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बर्धमान-दुर्गापुर: भाजपा हिंदू लहर तो कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे TMC, दिलीप घोष और कीर्ति आजाद की टक्कर

Fri, 10 May 2024 07:42 AM IST
विजय त्रिपाठी विजय त्रिपाठी
Updated Fri, 10 May 2024 07:42 AM IST
सार

Lok Sabha Election: हिंदू बहुल सीट होने के कारण दोनों दल वोट बैंक पर नजरें टिकाए हैं। तृणमूल ने अपनी चाल बदली है। पिछले महीने रामनवमी पर यहां जैसी भगवा लहर दिखी, उससे यह अनुमान तो लगता है कि विधानसभा चुनाव जैसा नतीजा हासिल करना तृणमूल के लिए बेहद मुश्किल है। माहौल की नजाकत समझते हुए तृणमूल ने भी इस बार रामनवमी पर लंबा-चौड़ा जुलूस निकाल अपनी रामभक्ति का अहसास कराया। 

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Bardhaman-Durgapur: BJP's Hindu wave and TMC's competition on the basis of welfare schemes
अमर उजाला ग्राउंड रिपोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दामोदर नदी के किनारे स्थित ऐतिहासिक शहर बर्धमान का जिक्र बंगाल के मशहूर साहित्यकार शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यासों ‘दुर्गेश नंदनी’ और ‘देवी चौधुरानी’ में भी मिलता है। दक्षिण बंगाल में स्थित बर्धमान-दुर्गापुर लोकसभा सीट दुर्गापुर सिटी और बर्धमान के कुछ हिस्से से मिलकर बनी है। चंडीगढ़ के बाद व्यवस्थित रूप से बसा हुआ दूसरा शहर दुर्गापुर को माना जाता है। दुर्गापुर देशभर में मुख्यत: अपने इस्पात उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों खासकर एनआईटी के लिए जाना जाता है।

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इस सीट पर 13 मई को मतदान है। साल 2008 में हुए परिसीमन के बाद यह लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया है। साल 2009 में पहली बार हुए चुनाव में माकपा सैदुल हक ने कांग्रेस की नरगिस बेगम को एक लाख से ज्यादा मतों से हराया था। पिछला मुकाबला किस कदर कांटे का रहा, इसे इस तथ्य से समझिए कि सीट पर पड़े करीब सवा 12 लाख वोट और हार-जीत हुई महज करीब 24 सौ वोटों से। पिछली बार यहां से जीते भाजपा का सिख चेहरा एसएस अहलूवालिया इस बार पड़ोस की आसनसोल सीट से खड़े हैं। भाजपा ने यहां से हाल तक प्रदेश अध्यक्ष रहे दिलीप घोष को उतारा है, जो पिछली बार मेदिनीपुर से सांसद थे। जंगल महल जैसे पिछड़े क्षेत्र से आने वाले दिलीप संघ के प्रांत प्रचारक रहे हैं और संघ प्रमुख रहे केएस सुदर्शन के सहायक भी। राष्ट्रीय राजनीति में पीएम नरेंद्र मोदी के उदय के साथ ही वे 2014 में संघ से भाजपा में आए। उनसे मुकाबिल हैं तृणमूल कांग्रेस से कीर्ति आजाद, जो 1983 की विश्व विजेता क्रिकेट टीम के आक्रामक बल्लेबाज थे। बिहार के पूर्णिया में जन्मे कीर्ति के खून में राजनीति है। उनके पिता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद हैं। कीर्ति 2014 में भाजपा से सांसद रहे हैं। कुछ समय वे अपने पिता की पार्टी कांग्रेस में भी रहे।
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दोनों शहरों की दशा बुरी है। बेरोजगारी यहां की बड़ी समस्या है। क्षेत्र में दुर्गापुर स्टील प्लांट को छोड़कर कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं है। कभी देश के प्रमुख औद्योगिक शहर रहे दुर्गापुर में अब बेरोजगारी पसरी है। कारखाने उजड़ते जा रहे हैं। कभी यहां की शान रहे राज्य सरकार के उपक्रम माइनिंग एंड एलाइड मशीनरी कॉरपोरेशन (एमएएमसी) पर अब ताला है। दो दशक से बंद फैक्टरी के हजारो लोग सड़क पर हैं। किसी ने इनकी सुध नहीं ली। घर-घर जाकर काम करने वाली सोवना सरकार बताती हैं कि उनके पति की नौकरी गई, तो पूरा परिवार ही बिखर गया। हजारों परिवारों की कहानी सोवना जैसी ही है। उन्हें ढंग का कोई दूसरा रोजगार भी न मिला। बर्धमान की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। धान की खेती और उसकी मिलिंग पर टिकी यहां की अर्थव्यवस्था बुरे दौर में है। राइस मिलों से ही छिटपुट रोजगार मिला हुआ है, लेकिन आयात-निर्यात नीति में समय-समय पर हुए बदलावों ने इनकी कमर भी तोड़ दी है।  
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मुस्लिमों में नागरिकता कानून व एनआरसी का भय
करीब एक तिहाई मुस्लिम मतदाताओं की माली हालत यहां ठीक नहीं है। उनके बीच सबसे बड़ा खौफ नागरिकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का है। उन्हें डर है कि कहीं उन्हें दरबदर न कर दिया जाए। गुस्सा भी है। बातचीत में वह यूं दिखता है कि बोल पड़ते हैं- मोदी-शाह पहले अपना पर्ची दिखाएं (यानी मूल निवासी होने का सबूत दें), फिर हमसे पर्ची मांगें।

