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Science Workshop: एचसी वर्मा ने दिया CUTE लर्निंग का मंत्र, बोले- बच्चों को समझाएं, पर न करें ये गलती

Fri, 22 Jul 2022 07:10 PM IST
सुभाष कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: सुभाष कुमार Updated Fri, 22 Jul 2022 07:10 PM IST
सार

दोपहर दो से शाम पांच बजे तक आयोजित किए जा रहे इस कार्यक्रम में यूपी बोर्ड, सीबीएसई और सीआईएससीई के 10वीं और 12वीं के शिक्षक भी शामिल हुए।

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Professor HC Verma in Amar Ujala's Science Workshop to address on Easy Concepts To Teach Physics
एयसी वर्मा ने सिखाए बच्चों को चार मंत्र। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

भौतिकी के प्रख्यात प्रोफेसर पद्मश्री हरीश चंद्र वर्मा (HC Verma) आज शहर में हैं। उन्होंने अमर उजाला की ओर से आयोजित किए गए विज्ञान संवाद कार्यशाला में फिजिक्स पढ़ाने के ही नहीं, बल्कि छात्रों और टीचरों के बीच समन्वय बढ़ाने और क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ावा देने के आसान तरीके समझाए। उनकी यह कार्यशाला एबीईएस इंजीनियरिंग कॉलेज के सभागार में आयोजित की गई। 

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क्या बोले प्रोफेसर एचसी वर्मा?
प्रोफेसर एचसी वर्मा ने अपने संबोधन की शुरुआत छात्रों के अनुभव को बताने से की। उन्होंने कहा, "मैं अपने शिक्षण के अनुभव आपके साथ साझा करुंगा। मुझे काफी परेशानियां थीं। स्कूल में मेरे साथ सिस्टम के साथ चलने की परेशानी थी। एक जो छोटा बच्चा होता है वह स्वतंत्र होता है। उसकी स्वतंत्रता को घर के लोग काफी सम्मान देते हैं। उन पर कोई बंदिश नहीं होती। उसके ऊपर यह बंधन नहीं होता कि आपको इतने बजे सोना है, इतने बजे उठना है। उसके ऊपर सीखने का बंधन नहीं होता। उसका जब मन होता है वह हंसता है, जब मन होता है रोता है। उन सबका सम्मान होता है।"
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"फिर एक दिन बच्चा स्कूल पहुंचा दिया जाता है, उसकी स्वतंत्रता खत्म कर दी जाती है। अगर उसने क्लासरूम में चिल्ला दिया तो क्या होगा, किसी की चोटी खींच दी तो क्या होगा? जब टीचर पढ़ा रहा होगा तब वह पीछे देख रहा होगा क्या होगा? टीचर पढ़ा रहा होगा तभी लड़ लिया तो क्या होगा? इसलिए जो अनुशासन का बंधन रहता है, उनमें मैं कभी नहीं रहा। मैं अनुशासनहीन नहीं रहा, लेकिन अनुशासन में भी नहीं रहा।" 

'बचपन में मेरे खुद के कभी अच्छे नंबर नहीं आए'
"अनुशासन की एक चीज होती है- परीक्षा। क्लास में मैंने कभी शरारत नहीं की, अवहेलना नहीं की। लेकिन क्लास के बाहर खूब अवहेलना की। कहा जाता है कि क्लास में जो पढ़ाया गया मैंने ध्यान से सुना, समझा, जिनको नहीं समझ आया, उनको समझाया भी। लेकिन उसको परीक्षा तक याद क्यों रखूं। मैं तो अपने रास्ते चलूंगा। इस कारण से मेरे स्कूल में घटिया किस्म के नंबर आते थे। 30 फीसदी के करीब नंबर आते थे। मेरे ग्रेड कार्ड में छठवी, सातवीं, आठवीं में कई सारे लाल पेन से अंडरलाइन थे।" 

