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Jaunpur Lok Sabha: जिस जौनपुर में धनंजय-बसपा के बदलते रुख की रही चर्चा, क्या कहता है वहां का सियासी इतिहास?

Fri, 24 May 2024 05:26 AM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 24 May 2024 05:26 AM IST
सार

Seat Ka Samikaran: 1957 में जब देश के दूसरे आम चुनाव हुए तब जौनपुर नाम से लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। पिछले चुनाव में यहां से बसपा के श्याम सिंह यादव सांसद बने थे। अमर उजाला की खास चुनावी सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में जानते हैं जौनपुर सीट का इतिहास।
 

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Jaunpur Lok Sabha Constituency Profile History and political equation
जौनपुर सीट - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

पूर्वांचल की एक ऐसी सीट जिसने नामांकन के आखिरी दिन तक हर रोज सभी को चौंकाया। कभी किसी के टिकट के एलान ने सभी को हैरान कर दिया तो कभी किसी का टिकट कटना सुर्खियां बन गया। कभी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा कोई चेहरा अपहरण के मामले में दोषी ठहराए जाने से दौड़ से बाहर हो गया तो कभी कोई टिकट कटने के बाद फिर से उम्मीदवारी पाकर सुर्खियों में आ गया। ये सबकुछ जिस एक सीट पर होता रहा वो सीट है जौनपुर...
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हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी जौनपुर सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
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पहले जौनपुर सीट के बारे में 
सबसे ज्यादा 80 सांसद उत्तर प्रदेश से चुनकर लोकसभा पहुंचते हैं। इन 80 लोकसभा सीटों में से एक जौनपुर  भी है। साल 1951-52 में देश में पहले आम चुनाव हुए, तब जौनपुर नाम से लोकसभा सीट अस्तित्व में नहीं थी। 1957 जब देश के दूसरे आम चुनाव हुए तब जौनपुर नाम से लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। 

वर्ष 1990 के बाद हुए आठ चुनावों में यादव और क्षत्रिय के बीच सीधी टक्कर हुई और दोनों चार-चार बार सांसद बने। 2009 में बाहुबली धनंजय सिंह ने बसपा का खाता खोला। 2019 में बसपा के श्याम सिंह यादव सांसद बने थे।
 

शुरुआती चुनाव में कांग्रेस जीती
1957 के लोकसभा चुनाव में जौनपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस को जीत मिली। यहां पार्टी के दो उम्मीदवार गणपत राम और बीरबल सिंह को सफलता मिली। बता दें कि पहले दो आम चुनावों यानी 1952 और 1957 में कुछ सीटों पर दो-दो सांसद चुने गए थे। इनमें एक सामान्य श्रेणी से और एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होते थे। यह व्यवस्था 1961 में एक कानून के जरिए खत्म की गई।

अगले चुनाव यानी 1962 में जौनपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी। इस चुनाव में जन संघ की तरफ से उतरे ब्रह्मजीत ने कांग्रेस के बीरबल सिंह को 7,937 मतों से हराया था। 

1967 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने जौनपुर सीट पर जीत दर्ज की। इस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर उतरे राजदेव सिंह ने जन संघ के के. श्रीपाल को 83,075 वोटों से हरा दिया।
 
साल 1971 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर जौनपुर सीट पर कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया। इस बार पार्टी के तरफ से उतरे राजदेव सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। इस चुनाव में उन्होंने भारतीय क्रांति दल के महदी जाफरी को 1,03,592 वोटों से हरा दिया। 

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को मिली हार
साल 1977, आपातकाल के बाद देश में चुनाव होते हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों में कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी जिसमें जौनपुर सीट भी शामिल थी। यहां भारतीय लोकदल के टिकट पर उतरे यादवेंद्र दत्त दुबे ने जीत दर्ज की। यादवेंद्र ने कांग्रेस उम्मीदवार राजदेव सिंह को 99,872 मतों से शिकस्त दी। 

तीन साल बाद देश में मध्यावधि चुनाव हुए। इस बार सफलता पाई जनता पार्टी से टूटकर अलग हुए धड़े जनता पार्टी (सेकुलर) ने। पार्टी के प्रत्याशी अजीजुल्ला ने इंडियन नेशन कांग्रेस (आई) के राजदेव सिंह को रोमांचक मुकाबले में 2,763 वोट से हरा दिया। 

