भारतीय मूल के गणितज्ञ को मिला मैथ्स का नोबेल, खुद बताए सफलता के राज, छात्रों को दिए ये टिप्स
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अधिकांश गणितज्ञ गणित को विज्ञान के दूसरे विषयों के समान मानते हैं। मैंने हमेशा से यही कोशिश की है कि छात्रों को गणित के व्यापक संदर्भ समझाते हुए इसे अधिक आकर्षक और प्रासंगिक बनाया जाए।
छत्तीस साल पहले मेरा जन्म दिल्ली में रहने वाले एक तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन मैं पला-बढ़ा ऑस्ट्रेलिया में। दरअसल मैं जब दो साल का था, तभी मेरा परिवार भारत से ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में बस गया था। मेरी मां कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर हैं। गणित के प्रति मेरा रुझान शुरू से ही रहा या यों कहें कि अपनी जिंदगी के बारे में मेरी स्मृति जिस समय रेखा तक जाती है, गणित के प्रति दिलचस्पी तभी से मेरे साथ है।
बीस वर्ष की उम्र में पूरी की पीएचडी
मात्र बारह साल की उम्र में मैंने गणित और भौतिकी के अंतरराष्ट्रीय ओलंपियाड में पदक जीता था। और उसके अगले वर्ष यानी तेरह की उम्र में ही मुझे यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश मिल गया। अगले तीन साल में मैं यूनिवर्सिटी का सर्वश्रेष्ठ ग्रेजुएट स्टूडेंट बन चुका था। हालांकि स्नातक में मैंने जिन विषयों की पढ़ाई की, वे भौतिकी और इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग से जुड़े थे, मगर कोर्स के अंत तक मैंने तय कर लिया था कि मुझे पेशेवर गणितज्ञ ही बनना है। गणित के प्रति दीवानगी ने ही मुझे बीस वर्ष की उम्र में पीएच. डी. डिग्री धारक बना दिया।
यह पदक पाने वाला दूसरा ऑस्ट्रेलियाई
ईमानदारी से जुटा रहा
जब मैंने पीएच. डी. में प्रवेश लिया था, तब मैं इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं था कि मुझे गणितज्ञ होने के नाते कोई ढंग की नौकरी मिलेगी। मैंने सोच रखा था कि मैं बिना किसी हड़बड़ी के इस क्षेत्र को पर्याप्त समय दूंगा, फिर भी अगर कुछ हासिल नहीं हुआ, तो किसी दूसरे क्षेत्र में हाथ आजमाऊंगा। सौभाग्य से इसकी नौबत नहीं आई। धैर्य के साथ किए गए ईमानदार प्रयासों ने अपना रंग दिखाया।
गणित उबाऊ नहीं है
गणित में 'नंबर थ्योरी' मेरा पसंदीदा क्षेत्र है। इसे 'क्वीन ऑफ मैथेमेटिक्स' कहा जाता है। मेरा काम इस थ्योरी के कई ऐसे पहलुओं पर है, जो अभी तक सामने नहीं आए थे। लोगों को लगता है कि गणित बहुत उबाऊ है। ऐसा है नहीं, इसमें कई मजेदार चीजें हैं। यदि आप चाहें, तो ज्यामिति, कैलकुलस और सममिति के किसी भी समीकरण को आनंद के साथ हल कर सकते हैं। दिक्कत यह है कि छात्रों को गणित के वास्तविक सिद्धांत न बताकर कुछ और ही पढ़ाया जाता है। अधिकांश गणितज्ञ इसे विज्ञान के दूसरे विषयों के समान मानते हैं। मैंने हमेशा से यही कोशिश की है कि छात्रों को गणित के व्यापक संदर्भ समझाते हुए इसे अधिक आकर्षक और प्रासंगिक बनाया जाए।
गणित का नोबेल कहे जाने वाले प्रतिष्ठित फील्ड पदक पाने से पहले मुझे इस क्षेत्र के कई अन्य सम्मानों से नवाजा जा चुका है, जिनमें ओस्ट्रोस्की पुरस्कार, इंफोसिस पुरस्कार, सलेम पुरस्कार और रामानुजन पुरस्कार शामिल हैं। मैंने 2004 से 2006 तक न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। मैं फिलहाल कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहा हूं। मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानता हूं, क्योंकि फील्ड पदक पाने वाला मैं सिर्फ दूसरा ऑस्ट्रेलियाई व्यक्ति हूं। मुझसे पहले 2006 में डॉक्टर टेरेंस ताओ को यह पदक मिला था।
-भारतवंशी ऑस्ट्रेलियाई गणितज्ञ के साक्षात्कारों पर आधारित।
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