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यार है वो खुशबू की तरह जिसकी जुबां उर्दू की तरह

Sun, 18 Aug 2013 12:06 PM IST
हरि मृदुल
हरि मृदुल Updated Sun, 18 Aug 2013 12:06 PM IST
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birthday special on gulzar

गुलजार नाम तो एक ही है, लेकिन उनके काम अनेक हैं। आखिर उन्हें आप क्या कहकर संबोधित करेंगे? महान गीतकार, फिल्मकार, निर्देशक, कवि, शायर, कथाकार, निबंधकार, अनुवादक या बाल साहित्यकार?

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गुलजार साहब का इतना बड़ा काम है कि उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर एक नजर डालने भर से हर कोई चकरा जाए। दरअसल गुलजार साहब जिस भी विधा में सक्रिय हुए हैं, उसमें अपनी गहरी छाप छोड़ी है। उम्र के इस मोड़ पर भी न तो उनकी कलम रुकती है और न ही उन पर लिखनेवालों की कलम रुक सकती है। किसी संत की तरह गुलजार चुपचाप अपने आपमें मगन रहते हैं।
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फिल्मी दुनिया में होते हुए भी फिल्मी प्रपंच से सौ कोस दूर। उनका बंगला बोस्कियाना जैसे कोई कुटिया है। बहुत कम ऐसे मौके आते हैं, जब वे कुटिया छोड़कर बाहर निकलते हैं। जी नहीं, वे कतई अस्वस्थ नहीं हैं। वे आज भी किसी युवा की तरह ही बैडमिंटन खेलते हैं और सामने वाले को थका डालते की क्षमता रखते हैं।
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यही युवापन उनकी रचनाओं में हरदम मौजूद रहता है। इसीलिए वे आज भी अपने गीतों में सांस में तेरी सांस मिली तो मुझे सांस आई मुझे सांस आई...(फिल्म जब तक है जान) जैसी रोमानियत ले आते हैं या फिर यह कहते मिल जाते हैं कि डार्लिंग आंखों से आंखें चार करने दो...(फिल्म सात खून माफ)।

गुलजार साहब वक्त से कदम मिलाकर चलते हैं। ये हालिया रिलीज फिल्में हैं और यूथ की फिल्में हैं। वरना तो मोरा गोरा रंग लई ले, तेरे बिना जिया जाए ना, फिर वही रात है, दो दीवाने शहर में, बोले रे पपीहरा, हमको मन की शक्ति देना, मुसाफिर हूं यारो, ओ माझी रे, आनेवाला कल, नाम गुम जाएगा, हजार राहें मुड़के देखीं, दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन, रुके रुके से कदम, इस मोड़ से जाते हैं, तुम आ गए हो नूर आ गया है, चप्पा चप्पा चरखा चले, चिकनी चुपड़ी चाची और कजरारे कजरारे... तक सैकड़ों ऐसे गाने हैं, जिनमें जीवन का हर रंग मौजूद हैं।

आज ऐसा कोई गीतकार नहीं, जो गुलजार की स्टाइल न अपनाना चाहता हो। लेकिन सच यही है कि गुलजार भरपूर प्रेरक हैं, लेकिन उनकी नकल नहीं की जा सकती। इस मामले में वे बहुत कठिन है। उनके जैसे शब्दों का चयन और भंगिमा एक दुर्लभ स्थिति है। गुलजार साहब और गीत तो पर्याय हो ही चुके हैं, लेकिन उनकी सृजनात्मकता के दूसरे पक्ष भी उतने ही चमकदार हैं।

फिल्मकार और लेखक भी

मेरे अपने, परिचय, आंधी, मौसम, किनारा, खुशबू, नमकीन, अंगूर, इजाजत, अचानक, मीरा, लेकिन, लिबास और माचिस जैसी उनकी फिल्में मील का पत्थर हैं और क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। मिर्जा गालिब जैसे धारावाहिक का निर्देशन छोटे परदे पर श्रेष्ठता का जैसे एक मापदंड बन चुका है।

उर्दू साहित्य में गुलजार एक बड़ा नाम हैं। चौरस रात, रावी पार, पुखराज, चांद पुखराज का और त्रिवेणी जैसी कृतियां उन्हें कालजयी साहित्यकार भी साबित करती हैं। बच्चों के लिए जितना काम गुलजार साहब का है, बड़े से बड़ा साहित्यकार भी उनसे प्रेरणा ले सकता है। बोस्की का पंचतंत्र जैसी नायाब कृति भारतीय बाल साहित्य में अहम स्थान रखती है। इधर हिंदी की शीर्ष साहित्यिक पत्रिका ज्ञानोदय में वे नियमित रूप से लिख रहे हैं। उनका स्तंभ खासा चर्चित भी है।

हां, गुलजार साहब इस मामले में भी धनी रहे हैं कि उन्हें भरपूर सम्मान मिला है। उनके चाहनेवालों की संख्या करोडों में है। जहां उन्हें फिल्मों में रचनात्मक कार्य के लिए कई बार राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, वहीं वे साहित्यिक लेखन के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड से भी सम्मानित हुए हैं। ऑस्कर अवार्ड पाने वाले वे पहले भारतीय गीतकार हैं।


बाकी फिल्म फेयर या स्क्रीन जैसे तमाम लोकप्रिय अवार्ड तो उन्हें अब भी मिलते ही रहते हैं। वे उस मुहाने पर खड़े हैं, जब उन्हें फिल्मों में अवदान के लिए दिया जानेवाला सर्वोच्च दादा साहब फाल्के अवार्ड कभी भी मिल सकता है और साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार माना जानेवाला ज्ञानपीठ भी उनसे कुछ ही कदम दूर है।

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