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Mumbai: मराठवाड़ा में ओबीसी एकजुट, चलेगा माधव का सुदर्शन चक्र, जातीय खेमों में बंटा दिख रहा चुनाव

Sun, 07 Apr 2024 07:29 AM IST
यशोधन शर्मा सुरेन्द्र मिश्र, मुंबई
सुरेन्द्र मिश्र, मुंबई Published by: यशोधन शर्मा Updated Sun, 07 Apr 2024 07:29 AM IST
सार

लोकसभा चुनाव की घोषणा से पूर्व मराठा आरक्षण की आवाज मराठवाड़ा के जालना जिले से बुलंद हुई थी। वहीं, मराठों को ओबीसी में आरक्षण देने के फैसले के विरोध में पिछड़ा वर्ग भी तनकर खड़ा हो गया था।

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Mumbai OBCs united in Marathwada, elections seem divided among caste camps
मनोज जरांगे और छगन भुजबल - फोटो : Social Media

विस्तार

कभी हैदराबाद के निजाम का रियासत रहा महाराष्ट्र का मराठवाड़ा कई यूरोपीय देशों से भी बड़ा है। लोकसभा चुनाव में इस बार यह क्षेत्र जातीय खेमों में बंटा नजर आ रहा है। यहां की आठ लोकसभा सीटों पर मराठा बनाम माधव यानी माली, धनगर और वंजारा जाति का सियासी चक्रव्यूह बन गया है। मराठा आरक्षण आंदोलन से मराठवाड़ा में ओबीसी समाज फिर से एकजुट हुआ है। ऐसे में माधव का सुदर्शन चक्र चलने पर मराठा राजनीति के कई पुरोधा मुश्किल में घिर सकते हैं। मराठवाड़ा में भाजपा गठबंधन माधव फाॅर्मूले के सहारे है, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को अपनी साख बचाने के लिए कांग्रेस व एनसीपी (शरद पवार) की मराठा प्रभुत्व वाली राजनीति से आस है।

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लोकसभा चुनाव की घोषणा से पूर्व मराठा आरक्षण की आवाज मराठवाड़ा के जालना जिले से बुलंद हुई थी। वहीं, मराठों को ओबीसी में आरक्षण देने के फैसले के विरोध में पिछड़ा वर्ग भी तनकर खड़ा हो गया था। शिवबा संगठन के संस्थापक मनोज जरांगे पाटिल ने जालना जिले में चार बार भूख हड़ताल कर मराठा आरक्षण आंदोलन को धार दी। इससे जहां निजामकालीन रिकॉर्ड में दर्ज कृषि कार्य से जुड़े कुनबी मराठा समाज को ओबीसी कोटे में आरक्षण मिला, वहीं सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े 28 फीसदी मराठों के लिए विधानमंडल का विशेष सत्र बुलाकर राज्य सरकार ने अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण दिया है।
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राज्य में जब यह सब हो रहा था, तभी एनसीपी (अजित गुट) के नेता व मंत्री छगन भुजबल ने ओबीसी आरक्षण में मराठों को शामिल करने का मुखर विरोध शुरू कर दिया। वह इसके खिलाफ पिछड़ा वर्ग और बारा बलूतेदारों को गोलबंद करने में जुट गए। इसके बाद माली, वंजारा और धनगर का माधव फॉर्मूला तालुका स्तर तक संगठित हो गया। वहीं, गांवों में परंपरागत व्यवसाय वाली सुतार, कुंभार, लोहार, सोनार और कोली जैसी जातियों, जिन्हें बारा बलूतेदार कहा जाता है, में भी राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है। इससे सत्ताधारी भाजपा, शिवसेना और एनसीपी (अजित पवार गुट) के नेतृत्ववाली महायुति और विपक्षी कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार) और शिवसेना (यूबीटी) के गठबंधन महा विकास आघाड़ी (एमवीए) के उम्मीदवारों के लिए मराठवाड़ा का रण आसान नहीं रह गया है।
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आठ सीटों की लड़ाई, लगातार मजबूत हुई भाजपा

  • 2009 के चुनावों में शिवसेना ने तीन, कांग्रेस और भाजपा ने दो-दो और एनसीपी ने एक सीट हासिल की थी।
  • 2014 में कांग्रेस को दो सीटें मिलीं, जबकि शिवसेना और भाजपा ने तीन-तीन सीटें जीतीं।
  • 2019 के चुनाव में शिवसेना ने तीन और भाजपा ने चार सीटें जीतीं। पिछले चुनाव में डॉ. भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर के तीसरे मोर्चे ने भी करिश्मा दिखाया था। उनकी वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) को भले ही किसी सीट पर जीत नहीं मिली, पर इस गठबंधन के बलबूते एआईएमआईएम का खाता खुला था। उसके इम्तियाज जलील औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) के सांसद चुने गए।
  • मराठवाड़ा में मुख्य लड़ाई महायुति और कांग्रेस गठबंधन में है, पर आंबेडकर की वीबीए व असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम कई सीटों पर लड़ाई को त्रिकोणीय बना सकती हैं।


मराठवाड़ा ने दिए चार मुख्यमंत्री
मराठवाड़ा ने महाराष्ट्र को चार मुख्यमंत्री दिए हैं। दिवंगत शिवाजीराव पाटिल-निलंगेकर, दिवंगत शंकरराव चव्हाण, दिवंगत विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण। ये सभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे हैं। अशोक चव्हाण भाजपा में शामिल होकर अब राज्यसभा सदस्य बन गए हैं। इससे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं हैं। विलासराव देशमुख के दो बेटे अमित देशमुख और धीरज देशमुख विधायक हैं।

कांग्रेस के दिग्गज नेता शिवराज पाटिल मराठवाड़ा के लातूर से हैं। उनकी बहू डॉ. अर्चना पाटिल अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। इससे मराठवाड़ा में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने विपक्ष के कांग्रेसी गठबंधन को पहले ही दबाव में ला दिया है।

मराठवाड़ा...सूखा प्रभावित क्षेत्र, जल संकट से निजात नहीं
सूखा प्रभावित मराठवाड़ा में अधिकतर जमीन बंजर है। विकास के मामले में क्षेत्र काफी पिछड़ा है। केंद्र सरकार में मराठवाड़ा के दो मंत्रियों के अलावा तीन राज्यसभा सदस्य हैं, जबकि राज्य सरकार में चार कैबिनेट मंत्री हैं। कहा जाता है कि यहां सत्ता बदली, समीकरण बदले लेकिन जल संकट जस का तस है। मुख्यमंत्री रहते हुए देवेंद्र फडणवीस की महत्वाकांक्षी जलशिवार योजना काफी लोकप्रिय हुई थी। लेकिन, 2019 में सत्ता परिवर्तन के बाद योजना खटाई में पड़ गई। यहां किसानों का भी मुद्दा अहम है। मराठवाड़ा को अपनी तमाम मुश्किलों से निजात के लिए आज भी एक सक्षम नेतृत्व की दरकार है।



तीन चरणों में होगा मतदान
मराठवाड़ा में लोकसभा की आठ सीटें हैं। मराठवाड़ा में औरंगाबाद, जालना, परभणी, नांदेड़, हिंगोली, बीड, उस्मानाबाद (धराशिव) और लातूर (एससी) लोकसभा सीट हैं। इन सीटों पर तीन चरणों में मतदान कराया जाएगा।

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