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EXCLUSIVE : इमरान हाशमी ने खोले 10 खास 'राज'

Mon, 05 Sep 2016 07:33 PM IST
अमित कर्ण/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
अमित कर्ण/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो Updated Mon, 05 Sep 2016 07:33 PM IST
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exclusive interview of imraan hasmi
इमरान हाशमी

इमरान हाशमी भट्ट कैंप के दुलारे रहे हैं। सरल शब्दों में कहें तो इस कैंप के वो कमाऊ पूत साबित हुए हैं। राज, मर्डर और जन्नत को उन्होंने सफल फ्रेंचाइज में तब्दील कर दिया। अब उनकी ब्रैंड राज की एक और फिल्म 'राज रीबूट' चर्चा में है। इमरान हाशमी से खास बातचीत के कुछ अंश : 

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प्रश्न - राज की विरासत को आपने बखूबी संभाला है। इस फ्रेंचाइज के संग अपने सफर को  कितना रोचक, प्रेरक और रोमांचक पाते हैं?

उत्तर - पहली राज में मैं बतौर असिस्टेंट जुड़ा था। वह फिल्म जगत में मेरी शुरुआत भर थी। मैंने उससे बहुत कुछ सीखा। उसके बाद राज 2 और राज 3 मैं फिल्म का हीरो था। राज 2 विक्रम भट्ट ने डायरेक्ट नहीं की थी मगर वह काफी सफल रही। राज 3 से भट्ट कैंप में मेरा कमबैक हुआ। दस सालों के अर्से के बाद। वह फिल्म बहुत कामयाब रही। वह 84 करोड़ का बिजनेस कर हॉरर जॉनर की सफलतम फिल्म बनी। ट्रेड गलियारे को मैसेज गया कि हॉरर भी मेन स्ट्रीम फिल्म हो सकती है। हमने उन लोगों को गलत साबित कर दिया जो कहते थे कि हॉरर में कोई संभावना नहीं। आज की तारीख में राज फ्रेंचाइज 150 करोड़ की हो चुकी है। इसके नाम में रीबूट इरादतन रखा है। वहइसलिए कि हमने बड़े स्केल पर इसे बनाया है। यह हिंदी की पहली हॉरर फिल्म होगी जो रोमानिया जैसे खर्चीले लोकेशन पर शूट हुई है। पैरानॉरमल व सुपरनैचुरल चीजों के सीन दर्शकों को डराएंगे व अचंभित भी करेंगे।
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प्रश्न - आपने न सिर्फ राज बल्कि मर्डर व जन्नत फ्रेंचाइज भी उम्दा तरीके से एक्सेल किया है। सभी में एक अलग इमरान दिखने के लिए आपका की क्या सोच व अप्रोच रहा है?
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उत्तर - स्क्रिप्ट से काफी मदद मिलती रही है। लेखकों ने मुझे अनूठे किरदार निभाने को दिए। उसके चलते उनमें मैं अलग-अलग दिखा और लगा। मैं भी जब कैरेक्टर को पढ़ता हूं तो मेरी कोशिश वरायटी निकालने की रहती है। चाहे कोई भी फिल्म रही हो। मिसाल के तौर पर वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई, डर्टी पिक्चर, शांघाई। मेरी कोशिश रहती है कि परफॉरमेंस, इमोशन व जॉनर के जरिए मैं अपने फैंस को हर बार अनूठा अनुभव देता रहूं। वे चीजें राज रीबूट में भी हैं। 

अजहर की असफलता का कारण स्क्रीनप्ले में कमी थी

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'अजहर' के प्रमोशन के दौरान
प्रश्न - ऐसा हिंदी की हॉरर फिल्मों के साथ क्यों है कि हमें इस जॉनर में भी स्टार वैल्यू चाहिए ही। जबकि कॉन्ज्यूरिंग 2 जैसी हॉलीवुड की हॉरर फिल्म गैर नामचीन चेहरों के साथ भी तगड़ा बिजनेस कर जाते हैं? यहां हमें ऐसी फिल्मों में पॉपुलर व स्‍थापित इमरान हाशमी जैसे चेहरे ही क्यों चाहिए?

उत्तर - ऐसा अपरिहार्य यानी मैनडैटरी तो नहीं है। यहां भी न्यूकमर के साथ ऐसी फिल्में बनाई जा सकती हैं। मेरे अलावा बाकी स्टार यहां यह जॉनर कर भी नहीं रहे हैं। साथ ही हॉरर के एक ही बेहतर डायरेक्टर यहां हैं, वन एंड ओनली विक्रम भट्ट। उनके अलावा और भी बड़े फिल्मकार हॉरर फिल्में बनाते तो स्‍थापित और नए चेहरों को मौका जरूर मिलता।

प्रश्न - टोनी डिसूजा के खाते में हिट फिल्में नहीं रही हैं। उनकी अजहर भी फ्लॉप रही। फिर भी आपने अपने बैनर की पहली फिल्म कैप्टन नवाब उनके संग की। ऐसा क्यों? साथ ही अजहर की विफलता की क्या वजह थी?

उत्तर- मैं हिट-फ्लॉप में यकीन नहीं रखता। मैं निजी तौर पर लोगों व उनकी प्रतिभा पर भरोसा करता हूं। मुझे लगता है कि वो बहुत टैलेंटेड हैं। उन्हें सही स्क्रिप्ट मिले तो वो बहुत अच्छी फिल्म डायरेक्ट कर सकते हैं। अजहर की विफलता की बात करूं तो मूल वजह फिल्म की कहानी अच्छी नहीं थी। कहानी के ईद गिर्द बुना गया तांता सही नहीं था। टोनी ने अच्छी फिल्म बनाई थी पर जिस शख्स पर फिल्म बनी थी, वह विवादास्पद रहे हैं। अदालत ने उन्हें भले ही बाइज्जत बरी किया था मगर दर्शकों के जहन से अजहर का विवाद बाहर नहीं निकला। 

प्रश्न - कैप्टन नवाब की शुरुआत कैसे हुई? कहीं यह एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान की एक्सटेंशन तो नहीं?

उत्तर - अजहर के दो हफ्तों बाद टोनी ने हमें इसकी स्क्रिप्ट सुनाई। वह मुझे इतनी अच्छी लगी कि मैंने इसे खुद प्रोड्यूस करने का मन बना लिया। मैंने खुद प्रोड्यूस इसलिए भी किया कि अपने क्रिएटिव इनपुट भी इसमें दे सकूं। यह किसी भी फिल्म की एक्सटेंशन नहीं है। इसकी कहानी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है। हां एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान का जिक्र यहां इसलिए आ रहा है कि इसका नायक आर्मी ऑफिसर है। कहानी पाकिस्तान भी ट्रैवल करती है। 

 

कैंसर से न घबराकर उसका सामना करें

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मर्डर 2 की सक्सेस पार्टी
प्रश्न - हाल के बरसों में बड़े कॉरपोरेट्स ने सिंगल प्रोड्यूसर्स को ध्वस्त कर दिया है। विशेष फिल्म्स फिर भी मजबूती से अपनी जगह पर टिका हुआ है। नए चेहरों को भी बड़े स्केल पर लॉन्च कर रहा है। इसका श्रेय किसे देना चाहेंगे?

उत्तर - इसका श्रेय भट्ट साहब को दूंगा। उनकी पूरी टीम को भी श्रेय जाता है। तकरीबन 60 फिल्में बनी हैं इस बैनर के तले अब तक। मैंने कॉरपोरेट्स की फिल्में भी की हैं। उनको लेकर एक क्रिटिसिज्म भी है कि उनके आने के बाद से बहुत सारी कंपनी बंद रही हैं। दरअसल होता क्या है कि सिंगल प्रोड्यूसर साल में दो-तीन फिल्में ही बनाते हैं। वो उन्हीं पर फोकस करते हैं। कॉरपोरट में 10-15 फिल्मों पर साथ काम हो रहा होता है। पूरे साल का रोस्टर होता है। तो वहां बिजनेस ज्यादा अहम व हावी रहता है। 

प्रश्न - कैंसर का नाम सुनते ही लोगों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। ऐसे में आप व आप की फैमिली ने कैंसर से घबराए बगैर उसका सामना किया है। लोगों को क्या सजेस्ट करना चाहेंगे?
 
उत्तर - उस संदर्भ में मैंने जब किताब लिखी तो मैंने खासतौर पर जिक्र किया कि इस बीमारी में दवा से ज्यादा उम्मीद बनाए रखने की जरूरत होती है। यह भी कि बच्चों के कैंसर के 70 से 80 प्रतिशत केसेज क्यूरेबल है यानी वो लाइलाज नहीं। अगर किसी बच्चे को कैंसर हुआ तो वह यह मानकर चलें कि कैंसर ट्रीटेबल है। हां उन्हें बेहतर ट्रीटमेंट देनी होगी। ठीक हो जाने पर भी बच्चों को अंडरऑब्जर्वेशन यानी निगरानी में रखना होगा। खुराक और लाइफस्टाइल से संबंधित कोई ढिलाई नहीं चलेगी। 



 

बायोपिक करने में मजा आता है

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अपने परिवार के साथ इमरान
प्रश्न - कॉन्ज्यूरिंग 2 और जंगल बुक या फिर कैप्टन अमेरिका जैसी हॉलीवुड की फिल्में सुनियोजित तरीके से रिलीज हो रही हैं। हॉलीवुड का दखल बढ़ रहा है। क्या कहना चाहेंगे, हमें उनसे खतरा है? 

उत्तर - कंपीटिशन तो हिंदी का हिंदी से भी हो सकता है। मामला इतना है कि आप की फिल्म अच्छी होनी चाहिए। अगर ऐसा है तो सामने हॉलीवुड हो या और कोई वह कामयाब होती है। स्टार वार्स नहीं चली थी। मैं तो सरप्राइज था उससे। यहां पर वहां की साइंस फिक्शन नहीं चल रहीं। 

प्रश्न - अजहर में आपने अपनी इमेज के अपोजिट काम किया था। क्या यह भी एक वजह थी उसकी विफलता की? 

उत्तर - शायद संभव है, मगर मेरा मानना है कि फिल्म अच्छी होगी तो लोग छवि की परवाह नहीं करते। वह अच्छी चीज के साथ बह जाते हैं। प्रॉब्लम लोगों के परसेप्शन की है।

प्रश्न - यानी आगे से आप किसी विवादास्पद शख्सयित की बायोपिक नहीं करेंगे? 

उत्तर - ऐसा नहीं है। मैं करना चाहूंगा। हां कहानी में क्लैरिटी जरूरी है। हमारे तथ्य और दर्शकों  के जहन में व्‍यक्ति विशेष की बसी छवि के बीच ज्यादा फर्क नहीं होना चाहिए। वरना दर्शक आप को खारिज कर देंगे।
 
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