1984 के लोकसभा चुनाव में जौनपुर से कांग्रेस को सफलता मिली। सहानुभूति लहर पर सवार होकर कांग्रेस सत्ता में लौटी, जिसमें जौनपुर में मिली जीत भी शामिल थी। यहां कांग्रेस के प्रत्याशी कमला प्रसाद सिंह ने लोक दल के टिकट पर उतरे राम दास को 81,523 वोटों से शिकस्त दी।

1989 के लोकसभा चुनाव में जौनपुर लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी को पहली बार जीद मिली। इस चुनाव में भाजपा की तरफ से उतरे यादवेंद्र दत्त दुबे ने कांग्रेस के कमला प्रसाद सिंह को 19,290 मतों से हरा दिया। 

दो साल बाद ही 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में यादवेंद्र दत्त दुबे हार गए। इस चुनाव में जनता दल के प्रत्याशी अर्जुन सिंह यादव ने यादवेंद्र दत्त को 45,780 वोट से हरा दिया। 

1996 के लोकसभा चुनाव में जौनपुर में भाजपा ने जीत के साथ वापसी की। पार्टी के प्रत्याशी राज केशर सिंह ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरे पारस नाथ यादव को 42,645 वोट से हरा दिया। 

 1998 के लोकसभा चुनाव में जौनपुर सीट पर सपा को पहली बार जीत मिली। पिछली बार हारने वाले सपा के पारस नाथ ने इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार राज केशर सिंह को 13,426 वोट से हरा दिया।

चिन्मयानन्द ने दर्ज की जीत
1998 के बाद 1999 में देश में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में भाजपा के चिन्मयानन्द के सामने सपा से सांसद पारस नाथ यादव थे। ये वही चिन्मयानंद थे जिन पर उनके द्वारा संचालित कॉलेज की एक छात्रा ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। हालांकि, फरवरी 2024 में स्वामी चिन्मयानंद के यौन शोषण के दो मामलों में बरी हो गए। 1999 में नतीजा भाजपा के हक में गया। इस चुनाव में चिन्मयानन्द ने सपा उम्मीदवार को 8,635 वोटों से हरा दिया। इस जीत के साथ वह अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री भी बने।

2004 के चुनाव में जौनपुर में सपा ने फिर से वापसी की। सपा प्रत्याशी पारस नाथ यादव ने अबकी बार बसपा के ओम प्रकाश दुबे को 27,125 वोट से हरा दिया। इस चुनाव में भाजपा यहां चौथे नंबर पर खिसक गई। 

बाहुबली धनंजय सिंह ने दर्ज की जीत  
अब आती है 2009 के लोकसभा चुनाव की बारी। बसपा की तरफ से चेहरा थे बाहुबली धनंजय सिंह जबकि सपा ने अपने पुराने नेता पारस नाथ यादव को चुनाव मैदान में उतरा। नतीजों में बसपा उम्मीदवार धनंजय को 80,351 मतों से जीत मिली। इस मुकाबले में भाजपा तीसरे स्थान पर रही। 

2014 में भाजपा को मिली जीत
2014 में जौनपुर की सियासी लड़ाई पूर्व बहुमत से पहली बार सत्ता में आई भाजपा के नाम रही। भाजपा के टिकट पर उतरे कृष्णा प्रताप (केपी) ने बसपा प्रत्याशी सुभाष पांडेय को 1,46,310 मतों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को  3,67,149 जबकि बसपा प्रत्याशी को 2,20,839 वोट मिले थे। 

2019 में बसपा ने जीती सीट
2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अधिकतर सीटों पर भाजपा को सफलता मिली लेकिन जौनपुर में बाजी बसपा ने जीती। इस चुनाव में बसपा की तरफ से उतरे श्याम सिंह यादव ने भाजपा के कृष्ण प्रताप सिंह को 80,936 वोट से परास्त कर दिया। बसपा प्रत्याशी को 5,21,128 जबकि भाजपा प्रत्याशी को 4,40,192 वोट मिले। 

2024 का मुकाबला दिलचस्प
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। इस बार जौनपुर सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। भाजपा ने दो मार्च को महाराष्ट्र के गृह राज्यमंत्री रह चुके कृपाशंकर सिंह को चुनाव मैदान में उतारा तो सब चौंक गए। कृपाशंकर सिंह जौनपुर के सहोदपुर गांव के मूल निवासी हैं, मगर राजनीति की गहरी जड़ें उनकी मुंबई में भी हैं। दरअसल जौनपुर का मुंबइया कनेक्शन ऐसा है कि लगभग हर छठे घर से एक आदमी मुंबई में हैं। इसी से समझा जा सकता है कि भाजपा ने उन्हें टिकट क्यों दिया। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रहे कृपा शंकर सिंह ने 2019 में कांग्रेस छोड़ दी थी। 2021 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 