"मुझे नहीं पता था कि कालांतर में वे अच्छे दस्तावेज साबित होने वाले हैं। मुझे लगता है कि अगर आज वो मेरे पास होते तो अच्छा होता। जब हम घर आए ग्रेड कार्ड लेकर। मेरे पिता से लेकर मेरे भाई ने मुझे खूब सुनाया। माताजी परेशान रहती थीं, ज्योतिषियों के पास जाती थीं। जन्मपत्री दिखाया करती थीं। यह तो इस तरह से फेल होता रहता है, आगे क्या करेगा। जिस समय परीक्षा होती थीं, उस समय सबका तनाव बढ़ा रहता था, सिर्फ मेरे अलावा। हम यही सोचते थे कि अब जो कुछ भी कहा जाएगा वह 15-20 मिनट चलेगा। उस पर कई बातें हो जाया करती थीं। लेकिन आखिर तक सब खत्म।" 

"शिक्षण लाइन में जो हमें छात्र-छात्राओं के बारे में पता चला वह उनकी शक्ति के बारे में। यह शक्ति है उनकी सीखने की ताकत। जो घर में भाषा बोली जाती है, वह भाषा बच्चा बिना स्कूल जाए ही सीख लेता है। दूसरी भाषा सिखाने के लिए हम 10-12 साल उसके पीछे पड़े रहते हैं, लेकिन वह सीख नहीं पाता। पहचानना, अनुमान लगाना एक व्यक्ति को देखकर उसकी लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, कर्वेचर देखकर के वह तीन साल का बच्चा यह तय कर लेता है कि इन्हें भैया बोलना है, इन्हें अंकल बोलना है या बाबा बोलना है।" 

'बच्चों को स्कूल जाने से पहले पता होते हैं न्यूटन के गति के नियम'
प्रोफेसर वर्मा ने कहा, "बच्चे को न्यूटन की गति के तीनों नियम भी स्कूल जाने से पहले पता होते हैं। अगर कोई बच्चा कोई गेंद कहीं छिपा देता है और उससे कहा जाता है कि गेंद लेकर आओ तो वह वहीं जाता है, जहां गेंद रखी गई है। यानी उसे न्यूटन का पहला नियम पता है। जो चीज जहां रखी है, वह वहीं होगी। अ थिंग विच इस एट रेस्ट, विल बी एट रेस्ट एंड अ थिंग विच इस एट मोशन, विल बी इन मोशन, जब तक उसकी चाल बदलने के लिए बल न लगाया जाए। उसे मालूम है कि दिन गुजर जाएं, रात गुजर जाएं, लेकिन गेंद अपने आप से नहीं जाएगी। अगर वह चीज वहां से चली जाएगी तो इसका मतलब है कि किसी ने उसे हटाया है।" 

"बच्चे को पता होता है कि अगर उसे गेंद दूर फेंकनी है तो किस गति से फेंकनी होगी और कम दूरी पर फेंकनी है तो किस गति से जाएगी। अगर आप बच्चे से कहेंगे कि दौड़ते हुए जाओ और जाकर कमरे में जो दीवार है उससे लड़ जाओ जाकर। क्या वह आपकी बात मानेगा। नहीं मानेगा। क्योंकि उसे न्यूटन का तीसरा नियम मालूम है। उसे मालूम है कि मैं जितनी तेजी से सिर दीवार पर मारुंगा, उतनी ही तेजी से दीवार मुझे पलट कर दर्द देगी।" 

'स्कूल में अपनी क्षमताओं से समझौता कर लेते हैं बच्चे'
स्कूल जाने से पहले दो-तीन साल के बच्चे इतना कुछ सीख लेते हैं। स्कूल वाले कहते हैं कि बच्चे आजकल ध्यान नहीं देते हैं, सीखते नहीं हैं। लेकिन बच्चों की जो स्ट्रेंथ है वह खुद से सीखने में है। घटनाओं से सीखने में है। अपने खुद के अनुभव से सीखने में है, जो उसकी आंखों के सामने हुआ है, उससे सीखने में है। उसे पता है कि गर्म क्या है ठंडा क्या, क्या अच्छा है क्या बुरा? लेकिन हम उसकी इस क्षमता को भुलाकर उसे बताते हैं कि यह करोगे तो सफल हो जाओगे, यह करोगे तो बेकार हो जाएगा। 

