रवि तेजा की नन्ही-सी कोशिश ने अफसरों को जगा दिया
कितने खुश दिखाई दे रहे थे मोटरसाइकिल पर वे दोनों। पति आगे बैठकर बाइक चला रहा था और करीब छह महीने के नवजात को गोद में लेकर पीछे पत्नी बैठी थी। लेकिन अगले ही पल सड़क के एक बड़े गड्ढे से बचने के चक्कर में मोटरसाइकिल ने अपना संतुलन खो दिया। दुर्घटना हुई और सवारियों के सिर में चोट लगी। पति-पत्नी तो बच गए, मगर उनका बच्चा इस आघात के लिए तैयार नहीं था। उसने दम तोड़ दिया। मैं इस पूरी घटना का साक्षी था।
हर दिन समृद्ध होते हैदराबाद का बुनियादी ढांचा तैयार करने वाले हजारों मजदूरों में से एक मेरे पिता भी हैं। जिस दिन वह दुखद घटना घटी, मैं अपने पिता के साथ उस सड़क के करीब ही खड़ा था। मेरे पिता वहीं काम कर रहे थे। भले अभी मेरी उम्र तेरह वर्ष की है, लेकिन पिछले साल के उस हृदय विदारक दृश्य ने मेरे बाल मन पर गहरा असर डाला। दुनियादारी की समझ मुझमें नहीं है, पर उस दिन मुझे इतना जरूर पता चल गया कि उस बच्चे की मौत की असली वजह सड़क के गड्ढे ही थी। दरअसल कुछ समय पहले ही मैंने अपनी आंखों से एक और दुर्घटना घटित होते हुए देखी थी, तब एक डेढ़ साल के बच्चे की मौत खुले बोरवेल में गिरने से हो गई थी।
मैंने पता किया, तो मालूम हुआ कि जिनकी जिम्मेदारी सड़क के गड्ढे भरने की है, वे कभी इस काम को गंभीरता से नहीं लेते। मैंने सोचा कि प्रशासन के भरोसे बैठने से अच्छा है कि खुद ही काम पर जुट जाया जाए और अपनी तरफ से कुछ किया जाए, जिससे कि ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इस तरह मैंने अपने इलाके की सड़कों के सभी गड्ढे भरने का फैसला किया। मैं नहीं जानता था कि यह काम अकेले कर पाऊंगा या नहीं, लेकिन उस बच्चे का चेहरा रह-रहकर याद आ रहा था, जिसने मुझे यह काम करने की प्रेरणा दी।
मैंने आसपास के टूटे ईंट के अवशेष, बजरी और पत्थर इकट्ठा करना शुरू कर दिया। मुझे जहां कहीं भी गड्ढा दिखता, मैं उसे भरने का प्रयास शुरू कर देता। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि किसी सड़क पर लगातार वाहन दौड़ रहे हैं और उस पर गड्ढे भी होते हैं, तो उस स्थिति मैं पूरे धैर्य के साथ यातायत कम होने का इंतजार करता हूं। वैसे भी मेरे पास कोई सरकारी सूचक बोर्ड तो है नहीं, जिसका प्रयोग करके मैं यातायात रोककर अपना काम करूं।
सरकारी स्कूल के कक्षा छह में पढ़ने वाले मेरे जैसे बच्चे के इस काम की खबर किसी तरह स्थानीय निकाय प्रशासन के कानों तक पहुंची, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। शहर में चल रहे मेट्रो निर्माण कार्य की वजह से भी कई सड़कों का हाल बुरा था, लेकिन अच्छी बात यह रही कि मेरे काम का पता चलने पर मेट्रो अधिकारियों की भी नींद खुली और उन्होंने कई सड़कों के गड्ढे भरवाने का काम किया।
एक साल होने को है उस घटना को, लेकिन मैं आज भी बिना समय या प्रदूषण की परवाह किए, जहां भी कोई गड्ढा दिखता है, उसे भरने का प्रयास करता हूं। मैंने अपने काम के लिए अपने दोस्तों की भी मदद ली है। मैं चाहता हूं कि किसी का जीवन खराब सड़कों के कारण खत्म न हो।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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