कृपा शंकर सिंह की उम्मीदवारी का एलान होने के बाद धनंजय सिंह ने भी चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी, मगर नमामि गंगे के प्रोजेक्ट मैनेजर के अपहरण और रंगदारी वसूलने के एक मामले में 6 मार्च को जौनपुर की विशेष एमपी एमएलए अदालत ने दोषी मानते हुए उन्हें सात साल की सजा सुना दी। ऐसे में वह चुनाव की दौड़ से बाहर हो गए। इससे समीकरण फिर बदल गए। 

14 अप्रैल को सपा ने बाबू सिंह कुशवाहा को अपना उम्मीदवार बनाकर सभी को चौंका दिया। बसपा से सपा में आए कुशवाहा कभी मायावती के बेहद करीबी लोगों में शामिल थे। 16 अप्रैल को बसपा ने बसपा ने मौजूदा सांसद श्याम सिंह यादव का टिकट काटकर धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी को मैदान में उतार दिया तो जौनपुर के मुकाबले में फिर नया मोड़ आ गया। श्रीकला ने नमांकन भी कर दिया। इसके बाद भी आखिरी वक्त में बहुजन समाजवादी पार्टी ने श्रीकला सिंह का टिकट काट दिया। बसपा ने श्याम सिंह यादव को फिर से पार्टी उम्मीदवार बना दिया। मायावती के इस फैसले से एक बार फिर जौनपुर सीट से समीकरण बदल गए। पत्नी का टिकट कटने के बाद धनंजय सिंह ने भाजपा को समर्थन देने का एलान कर दिया। श्रीकला ने गृहमंत्री अमित शाह से भी मुलाकात भी कर चुकी हैं। धनंजय और श्रीकला के भाजपा को समर्थन देने से जौनपुर का मुकाबला दिलचस्प हो गया है। 25 मई को जौनपुर सीट पर मतदान है। इसी दिन उम्मीदवार की किस्मत ईवीएम में कैद हो जाएगी। जौनपुर की जनता ने किसे अपना प्रतिनिधि चुना यह 4 जून को पता चलेगा। इसके साथ ये भी पता चलेगा कि किसके समीकरण कितने सही बैठे।

रोजी-रोटी बना मुद्दा
मल्हनी विधानसभा क्षेत्र के करंजा खुर्द गांव में अमर उजाला पहुंचा तो पेड़ के नीचे चुनावी चर्चा में कुछ लोग मशगूल मिले। मोहम्मद अली कहते हैं, बेरोजगारी, महंगाई की वजह से लोग परेशान हैं। इसलिए सपा को वोट देंगे। मोहम्मद असगरी, बबलू यादव और चंद्रशेखर कहते हैं कि कताई मिल बंद है, चीनी मिल बिक गई। सपा सरकार में मेडिकल कॉलेज की नींव पड़ी, लेकिन इलाज नहीं मिल पा रहा है। प्रदीप गुप्ता कहते हैं, भाजपा ने किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्र का विकास किया है। यहां मिले रिंकू गौतम कहते हैं कि वोट तो हाथी पर जाएगा, उम्मीदवार कोई भी हो। वह भी रोजगार को लेकर सवाल उठाते हैं।

छुट्टा पशुओं से परेशानी
मुंगरा बादशाहपुर के सुजानगंज में मिले प्रमोद पटेल और जयकुमार यादव कहते हैं कि मोदी-योगी के राज में कानून-व्यवस्था सही है, लेकिन महंगाई के बाद सबसे ज्यादा मार छुट्टा पशुओं की है। सब्जी की खेती चौपट हो जा रही है। कुछ ऐसी ही बात राजेश दुबे और दिवाकर भी कहते हैं। वोट कहां देंगे, इस सवाल पर वे खुलकर नहीं बोलते।

धनंजय फैक्टर से कहीं गुस्सा, तो कहीं सहानुभूति
चुनाव से ठीक पहले पूर्व सांसद धनंजय सिंह को जेल जाना पड़ा। बसपा ने धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला को मैदान में उतारा था, लेकिन नामांकन के अंतिम दिन सांसद श्याम सिंह यादव को मैदान में उतार दिया। सिकरारा के प्रेम निषाद हमेशा धनंजय के साथ रहे हैं। वह कहते हैं, भाजपा ने धनंजय को चुनाव से हटने के लिए मजबूर किया है, इसलिए विरोध में वोट देंगे। कुछ ऐसी ही बात लाल दरवाजा निवासी शकील और मुस्तकीन भी करते हैं।
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