'हमारे एक टीचर थे जो कहते थे फर्स्ट, सेकंड क्लास के बच्चे हमसे नहीं संभलते, लेकिन फोर्थ-फिफ्थ क्लास के बच्चे संभल जाते हैं। इसकी वजह यह है कि जो बच्चे आगे खोजना चाहते थे उन्हें हम बिठाए रखना चाहते हैं। चौथी-पांचवीं तक आते-आते बच्चे खुद से समझौता कर लेते हैं।' 

'शिक्षक का दायित्व सिलेबस खत्म करना नहीं, उसे समाज में एकात्म से रहना सिखाना'
शिक्षक का यही दायित्व नहीं होता कि वह सिलेबस खत्म करे, बल्कि मेरा मानना है कि सिलेबस खत्म करना शिक्षक का दायित्व है ही नहीं। मेरे सिलेबस खत्म कर देने से सिलेबस खत्म नहीं होगा। वह चीजें ही बच्चे के जेहन में ही खत्म होंगी। जब तक बच्चा अपने मन में उनको नहीं समझ लेगा तब तक हमारे सिलेबस खत्म करने से उसे कोई फायदा या नुकसान नहीं होने वाला है। जिस दिन आपने कह दिया कि यह चैप्टर खत्म, उस दिन खत्म। हमारी यह बड़ी जिम्मेदारी है कि बच्चा जब जाए तो लाइफ स्किल सीख कर जाए। सोसाइटी के साथ एकात्मता महसूस करे। उसके मन में भावनाएं रहें। लोगों से मिले तो मुस्कुरा कर मिलें। प्रदूषण, गंदगी न फैलाएं। मेरे पास कितनी व्यस्तताएं होती हैं, लेकिन अगर कोई मेरे पास बात करने आता है तो मैं यह कभी नहीं कहता कि अभी मैं व्यस्त हूं आप जाइए। मुझे क्या करना होगा, रात में नींद का एक घंटा और कम करना होगा। क्या होगा सवेरे थोड़ा और जल्दी उठना होगा। मेरे जो लोग हैं, मेरे अपने हैं।"

बच्चों को समझाने वाले बहुत हैं। मुरारी बापू से लेकर आसाराम तक। जैसे समझाने से कुछ नहीं होता, वैसे पढ़ाने से भी कुछ नहीं होता। उसकी अनुभूति होनी चाहिए। हमने भ्रम में कुछ वाक्य, मंत्र और स्लोगन बना रखे हैं। मैं पूछता हूं कभी मजे लेने के लिए- क्यों अपने बच्चे को स्कूल भेज रहे हो, जिसको पढ़ाना हो पढ़ाए, न पढ़ाना हो न पढ़ाए। इस पर एक ही जवाब मिलता है। पढ़ेगा नहीं तो क्या घास खोदेगा। सब्जी बेचेगा। तो यहां दो समस्याएं हैं कि क्या जो व्यक्ति गर्मी में सब्जी बेच रहा है, उस व्यक्ति की ऐसी बेइज्जती। यानी हमारे मन में सब्जी वाले के प्रति अनादर है। जिसकी वजह से हमारे किचन में खाना बन रहा है, हम उसकी अवहेलना करते हैं। पढ़ेगा-लिखेगा नहीं तो क्या घास खोदेगा। अरे हमारे यहां तकनीक अभी ऐसी नहीं है कि बिना किसी के घास खोदे घास अपने आप ही खुद जाएगी। 

