फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bijnor News ›   Ground Report Bijnor: Silent equations become a challenge

Ground Report Bijnor : चुनौती बने खामोश समीकरण, बिजनौर के रण में मचा घमासान; कड़ा मुकाबला होने के आसार

Sat, 06 Apr 2024 06:46 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमित मुद्गल, बिजनौर
अमित मुद्गल, बिजनौर Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 06 Apr 2024 06:46 AM IST
विज्ञापन
सार
वो सबकी जय-जय करते हैं। सबको आशीर्वाद देते हैं। पात्रता के मुताबिक आशीर्वाद का तरीका भी बदल जाता है। कुछ तो ऐसे हैं जो सिर्फ मुस्कुरा देते हैं। कुछ खामोश आंखें भी हैं। ये फूलों की सियासत है। आम जनता की सियासत है। जिनकी खामोशी के आगे सारे समीकरण फेल हैं। बिजनौर के चुनावी रण में ऐसे नजारे बहुत हैं। मतदाता किसी अगर-मगर में नहीं हैं। उन्होंने फैसला कर लिया है। पर, कांटों से दामन बचाकर निकल जाने के हुनर में माहिर मतदाताओं की जमात बहुत बड़ी है। ये बड़ा उलटफेर करने का माद्दा रखते हैं। पेश है रिपोर्ट...
loader
Ground Report Bijnor: Silent equations become a challenge
मीरापुर में चुनावी चर्चा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिजनौर के रण में घमासान मचा हुआ है। बसपा ने अपनी सीट बचाने के लिए जहां पूरी ताकत झोंक दी है, तो भाजपा-रालोद भी पूरा जोर लगाए हुए है। वहीं, सपा सभी को चौंकाने वाला प्रदर्शन करने को आतुर है। पर, ज्यादातर मतदाता मुखर नहीं हैं। वे अपने मन की बात बताने के बजाय वादों को तौल रहे हैं। अपनी आकांक्षा और उम्मीदों की कसौटी पर सबको परख रहे हैं।



बिजनौर सीट पर क्या चल रहा है, जनता का मिजाज कैसा है, यह सब जानने के लिए हम सबसे पहले हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र में पहुंचे। यहां के रामराज कस्बे में एक प्रतिष्ठान पर लोग जमे थे। हमने बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने की गरज से चुनावी चर्चा छेड़ दी।


माहौल कैसा है, यह सवाल हमने जैसे ही उछाला सतीश बत्रा ने उसे लपक लिया। वह बोले, यहां तो रालोद और भाजपा का गठबंधन ही जीत रहा है। पास ही बैठे सनी ने भी उनकी हां में हां मिलाई। बोले, दंगे भले ही मुजफ्फरनगर में हुए हों, पर उसकी गूंज रामराज कस्बे तक आई थी। सबसे अहम है कि अब पूरा प्रदेश दंगामुक्त है। भारत और संजीव विश्नोई भी यहां भाजपा-रालोद गठबंधन की जीत की उम्मीद जताते हैं।

मुद्दों पर भी हो बात
चांदपुर में भी सियासी पारा चढ़ा हुआ है। यहां मिले हरिसिंह कहते हैं, इस चुनाव में मुद्दों पर तो बात ही नहीं हो रही है। पिछली बार यहां से बसपा जीती, पर कुछ काम नहीं हुआ। गन्ना मूल्य से लेकर छुट्टा पशु तक के मुद्दे हैं। महंगाई चरम पर है। रोहित सिंह बोले, इस बार बसपा यहां से जीतने वाली नहीं। मुकाबला रालोद बनाम सपा हो चला है। कैलाश ने दोनों को टोका। बोले, जो विकास करेगा, वही जीतेगा। विकास किसने किया, यह सब जानते हैं। 

समीकरणों पर भी नजर
पुरकाजी में माहौल कुछ अलग है। यहां मिले अब्बास पान की गिलोरी मुंह में डालते हुए कहते हैं, सब एकतरफा चल रहा है। लोग नाराज हैं। इस बार यहां सपा जीत रही है। दीपक को हिंदू-मुस्लिम दोनों का वोट मिल रहा है। इस पर हनीफ बोले, तुम्हें तो बस सपा ही नजर आती है। ये भी देख लो कि समीकरण क्या हैं। मुझे तो लगता है कि बसपा फिर से जीत जाएगी।

सबके अपने-अपने दावे
रामराज कस्बे से निकलकर हम मीरापुर पहुंचे। यहां का मिजाज कुछ अलग मिला। एक प्रतिष्ठान के सामने पेड़ की छांव में जमीन पर ही चर्चाओं का बाजार गरम था। हम भी इस महफिल में शामिल हो लिए। चुनावी चर्चा शुरू की तो चौधरी जगश्योरण सिंह बोल पड़े, यहां तो  बसपा के बिजेंद्र सिंह का पलड़ा भारी दिख रहा है। पिछला चुनाव भी  बसपा के ही मलूक नागर जीते थे। 
बिजेंद्र सिंह जाट हैं, तो उन्हें जाटों का वोट मिलेगा। साथ ही बसपा का काडर वोट भी उन्हें मिलेगा। इसपर सुरेंद्र सिंह बोल उठे, जाट वोट तो भैया रालोद गठबंधन के चंदन चौहान को ही मिलेंगे। चंदन गुर्जर हैं, तो गुर्जर भी उन्हीं की ओर जाएगा। इस बार यह सीट रालोद ही जीतेगा। 

