बॉलीवुड फिल्मों के ऐसे हिट डायलॉग्स, जिनसे सुपरहिट हुए एक्टर और फिल्में
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आज खुश तो बहुत होगे तुम। देखो, जो आज तक तुम्हारे मंदिर की सीढियां नहीं चढ़ा। जिसने आज तक तुम्हारे सामने सिर नहीं झुकाया। जिसने आज तक कभी तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े, वो आज तुम्हारे सामने हाथ फैलाए खड़ा है। बहुत खुश होगे तुम। बहुत खुश होगे कि आज मैं हार गया, लेकिन तुम जानते हो कि जिस वक्त मैं यहां खड़ा हूं, वो औरत जिसके माथे से तुम्हारे चौखट का पत्थर घिस गया, वो औरत जिस पर जुल्म बढ़े, तो उसकी पूजा बढ़ी, वो औरत जो जिंदगी भर जलती रही, लेकिन तुम्हारे मंदिर में दीप जलाती रही, वो औरत। वो औरत, आज जिंदगी और मौत के सरहद पर खड़ी है। और ये तुम्हारी हार है।’ 1975 में आई ‘दीवार’ के इस संवाद पर हमने न जाने कितनी बार तालियां बजाईं होंगी, याद नहीं कर सकते।
यह जानते और मानते हुए भी इस तरह और इस शैली में वास्तविक जिंदगी में कोई बात नहीं करता, हम खुश होते थे कि कोई तो है, जो ईश्वर को चुनौती दे रहा है। हम मान कर चलते थे कि वह सिनेमा है। वहां ऐसा ही कुछ होना है। जिंदगी से बड़ी, जिंदगी से अलग। 2017 की शुरुआत में आई ‘रईस’ में शाहरुख खान जब बोलते हैं, ‘जो धंधे के लिए सही, वो सही, जो धंधे के लिए गलत, वो गलत, इससे ज्यादा कभी सोचना नहीं।’
वहीं ‘बादशाहो’ में इमरान बोलते हैं, ‘ये जो समय है न, ये सबकी लेता है, समय समय पर, सही समय पर, सही तरह से लेता है’, तब महसूस होता है, उस पात्र के लिए वही भाषा और वही संवाद सटीक है। वह अपने पात्र से इतर बड़ी बातें नहीं करता।
समय के साथ हिन्दी सिनेमा में हुए ढेर सारे बदलाव
शाहरुख खान या इमरान होने के नाते उसकी शब्दावली नहीं बदल जाती। 2017 में आई फिल्मों के संवादों को देखने पर सिर्फ संवाद ही नहीं, हिंदी सिनेमा के स्वभाव में हो रहे बदलाव को भी सहजता से लक्षित किया जा सकता है। समय के साथ हिन्दी सिनेमा में, जो ढेर सारे बदलाव हुए, उसमें एक यह भी हुआ कि पहले चरित्र अभिनेता के अनुरूप तैयार किए जाते थे, अब अभिनेता अपने को चरित्र के अनुरूप तैयार करते हैं।
इसके पहले भी दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, राजेन्द्र कुमार को कमोबेश अपने अभिनय को, अपनी संवादशैली को, अपने स्टाइल को बदलने का मौका न तो फिल्मकार देना चाहते थे, न ही शायद वे लेना चाहते थे। वास्तव में, उन्हें विरासत में पारसी थिएटर से विकसित हुआ सिनेमा मिला था, जहां अभिनय का लाउड होना अनिवार्य होता था।
या कह सकते हैं, वहां अभिनय का मतलब ही यही था। इसमें एक बड़ा योगदान संवादों का होता था, इसीलिए स्टाइल के साथ अभिनेता अपनी खास संवादशैली ही नहीं, खास संवादों के प्रति भी उस समय सचेत रहा करते थे। हिन्दी सिनेमा के पहले स्टाइल ऐक्टर के रूप में मोतीलाल याद किए जाते हैं।
बाद में प्राण, देवानंद, राजकुमार और शत्रुघ्न सिन्हा ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया। इनकी स्टाइल इनकी यूएसपी थी। इनकी पहचान थी इसीलिए चरित्र कोई भी हो, इनकी स्टाइल में खलल डालने की कोशिश नहीं की जाती थी।
कई अभिनेताओं के लिए विशेष संवाद लिखे जाते थे
‘जिस देश में गंगा बहती है’ का ‘डाकू राका’ हो या ‘जंजीर’ का ‘पठान दोस्त’, प्राण की संवाद अदाएगी को फिल्मकारों ने भरसक से बचा कर रखने की कोशिश की। जाहिर है संवाद भी इन अभिनेताओं के लिए खासतौर पर लिखे जाते थे। कहा जाता है राजकुमार के संवादों में ‘जानी’ लिखने की जरूरत नहीं पड़ती थी, वे खुद जोड़ लेते थे।
आश्चर्य नहीं कि हिन्दी सिनेमा में संवाद चुराने और छीनने का भी इतिहास रहा है। कहा जाता है जब किसी सहनायक या खलनायक के जिम्मे कोई दमदार संवाद चला जाता, तो संवाद लेखक और निर्देशक पर सितारे द्वारा दबाव डाला जाता था कि वह संवाद उसके हिस्से आ जाए, लेकिन टेलीविजन के विस्तार में सिनेमा के लिए अपने आपको सितारों की दुनिया के रूप में सुरक्षित रखना मुश्किल हो गया, तो उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा था कि वह धरातल पर उतर कर अपने दर्शकों के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद के लिए तैयार हो जाए।
जाहिर है, सिनेमा में इरफान खान जैसे अभिनेता ने परदे पर दर्शकों को अब एक ऐसी दुनिया की पहचान दी, जहां वे अपने आपको महसूस कर सकते थे। आमिर खान ने हिन्दी सिनेमा को ‘मेथड ऐक्टिंग’ जैसे शब्द से रूबरू कराया, जहां अभिनेता अपने आपको पात्र के अनुरूप ट्रांसफॉर्म कर लेता है। सिर्फ उसका अभिनय नहीं बदलता पूरा का पूरा व्यक्तित्व बदल जाता है।
व्यक्तित्व के साथ संवाद और संवाद की शैली भी। इसकी शुरुआत भी आमिर की फिल्म ‘दिल चाहता है’ से ही मानी जाती है, जिसे किसी न किसी रूप में हिन्दी सिनेमा को नए व्याकरण से रूबरू कराने का श्रेय दिया जाता है। ‘पद्मावती’ तो अपवाद है, समाचार माध्यमों के विस्तार ने हिन्दी सिनेमा को भी ‘एक समय की बात है..’ के दौर से निकाल कर, आज के समय में विचरण को बाध्य कर दिया।
अब कहानी को केंद्र में रखकर लिखे जाते हैं संवाद
जाहिर है, जब विषय आज के होंगे, तो भाषा भी आज की होगी, संवाद भी आज के होंगे, शैली भी आज की होगी। कल तक अभिनेता को केन्द्र में रख कर पूरी फिल्म संकल्पित की जाती थी, अब कहानी को केन्द्र में रखकर की जा रही है। स्वाभाविक है 2017 हर एक फिल्म के संवादों में कहानी के अनुरूप ताजगी महसूस की जा सकती है।
गौरतलब यह भी है कि संवाद अब फिल्म के साथ इस तरह जुड़े दिख रहे हैं कि अमिताभ बच्चन, राजकुमार या दिलीप कुमार के संवादों की तरह स्वतंत्र रूप से याद भी नहीं कर सकते और अलग से वे महत्वहीन भी हो जाते हैं। ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में परदे पर जब आमिर खान बोलते हैं, ‘तुम जैसे बच्चे होते हैं न सोडे में इस बबल की तरह होते हैं, एक के बाद एक वो ऐसे ही ऊपर आते हैं, अपने आप, उन्हें कोई नहीं रोक सकता।’ बड़ी बात, लेकिन कोई बड़ी शब्दावली नहीं, कोई मुहावरे नहीं, कोई अनावश्यक जोर नहीं, ये हैं 2017 के संवाद, जो समय के साथ समय की शब्दावली में बात करते हैं।
इस नई शब्दावली की मांग ही है कि 2017 में हिन्दी सिनेमा पर लगभग नई पीढ़ी काबिज दिखती है। गिरीश कोहली (मॉम), साकेत चौधरी (हिन्दी मीडियम), मयंक तिवारी (न्यूटन), सिद्धार्थ-गरिमा(टॉयलेट एक प्रेमकथा), अद्वैत चंदन (सीक्रेट सुपरस्टार) जैसे युवा लेखकों ने सलीम जावेद, गुलजार और कादर खान से अलग राह चुनी है, जो हर एक फिल्म के साथ नए मोड़ लेती दिखाई देती है।
फिल्म डायलॉग्स में मुहावरों का इस्तेमाल
ऐसे में जब ‘मॉम’ में नवाजुद्दीन कहते सुनाई देते हैं, ‘भगवान हर जगह नहीं होता, इसलिए तो उसने मां बनाई है’ या ‘हिन्दी मीडियम’ में इरफान कहते हैं, ‘गरीबी में जीना एक कला है। संतोष होता है कि बड़ी बातें सहज प्रचलित शब्दावली में भी कही जा सकती हैं।
वर्ष की चर्चित फिल्म ‘न्यूटन’ में मयंक तिवारी अपने सहज संवादों से भी बड़े सवालों की ओर ध्यान खींचने में सफल होते हैं, ‘मेरे से बहुत पहले भी एक न्यूटन था, पढ़ाई करते वक्त कभी उसकी बात समझ नहीं आई, पर काम करते वक्त आ रही है कि जब तक कुछ नहीं बदलोगे न दोस्त, कुछ नहीं बदलेगा। तो इंतजार करते हैं 2018 का, अपने बीच के कुछ नए शब्द, कुछ नए मुहावरे के लिए, जो सुनाई दे सकते हैं बड़े परदे पर।