दुनिया भर में घट रहा, लेकिन भारत में तेजी से बढ़ रहा है ई-बुक्स का बाजार, आखिर क्यों?
- करीब दो साल से घटने लगा है ई-बुक्स का वैश्विक बाजार
- 2019 के शुरुआती महीने में ही आ गई 5 फीसदी की गिरावट
- भारत में इस कमी का नहीं दिखा है असर
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ई-बुक्स (E-Books) यानी वो किताबें जो इंटरनेट पर सॉफ्ट कॉपी के फॉर्मेट में उपलब्ध हों। जिन्हें आप डेस्कटॉप, मोबाइल या टैबलेट जैसे किसी गैजेट पर पढ़ सकते हैं। पिछले एक दशक में लोगों के बीच ई-बुक की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। लेकिन अब यूरोप ने ई-बुक्स की रीसेल को अवैध घोषित कर दिया है। पिछले करीब दो सालों की बात करें, तो ई-बुक का वैश्विक बाजार (Global Market) में भी घटने लगा है।
हाल में एसोसिएशन ऑफ अमेरिकन पब्लिशर्स की एक रिपोर्ट आई। इसमें कहा गया है कि ई-बुक पढ़ने वाले लोगों की संख्या करीब 7 फीसदी बढ़कर जहां 16 से 23 फीसदी पहुंच गई थी, वहीं इस साल (2019) के शुरुआती महीने में ही इसमें 5 फीसदी की कमी आ गई। लेकिन भारत के ई-बुक बाजार के साथ ऐसा नहीं है। यहां तो ई-बुक्स का बाजार करीब 30 फीसदी की दर से बढ़ा है।
डिवाइस कंपनी किंडल ई-बुक के क्षेत्र में काफी काम कर रही है। इसके अनुसार, भारत और चीन में ई-बुक पढ़ने वालों की संख्या 200 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान समय में भारत में ई-बुक का बाजार देश के कुल पुस्तक बाजार का 25 फीसदी है।
तेजी से क्यों बढ़ रहा है ये बाजार
आज के दौर में लोग ज्यादातर वक्त स्मार्टफोन व टैबलेट पर बिताते हैं। ऐसे में कभी भी और कहीं भी इन गैजेट्स पर किताबें पढ़ना उनके लिए आसान हो जाता है। किताबों की हार्ड कॉपी (कागजों पर छपी किताबें) को हर जगह साथ नहीं रखा जा सकता। अब लोग आसानी से उपलब्ध (Easy to Access) होने वाली चीजें ज्यादा पसंद करते हैं। इसी कारण अब किताबों के प्रकाशक भी तेजी से ई-बुक्स मार्केट में एंट्री की कोशिश में जुटे हैं।
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कितनी किफायती है ई-बुक
- ई-बुक्स का प्रकाशन पारंपरिक किताबों की तुलना में काफी किफायती होता है।
- ई-बुक्स के लिए कागज, स्याही (Ink) और प्रिंटिंग मशीन की जरूरत नहीं पड़ती।
- लेकिन अगर पारंपरिक किताबों की बात करें तो इनके प्रकाशन में ई-बुक की तुलना में तीन गुना ज्यादा कच्चे माल (Raw Material) और 78 गुना ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है।
- साथ ही इन्हें पाठकों या दुकानों तक पहुंचाने के लिए डिलीवरी कॉस्ट भी नहीं देना पड़ता। यानी ट्रांसपोर्टेशन के खर्च की भी बचत।
- कई वेबसाइट्स पर तो ई-बुक्स मुफ्त में उपलब्ध हैं।
- ये पाठकों के लिए भी किफायती है। पारंपरिक किताबों की तरह इन्हें स्टोर करने की जरूरत नहीं।
- आप अपनी पसंदीदा डिवाइस पर हजारों ई-बुक्स को एक साथ, एक जगह स्टोर कर सकते हैं।
- कई बार मोबाइल डेटा कनेक्शन के साथ भी ये उपलब्ध होती हैं। यानी इन्हें डाउनलोड कर स्टोर करने की भी जरूरत नहीं।
- प्रिंटेड बुक्स सीमित संख्या में छापी जाती हैं। पुरानी होने के बाद जल्दी बाजार में उपलब्ध भी नहीं होतीं। लेकिन ई-बुक्स के साथ ऐसा नहीं है।
- ई-बुक्स के साथ भाषा की दिक्कत भी नहीं आती। यहां कई किताबें ट्रांसलेशन की सुविधा के साथ उपलब्ध होती हैं। पाठक इन्हें अपनी पसंद की भाषा में पढ़ सकते हैं।
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रोचक... युवाओं से ज्यादा बुजुर्गों में क्रेज
- टाटा लिटरेचर लाइव सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, आज भी पारंपरिक किताबें पढ़ने वालों की संख्या हर उम्र के लोगों में ज्यादा है। हालांकि ई-बुक का क्रेज युवाओं से ज्यादा बुजुर्गों में देखा गया है।
- ई-बुक पढ़ने वाले छात्रों की संख्या मात्र 23 फीसदी है।
- 20 वर्ष से कम उम्र के पाठकों में सर्वाधिक 81 फीसदी ऐसे हैं जो छपी हुई किताब पढ़ना पसंद करते हैं।
- वहीं, 21 से 30 वर्ष की उम्र के 79 फीसदी, 31 से 50 वर्ष की उम्र के 75 फीसदी लोग मुद्रित किताबें पसंद करते हैं।
- जबकि 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों की रुचि छपी किताबों में सबसे कम 74.24 फीसदी पाई गई है।
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