  • मोहम्मद खालिद बोले, मुकाबला चंदन बनाम बिजेंद्र है, पर दीपक सैनी भी कमजोर नहीं हैं। दीपक सैनी के पास मुस्लिम वोटर हैं। इसके अलावा सैनी वोट भी उन्हें मिलेंगे। सैनी वोट कटे तो नुकसान भाजपा को ही होगा। यदि कुछ दलित सपा की तरफ आ गए तो दीपक की जीत पक्की समझो। 
  • मोहम्मद सलीम, मोहम्मद सादिक और शाहनवाज उनकी हां में हां मिलाते हैं। वे कहते हैं लोग कुछ भी कहें, मुकाबला तो रालोद और सपा के ही बीच है। 

मायावती, मीराकुमार पहली बार यहीं से संसद पहुंचीं
मायावती ने अपना पहला चुनाव यहीं से जीता था। मायावती वर्ष 1989 के चुनाव में यहां से जीतकर संसद पहुंची थीं। हालांकि 1991 में वह चुनाव हार गईं। उन्हें भाजपा उम्मीदवार ने परास्त किया।

  • बिजनौर के चुनावी दंगल में बडे़-बड़े दिग्गज पटकनी खा चुके हैं। वर्ष 1985 के उपचुनाव में यहां से मीरा कुमार जीती थीं। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को चुनाव हराया था। निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लड़ीं मायावती तीसरे स्थान पर रही थीं। 

यह रही परफाॅरमेंस
बिजनौर लोकसभा सीट पर पांच बार कांग्रेस विजयी रही है। चार बार भाजपा तो रालोद ने दो बार यहां जीत का परचम फहराया है। सपा और बसपा ने एक-एक बार यहां जीत का स्वाद चखा। पिछले चुनाव में यहां से बसपा के मलूक नागर जीते थे। मायावती, रामविलास पासवान और जयाप्रदा यहां से हार चुके हैं। (इनपुट रजनीश त्यागी : संवाद)

किसी की भी राह आसान नहीं
बिजनौर मुख्य शहर में भी एक जगह कुछ लोग जमा मिले। हम भी उनके बीच शामिल हो लिए। नसीरी गांव के सुरेंद्र सिंह बताते हैं कि हम तो शुगर मिल पर गन्ना डालने आए हैं। अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। चुनावी चर्चा छिड़ी तो वह कहते हैं, रालोद-भाजपा गठबंधन जीत रहा है। कारण-चंदन चौहान की छवि अच्छी है। उनके पिता संजय चौहान यहीं से सांसद रहे और उनकी भी अच्छी छवि का लाभ चंदन को मिल रहा है। रालोद और भाजपा के एक साथ होने से दोनों को लाभ हो रहा है। मुबारकपुर तालना के हरदीप सिंह बोले कि मुकाबला कड़ा है। किसी की भी राह आसान नहीं है, पर रालोद मजबूत है।

आमजन में सवाल हैं बहुत
बिजनौर शहर में ही एक पॉश कालोनी में पहुंचे तो वहां भी चुनावी माहौल दिखा। महिला-पुरुष दोनों ही यहां चुनावी चर्चा में शामिल मिले। योगेंद्र पाल योगी कहते हैं, सुनो भाई, अब माहौल बदल गया है। कानून-व्यवस्था से लेकर विकास तक सभी पर काम हो रहा है। ऐसे में यहां तो वोट भाजपा समर्थित रालोद को ही जाएगा। बीच में सत्यवीर सिंह बोल उठे, मुद्दों की भी बात होनी चाहिए। 

बिलाई शुगर मिल ने दिसंबर का भी गन्ना मूल्य भुगतान नहीं किया है। मेरठ से बिजनौर आ रहे हाईवे का हाल देखा है? गड्ढे ही गड्ढे हैं। रोज वाहन पलटते हैं। वहां क्यों विकास नहीं हुआ? योगी ने पलटवार किया। कहा, वन विभाग की कुछ अड़चन थी, जो अब दूर हुई है। जल्द ही यह मार्ग भी बन जाएगा। इसपर संजय कटार ने मोर्चा संभाला। बोले, अब तो मुस्लिम महिलाएं तक भाजपा को वोट दे रही हैं। इसका असर यहां की सीट पर भी दिखेगा।

महिला ने पूछा, कमल क्यों नहीं है?
चुनाव चिह्न को लेकर भी कन्फ्यूजन की स्थिति यहां देखने को मिली। चूंकि यहां गठबंधन से रालोद प्रत्याशी हैं और उसका चुनाव चिह्न हैंडपंप है। खास तौर से महिलाएं इसे लेकर भ्रमित हैं। इसी चर्चा में शिक्षिका कामिनी कौशल ने कहा कि अब राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव होगा तो छाया गुप्ता ने कहा, कमल का निशान इस चुनाव में है ही नहीं। ऐसा क्यों? इससे वोटर भ्रमित होगा। बाकी ने उन्हें समझाया।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed