सीट का समीकरण: इस सीट ने बसपा को शून्य होने बचाया, पिछले पांच चुनाव से है उसका दबदबा, ऐसा है रसड़ा का इतिहास
बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट पर 2002 से बसपा ने लगातार पांच चुनाव में जीत दर्ज की है। 1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां अपनी पहली जीत दर्ज की थी। वहीं, सपा को अब तक यहां सफलता नहीं मिल सकी है। आइये जानते हैं इस सीट का चुनावी इतिहास...
विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने चुनावी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। हर सीट का अपना अलग राजनीतिक इतिहास, सामाजिक समीकरण और चुनावी महत्व है। यूपी की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको राज्य की हर सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
पहले जानते हैं रसड़ा विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला बलिया है। जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं। इनमें- बेल्थरा रोड, रसड़ा, सिकंदरपुर, फेफना, बलिया नगर, बांसडीह और बैरिया शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज रसड़ा विधानसभा सीट की बात करेंगे। बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट साल 1957 में अस्तित्व में आई थी। इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव साल 1957 में हुआ था। उस समय यह विधानसभा दो-सदस्यीय सीट थी और यहां दो विधायक चुने जाते थे। रसड़ा के पहले चुनाव में कांग्रेस के राम रतन और गंगा प्रसाद सिंह विधायक चुने गए थे।
विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति, राजभर, मुस्लिम, यादव और राजपूत (क्षत्रिय) आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। अगर जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें तो क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 26% हैं। इसके बाद राजभर मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 15% है। मुस्लिम मतदाता लगभग 12%, यादव मतदाता करीब 11% और राजपूत मतदाता लगभग 10% हैं। वहीं चौहान (नोनिया) मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 5%, कुशवाहा (मौर्य) मतदाता लगभग 4% और वैश्य मतदाता लगभग 6% हैं। इसके अलावा ब्राह्मण 3% हैं, जबकि बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं।
रसड़ा विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957 का चुनाव
बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट के पहले यानी कि 1957 के चुनाव में यह सीट द्वि-सदस्यीय थी। यहां कांग्रेस के प्रत्यासियों ने जीत दर्ज की थी। चुनाव में कांग्रेस के गंगा प्रसाद सिंह और राम रतन विजयी हुए थे।
इस विधानसभा चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में भाकपा के रघुनाथ विजयी हुए। उन्हें कुल 18,696 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के राम रतन 16,197 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे।
1967: कांग्रेस ने की वापसी
इस विधानसभा चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से कांग्रेस के आर. रतन (राम रतन) विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के महादेव को 1,029 वोटों के अंतर से हराया।
इसके बाद राज्य में 1969 में फिर चुनाव हुए क्योंकि 1967 में बनी राज्य की पहली गैर-कांग्रेसी 'संविद सरकार' विधायकों के दल-बदल और आपसी खींचतान के कारण अल्पमत में आ गई थी। इसके चलते अप्रैल 1968 में विधानसभा भंग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और 1969 में दोबारा चुनाव कराने पड़े।
1969 के चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम रतन विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रघुनाथ को 292 वोटों के कम अंतर से हराया। चुनाव में राम रतन को 17,394 वोट मिले, जबकि रघुनाथ को 17,102 वोट मिले।
1974 का चुनाव
इस चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रघुनाथ विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल के मन्नू राम को 4,126 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रघुनाथ को 21,080 वोट मिले, जबकि मन्नू राम को 16,954 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) के मोती चंद 6,368 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
इस चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से जनता पार्टी के मन्नू राम विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रघुनाथ को 698 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मन्नू राम को 23,649 वोट मिले, जबकि रघुनाथ को 22,951 वोट मिले।
1980: भाकपा ने की वापसी
इस चुनाव में कांग्रेस (आई) के हरदेवा विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के रघुनाथ को 8,835 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में हरदेवा को 17,375 वोट, जबकि रघुनाथ को 8,540 वोट मिले।
1985 और 1989 में कांग्रेस ने जीती बाजी
1985 के चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट से कांग्रेस के हर देव विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी के राम दीन को 4,853 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में हर देव को 22,618 वोट, जबकि राम दीन को 17,765 वोट मिले। वहीं 1989 के चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम बचन विजयी हुए। उन्होंने जनता दल के रामदीन को 1,761 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम बचन को 29,374 वोट मिले, जबकि रामदीन को 27,613 वोट मिले।
1991: पहली बार जनता दल ने जीता चुनाव
1991 के चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट पर पहली बार जनता दल (JD) ने जीत दर्ज की। चुनाव में जनता दल के घुराबू विजयी हुए। उन्हें 20,502 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के राम बचन 19,910 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे।
1993: पहली बार जीती बसपा
इस चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने जीत दर्ज की। चुनाव में घूरा राम विजयी हुए। उन्हें 41,562 वोट मिले, जबकि भाजपा के अनिल 37,654 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे।
1996: पहली बार जीती भाजपा
इस चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में भाजपा के अनिल कुमार विजयी हुए। उन्हें कुल 49,766 वोट मिले, जबकि बसपा के घूरा राम 38,865 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे।
1996 के बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इस चुनाव में रसड़ा विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी ने वापसी की। चुनाव में के घूरा राम विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के घूरा को 10,018 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में घूरा राम को 48,396 वोट मिले, जबकि घूरा को 38,378 वोट मिले। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के श्याम नारायण 15,384 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2007: बसपा ने दोहराई जीत
2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के घूरा राम ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। चुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अनिल कुमार को 3,309 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में घूरा राम को 27,018 वोट मिले, जबकि अनिल कुमार को 23,709 वोट प्राप्त हुए। वहीं, समाजवादी पार्टी के रामभवन 19,071 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2012: बसपा ने लगाई जीत की हैट्रिक, पहली बार जीते उमाशंकर सिंह
इस चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने प्रत्याशी बदला और उमाशंकर सिंह को मैदान में उतारा। हालांकि इसका विपरीत प्रभाव चुनावी नतीजों पर नहीं पड़ा और चुनाव में उमाशंकर सिंह विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के सनातन पांडेय को 52,825 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में उमाशंकर सिंह को 84,436 वोट मिले, जबकि सनातन पांडेय को 31,611 वोट प्राप्त हुए। वहीं, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की तारामणि उर्फ तारामती 24,289 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
2017: बसपा ने जीता लगातार चौथा चुनाव
वहीं 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के उमा शंकर सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राम इकबाल सिंह को 33,887 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उमा शंकर सिंह को 92,272 वोट मिले, जबकि राम इकबाल सिंह को 58,385 वोट प्राप्त हुए। वहीं, समाजवादी पार्टी के सनातन पांडेय 37,006 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022: प्रदेश की 403 सीटों में सिर्फ यहीं जीती बसपा
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के उमाशंकर सिंह विजयी हुए। उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के महेंद्र को 6,583 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उमाशंकर सिंह को 87,887 वोट मिले, जबकि महेंद्र को 81,304 वोट प्राप्त हुए। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के बाब्बन 24,235 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।