा। गिटार, स्पेनिश गिटार  की बोर्ड के साथ संगीत में नई धमक आई। इस संगीत के साथ मिथुन के ठुमके थे।

बहुत जल्दी इस संगीत से लोगों का मन ऊबने लगा। अब यह दौर माधुरी और श्रीदेवी जैसी अभिनेत्रियों का था। इन गानों की खासियत इनके लिरिक्स के साथ इनका डांस भी था। "धक धक करने लगा", "एक दो दिन" और "दीदी तेरा देवर दीवाना" जैसे गीत खूब सुने और देखे गए। इसी समय नदीम श्रवण संगीत के आकाश पर छाए। उन्होंने कणप्रिय धुने बनाई। कुमार शानू , उदित नारायण, कविता कृष्णामूर्ति, अलका याज्ञनिक स्टार गायक गायिका बन गए।

इधर गीतों में समीर की कलम चल पड़ी। कई अच्छे तराने लिखे गए। सुमधुर धुन सामने आई।  फिल्म संगीत को एक सितारा ए आर रहमान के रूप में मिला। रहमान के संगीत में जमाना झूमा। हरिहरन ने कई अच्छे गीत गाए। "ताल से ताल मिला", "छोटी सी आशा", "एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा" जैसे गाने अपने लिरिक्स और माधुर्य की वजह से खूब लोकप्रिय हुए।


इसके बाद संगीत में प्रयोग के नाम पर बहुत खेल हुआ। नए संगीतकारों पर पाश्चात धुनों की चोरी का आरोप भी लगा। संगीत ही नहीं गीतों पर भी प्रयोग हुए। हालांकि बीच-बीच में अच्छे गीत भी आते रहे। 2000 के बाद का दौर प्रयोगधर्मी गानों का दौर है। इस दौर में हर तरह के गाने सुने जा रहे हैं। एक साथ इतने तरह का म्यूजिक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कभी भी नहीं था।

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