गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिल्ली गैंगरेप पर डाक्यूमेंट्री
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आठवां गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ‘स्त्री संघर्ष और स्त्री मुक्ति’ के नाम होगा। इस मौके पर दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ हुए जबरदस्त आंदोलन पर डाक्यूमेंट्री दिखाई जाएगी। आयोजन शुक्रवार की शाम चार बजे सिविल लाइंस स्थित गोकुल अतिथि भवन में होगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस समारोह का उद्घाटन फिल्मकार संजय काक करेंगे। इस मौके पर उनकी नई डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘माटी के लाल’ भी दिखाई जाएगी। उद्घाटन समारोह में बलिया के संस्कृति कर्मी एवं लेखक रामजी तिवारी की किताब आस्कर अवार्ड्स- ‘यह कठपुतली कौन नचावे’ तथा गोरखपुर की समाजशास्त्री डॉ. सुभी धुसिया की किताब ‘परिवार विवाद : कारण और निवारण’ तथा स्मारिका का लोकार्पण होगा। समारोह में फिल्म स्कॉलर ललिथा गोपालन, फिल्म संपादक तरुण भारतीय समेत देश के कई फिल्मकार और कला व संस्कृति से जुड़े लोग मौजूद रहेंगे।
फिल्म समारोह के संयोजक डॉ. चन्द्रभूषण अंकुर, गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह और जन संस्कृति मंच की गोरखपुर इकाई के संयोजक अशोक चौधरी ने बृहस्पतिवार को मीडिया से बातचीत में बताया कि यह समारोह स्त्री संघर्ष और स्त्री मुक्ति के नाम होगा। बताया कि समारोह में एक दर्जन से अधिक फिल्में दिखाई जाएंगी। सिनेमा और डाक्यूमेंट्री पर दो व्याख्यान होंगे।
नई दिल्ली में गैंग रेप के खिलाफ हुए जबरदस्त आंदोलन पर फोटोग्राफर विजय कुमार की डायरी और इस पर एक वीडियो फिल्म भी समारोह का प्रमुख आकर्षण है। समारोह के आखिरी दिन बच्चों की फिल्मों का एक विशेष सत्र रखा गया है जिसमें नितिन दास निर्देशित जादुई पंख श्रृंखला की लघु फिल्मों के अलावा राजन खोसा द्वारा निर्देशित इस वर्ष की चर्चित बाल फिल्म ‘गट्टू’ को भी दिखाया जाएगा। फेस्टिवल का एक और आकर्षण लखनऊ के तरक्की पसंद शायर ताश्ना पर बनी नई डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘अतश’ का प्रदर्शन और शायर अली सरदार जाफरी की जन्मशती के मौके पर उनकी रचनाओं और जिंदगी पर गोरखपुर के डॉक्टर अजीज अहमद की बातचीत भी है।
फिल्म फेस्टिवल का शिड्यूल
22 फरवरीः
शाम पांच बजे निर्देशक संजय काक की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘माटी के लाल’
23 फरवरीः
सुबह 10.30 बजे निर्देशक तपन सिन्हा की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’
दोपहर 2.15 बजे निर्देशक बीजू टोप्पो की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘ प्रतिरोध’
दोपहर 3.30 बजे निर्देशक अमोल, अनुराग, अर्पिता, अवधूत और श्वेता की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘भारत माता की जय’
शाम 4.15 बजे निर्देशक अवनीश सिंह की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘अतश’
शाम 6.45 बजे ललिथा गोपालन की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘हारुद’
24 फरवरीः
सुबह 11 बजे निर्देशक नितिन दास की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘बच्चों की दुनिया’
सुबह 11.30 बजे निर्देशक राजन खोसा की डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘गट्टू’
दोपहर 1.30 बजे निर्देशक रॉबर्ट ब्रेस्सों की ‘मूशेत’
दोपहर 3 बजे निर्देशक गुरविंदर सिंह की ‘अन्हे घोरे दा दान’
शाम 5.30 बजे दिल्ली में रेप कांड के विरोध में हुए आंदोलन (16 दिसंबर) पर फोटोग्राफर विजय कुमार की ‘कैमरा डायरी’
शाम 6 बजे निर्देशक इमरान की ‘रोड टू फ्रीडम दिसंबर 16’ आंदोलन के विडियो का कोलाज
शाम 6.30 बजे ‘शायर अली सरदार जाफरी की याद में एक शाम’
उद्घाटन फिल्म ‘माटी के लाल’
‘अगर देश की सुरक्षा यही होती है कि बेजमीरी जिंदगी के लिए शर्त बन जाए...’, पंजाब के क्रांतिकारी कवि ‘पाश’ की कविता की यह पंक्तियां ‘माटी के लाल’ को जमीर के दौर में लौटाती है। ऐसी दुनिया जहां लोग अब भी गैरबराबरी और अन्याय के खिलाफ डटकर खड़े हैं और एक नई समानता भरी दुनिया के खतरनाक स्वप्न रचते हैं।
फिल्म ‘असुरक्षाओं’ के घोषित खतरनाक और स्वप्निल इलाकों में विचरती है- मध्य भारत में बस्तर, जहां माओवादी हथियारबंद दस्तों ने सरकार के लिए सबसे गंभीर चुनौती खड़ी की है, पूर्वी भारत के ओड़ीसा, जहां समाजवाद का एक पुराना धड़ा आज भी प्रतिरोध के अपने उग्र-अलबत्ता गैरहथियारबंद , विश्वास के साथ खड़ा है। फिर पंजाब, नई अर्थव्यवस्था के साथ हुए सफल साक्षात्कार का जश्न मनाता पंजाब, जहां आशा के नए आदर्श, इंकलाबी देशभक्त भगत सिंह की करिश्माई छवि के इर्द-गिर्द बुने जा रहे हैं।
‘माटी के लाल’ एक तहकीकात है इंकलाबी सपनों और संभावनाओं का, एक ऐसे तथाकथित समय में जब वर्तमान यह दंभ भरता है कि भविष्य को उसने लील लिया है और इतिहास बस एक किताबी बात है।