'अच्छे नंबर आने से नहीं तय होता अच्छा भविष्य'
कुल मिलाकर हम एक ऑड बनकर नहीं रहना चाहते। हमें समाज के साथ एकात्म होने के लिए स्कूल भेजना है बच्चों को। क्या पढ़ने-लिखने के बाद हमें नौकरी मिल जाती है। घास खोदने की नौबत खत्म हो जाती है। यह बहुत बड़ा स्लोगन है- अच्छा पढ़ लेगा, अच्छी डिग्री ले लेगा तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी, अच्छी शादी हो जाएगी, अच्छा दहेज मिल जाएगा। अच्छे भविष्य का मतलब- अच्छी सुविधाएं मिलेंगी। एसी होना चाहिए, कार होनी चाहिए, गर्मी नहीं लगनी चाहिए। एक बड़ा घर होना चाहिए- एक कमरा बच्चों के लिए, एक हमारे लिए, एक गेस्ट के लिए। तो अच्छे भविष्य की परिभाषा यह है कि अच्छे नंबर लाओगे तो अच्छा भविष्य होगा। लेकिन अगर ऐसा होता तो अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी के लिए क्यों लड़ रहे थे। आखिर मोदीजी ने नौकरियों का एलान किस के लिए कर रहे थे। लोग नौकरियों के लिए भटक रहे थे, इसलिए तो बेरोजगारी का मुद्दा उठा। तो यह तो भ्रम है कि अच्छा भविष्य अच्छे नंबर लाने से ही बनेगा। 

यह हमें भी जानना चाहिए और माता-पिता को भी जानना चाहिए। अच्छे नंबर का मतलब अच्छा भविष्य नहीं होता। मेरे तो बड़े खराब नंबर आए थे बचपन में। लेकिन आईआईटी में मैं टॉपर रहा। क्या आपने मुझे इसलिए बुलाया है कि मैंने एमएससी में टॉप किया था। आईआईटी कानपुर में हर साल एक टॉपर होता है। हर आईआईटी, हर यूनिवर्सिटी और हर कॉलेज में एक टॉपर होता है। टॉपर होने की गिनती करेंगे तो एक साल बाद सब इसी कमरे में बैठे मिलेंगे। 

आपने मुझे इसलिए नहीं बुलाया कि मैंने एमएससी में टॉप नहीं किया। अच्छे भविष्य का अच्छे नंबरों से कोई रिश्ता नहीं है। यह रिश्ता सिर्फ हवा में है। समझ ही नहीं आता कि यह रिश्ता क्या कहता है। हम बच्चों को ढेर सारे नंबर दिलाकर क्या कर लेंगे। जेईई एडवांस का रिजल्ट निकलता है तो परिवार जश्न मनाते हैं। स्कूल-कॉलेज आपको माला-वाला पहनाते हैं, डीएम को भी बुलाएंगे। क्योंकि एक तथाकथित कठिन परीक्षा पास कर के एक तथाकथित अच्छे संस्थान में एडमिशन मिल गया। दो महीने बाद वही बच्चा फोन करके कहता है कि मम्मी मैं तो फेल हो गया।

आईआईटी में जो नंबर है पास करने का, वह पहले से घोषित नहीं होता। जब गेम ओवर होता है, तब गेम के नियम बनाते हैं। जब सारी परीक्षा हो चुकी है, सबके मार्क्स आ जाते हैं, तब हम समझते हैं कि कितने नंबर वालों को पास किया जाए, कितनों को फेल। पूरी टीम बैठती है। करीब घंटे भर तक विचार करती है और फिर डिसाइड होता है। 200 नंबर का एग्जाम होता है और फेल होने वाला मार्क्स 22-23 से लेकर 30-32 तक जाता है। क्योंकि अगर हम 30 फीसदी कर देंगे तो 70 फीसदी बच्चे फेल हो जाएंगे। वह बच्चा जिसे दो महीने पहले पूरे शहर ने सिर-आंखों पर बिठाया था। अखबारों ने उसकी फोटो छापी, उस बच्चे के हाथ में ग्रेड कार्ड आता है- फेल। क्या गुजरती होगी उस पर। क्या फायदा हुआ उसे घोटकर न्यूमेरिकल पढ़ाने का। बच्चे साइकोलॉजिकली-मेंटली डिरेल हो जाते हैं। 

'नंबर लाने से नहीं स्किल पैदा करने से होता है अच्छा भविष्य'
नंबरों का जीवनकाल बहुत छोटा होता है। थोड़े समय के लिए वे खुशी देते हैं। लाइफटाइम के लिए नहीं होते। आपको अच्छी नौकरी मिल जाए, वहां जो 10 हजार लोग होंगे, उनमें जब तक आपमें कुछ अलग स्किल्स नहीं होंगे। आपका अपना कॉन्ट्रीब्यूशन बाकियों से अलग नहीं होगा, तब तक मुकेश अंबानी आपसे नहीं मिलेंगे। आपके अंदर कुछ अलग होना चाहिए। 