भगवा लहर...रामनवमी पर तृणमूल कांग्रेस को भी निकालना पड़ा जुलूस
हिंदू बहुल सीट होने के कारण दोनों दल इस वोट बैंक पर नजरें टिकाए हैं। तृणमूल ने अपनी चाल बदली है। पिछले महीने रामनवमी पर यहां जैसी भगवा लहर दिखी, उससे यह अनुमान तो लगता है कि विधानसभा चुनाव जैसा नतीजा हासिल करना तृणमूल के लिए बेहद मुश्किल है। माहौल की नजाकत समझते हुए तृणमूल ने भी इस बार रामनवमी पर लंबा-चौड़ा जुलूस निकाल अपनी रामभक्ति का अहसास कराया। 

दूसरी प्रमुख बात, वामदल-कांग्रेस गठबंधन की प्रत्याशी सुकृति घोषाल भी तृणमूल के लिए चुनौती हैं। उनकी लड़ाई जितनी मजबूत होगी, ममता को उतना ही नुकसान होगा। इसे भांपते हुए मुख्यमंत्री यहां लगातार सभाएं व रोड शो कर रही हैं। इस सीट पर आसपास की अन्य सीटों के मुकाबले मुस्लिम आबादी कम हैं, यानी करीब 30 फीसदी। यह तथ्य भाजपा के पक्ष में जाता है।

वोटरों ने हर बार बदली पसंद
सीट के जन्म के साथ से ही यानी पिछले तीनों लोकसभा चुनाव में वोटरों ने अपनी पसंद बदली है। पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने इस लोकसभा क्षेत्र की सात में से छह सीटें जीतकर ताकत का अहसास तो कराया, लेकिन संसदीय चुनाव में स्थिति इतर होती है। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि तमाम ऐसे वोटर होते हैं, जो दोनों चुनावों को अलग-अलग दृष्टि से देखते हैं। राज्य में इनको, केंद्र में उनको, जैसी सोच यहां से मतदाताओं से बातचीत में सामने भी आती है। हाईवे की एक चाय दुकान में मिले 38 साल के निसार अहमद आईटी सॉल्यूशन की एक छोटी-सी कंपनी चलाते हैं। चर्चा होती है, तो बोल पड़ते हैं-मोदी का क्रेज है। स्टेट इलेक्शन में दीदी का सिक्का चलता है। बस स्टैंड पर मिले बुजुर्ग पत्र वितरक गोरब कार कहते हैं-दीदी की हवा बेसी (ज्यादा) है।

इस सीट पर करीब दो लाख वोटर हिंदी भाषी है। दोनों प्रमुख दल इन्हें रिझाने में लगे हैं। तृणमूल जिला ऑफिस में पार्टी के हिंदी प्रकोष्ठ की बैठक के दौरान मिले सिंधी समाज के गणेश कुमार राजदेव कहते हैं कि यह मिथ है कि हिंदी भाषी स्वाभाविक रूप से भाजपा के साथ हैं। भाजपा इन लोगों को टेकन फॉर ग्रांटेड लेती है, इसका उसे इस बार नुकसान होगा। हां, वे राज्य में दीदी, केंद्र में दादा के नैरेटिव को जरूर स्वीकार करते हैं।

महिला कल्याण केंद्रित ममता की योजनाओं का यहां खासा असर है। लोकल न्यूज के यूट्यूबर मोहम्मद सुफैल कहते हैं कि मैं चाहे जिसे भी वोट दे दूं, लेकिन मेरी मां-बहनें दीदी को ही वोट देती हैं। लोख्खी (लक्ष्मी) भंडार (योजना) से मिलने वाले पैसे उनके बहुत काम आते हैं।


ममता की योजनाओं के असर को भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश महासचिव मदन रोईदास भी मानते हैं। कहते हैं हमारे समाज (अनुसूचित जाति) के जिन लोगों को योजनाओं का लाभ मिल रहा है, वे दीदी का साथ देते हैं। पर यह भी दावा करते हैं कि हमारे उम्मीदवार दिलीप दा लोकल हैं, बंगाली हैं, इसका फायदा मिलेगा। कीर्ति बाहरी है, बिहारी है। चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती के सवाल पर कहते हैं कि बूथ लेवल पर हमारे लोग नहीं है। पंचायत चुनाव में तृणमूल वालों ने इतनी गुंडई की कि हमारा कार्यकर्ता डर गया है, वो बाहर ही नहीं आ रहा है।

पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार                     पार्टी        मत%
एसएस आहलूवालिया     भाजपा     41.75
डॉ. ममताज संघमिता     तृणमूल    41.58

2014
डॉ. ममताज संघमिता     तृणमूल    41.65 
सैदुल हक                    माकपा    33.59

(इनपुट : एन. अर्जुन)

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