हमेशा उद्देश्यपूर्ण फिल्में बनाईं शांताराम ने

Vikrant Chaturvedi Updated Mon, 19 Nov 2012 12:49 PM IST
birthday special shantaram always made purposeful films
वी.शांताराम के बिना भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की कल्पना करना असंभव है। उन्होंने न सिर्फ उच्चकोटि की कलात्मक फिल्में बनाईं, बल्कि मौलिक प्रयोगों में भी वे अगुआ रहे। आज 18 नवंबर को उनके जन्मदिन पर भारतीय सिनेमा के लिए उनके योगदान पर एक नजर डालते हैं-

रेलवे वर्कशाप से रंगमंच की ओर

शांताराम ने नाममात्र की शिक्षा पाई थी। जीवन के शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ समय रेलवे वर्कशाप में काम काम किया और बाद में एक नाटक मंडली में काम करने लगे। रंगमंच से जुड़ने की वजह से गीत और संगीत उनका एक मंजबूत पक्ष बन गया। बाद में वे फिल्म इंडस्ट्री के संपर्क में आए और फिल्म निर्देशन की ओर मुड़ गए। शांताराम ने फ़िल्मों की बारीकियाँ बाबूराव पेंटर से सीखीं। बाबूराव पेंटर ने उन्हें 'सवकारी पाश' (1925) में किसान की भूमिका भी दी।

'नेताजी पालकर' से शुरु हुआ सफर
कुछ ही वर्षों में शांताराम ने फ़िल्म निर्माण की तमाम बारीकियाँ सीख लीं और निर्देशन की कमान संभाल ली। बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म 'नेताजी पालकर' थी। बाद में उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 'प्रभात फ़िल्म' कंपनी का गठन किया। अपने गुरु बाबूराव की ही तरह शांताराम ने शुरुआत में पौराणिक तथा ऐतिहासिक विषयों पर फ़िल्में बनाईं। लेकिन बाद में जर्मनी की यात्रा से उन्हें एक फ़िल्मकार के तौर पर नई दृष्टि मिली और उन्होंने 1934 में 'अमृत मंथन' फ़िल्म का निर्माण किया। शांताराम ने अपने लंबे फ़िल्मी सफर में कई उम्दा फ़िल्में बनाईं और उन्होंने मनोरंजन के साथ संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी।

हमेशा उद्देश्यपूर्ण फिल्में बनाईं

शांताराम ने हिन्दी व मराठी भाषा में कई सामाजिक एवं उद्देश्यपरक फ़िल्में बनाई और समाज में चली आ रही कुरीतियों पर चोट की। शांताराम की ‘दो आँखें बारह हाथ’ 1957 में प्रदर्शित हुई। यह एक साहसिक जेलर की कहानी है जो छह कैदियों को सुधारता है। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था। इसे बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में ‘सिल्वर बियर’ और सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के लिए ‘सैमुअल गोल्डविन’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। शांताराम ने 1937 में 'दुनिया ना माने' का निर्माण किया, जिसमें पहली महिला सशक्तिकरण की थीम को प्रस्तुत किया गया था, जो अपने समय से बहुत आगे की सोच थी। देवदास जैसी फिल्मों की लोकप्रियता से फैल रही पलायनवादी सोच के खिलफा उन्होंने 'आदमी' जैसी उत्कृष्ट फिल्म बनाई। सन 1941 में ही उन्होंने हिन्दू-मुसलिम एकता पर आधारित फिल्म 'पड़ोसी' का निर्माण किया था।

उत्कृष्ट और कलात्मक फिल्में

शांताराम ने बाद में प्रभात फ़िल्म को छोड़कर राजकमल कला मंदिर का निर्माण किया। इसके लिए उन्होंने 'शकुंतला' फ़िल्म बनाई। इसका 1947 में कनाडा की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शन किया गया। शांताराम की बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है 'डा.कोटनिस की अमर कहानी'। यह एक देशभक्त डाक्टर की सच्ची कहानी पर आधारित है जो सद्भावना मिशन पर चीन गए चिकित्सकों के एक दल का सदस्य था। 'कोटनीस की अमर कहानी' और 'शकुंतला' उन पहली फिल्मों में थी, जिसका प्रदर्शन विदेशों में भी हुआ। उल्लेखनीय है कि इन फिल्मों को विदेशों में वाहवाही मिली और समीक्षक तथा दर्शकों ने उनकी सराहना की।

संगीत और नृत्य का तालमेल
संगीत उनकी फ़िल्मों का एक मज़बूत पक्ष होता था। वह अपनी फ़िल्मों के संगीत पर विशेष ध्यान देते और उनका ज़ोर इस बात पर रहता कि गानों के बोल आसान और गुनगुनाने योग्य हों। शांताराम की फ़िल्मों में रंगमंच का पुट भी नजर आता है। ‘झनक झनक पायल बाजे’ और ‘नवरंग’ शांताराम की बेहद कामयाब फिल्में रहीं। दर्शकों ने इन फिल्मों के गीत और नृत्य को काफी सराहा और फिल्मों को कई बार देखा।

नए प्रयोगों में आगे रहे शांताराम

शांताराम ने हिन्दी फ़िल्मों में मूविंग शॉट का प्रयोग सबसे पहले किया। पहली बार क्लोजअप का रचनात्मक इस्तेमाल भी उन्हीं की फिल्मों में नजर आता है। इसी तरह से 'चंद्रसेना' फ़िल्म में उन्होंने पहली बार ट्राली का प्रयोग किया। उन्होंने बच्चों के लिए 1930 में रानी साहिबा फ़िल्म बनायी। उन्होंने 1933 में पहली रंगीन फ़िल्म 'सैरंध्री' बनाने का प्रयोग किया था। मगर प्रोसेसिंग में त्रुटियों के कारण इस फिल्म में रंग सही तरीके से उभरकर नहीं आ सके थे। भारत में एनिमेशन का इस्तेमाल करने वाले भी वह पहले फ़िल्मकार थे। वर्ष 1935 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'जंबू काका' (1935) में उन्होंने एनिमेशन का इस्तेमाल किया था।

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