हम कहते हैं कि नंबर लाने से कुछ नहीं होता, स्किल से होता है। तो स्किल तब डेवलप होगी कि आप पहले क्लाइंबिंग कराओ, अंडरस्टैंडिंग कराओ और फिर थिंकिंग कराओ। अंडरस्टैंडिंग और थिंकिंग काफी अलग-अलग हैं। हमारे एजुकेशन सिस्टम में थिंकिंग की जगह तो है ही नहीं। क्योंकि टीचर को सिलेबस खत्म करना होता। किताब में सबकुछ है, सवाल भी उसी से आएंगे। तो बच्चों को क्या है कि उन्हें पता है कि क्या पढ़ना है। शिक्षक इसमें कुछ सोचेगा नहीं, बच्चों को हम सोचने देंगे नहीं। शिक्षक सोचते हैं कि तुम मिट्टी के घड़े हो, हम गढ़ेंगे तो तुम सही बनोगे। इसलिए हम शिक्षक उनके भविष्य के निर्माता हैं। लेकिन हम बच्चों को सोचने देते नहीं है। 

अगर पेपर सेटर सीबीएसई के एग्जाम में कुछ सोच ले गया तो संसद में सवाल हो जाते हैं और सड़कों पर बवाल हो जाते हैं। फिर सीबीएसई को ग्रेस मार्क देने पड़ते हैं। विद्यार्थी को हम सोचने देते नहीं। पेपर सेटर ज्यादा सोचते नहीं, क्योंकि अगली बार पेपर सेट करने के लिए नहीं मिलेगा। बच गए एचआरडी मंत्री- उनके पास तो स्कूल की ज्यादा जानकारी तो होती नहीं। वह भी ज्यादा नहीं सोचते। तो सोचने का काम हमारे शिक्षा सिस्टम में नहीं होता। तो हमारे अंदर जो सोचने वाली कोशिकाएं होती हैं, वह कुछ समय बाद असक्रिय हो जाती हैं। क्योंकि उनका इस्तेमाल तो होता नहीं है। 

शिक्षकों में धैर्य कम होता है, वे उतावले ज्यादा
प्रोफेसर वर्मा ने कहा, "शिक्षकों में धैर्य कम होता है। वे उतावले ज्यादा होते हैं। पहले हम समझते थे कि अच्छा टीचर वह है जो प्लान कर के जाएं और लेसन को इतना अच्छा समझा दें कि सबको समझ आ जाए। मुझे 15 साल बाद यह समझ आया कि अच्छा शिक्षक वह नहीं होता जो हर चीज बहुत अच्छे से समझा दे। क्योंकि इससे आप बच्चे से सोचने का मौका छीन लेते हैं। अच्छा शिक्षक वह होगा जो अच्छा समझाए लेकिन ऐसी स्थिति में छोड़े कि अपनी मुश्किलें खुद हल करें। आत्मनिर्भर भारत के साथ आत्मनिर्भर विद्यार्थी बनाना भी तो जरूरी है। अगर हम अपने ऊपर निर्भर बनाकर रखेंगे तो यह ठीक नहीं है। ये जो अपनी थिंकिंग है, वह जरूरी है। आप चीजों को समझते हैं, लेकिन याद होना भी जरूरी है। यह स्किल थिंकिंग से ही आती है। जब आप इतना कुछ करते हो तो आप एक्सप्लोर करोगे। यह है क्यूट लर्निंग। क्लाइंबिंग, अंडरस्टैंडिंग, थिंकिंग एंड एक्सप्लोरिंग।"


कौन हैं प्रोफेसर एचसी वर्मा?
बता दें कि प्रोफेसर एचसी वर्मा आईआईटी कानपुर के भौतिक विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें भारत सरकार की ओर से वर्ष 2021 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने भौतिकी (Physics) की लोकप्रिय किताब कॉन्सेप्ट ऑफ फिजिक्स लिखी है।

कार्यशाला में विभिन्न बोर्ड के शिक्षक हो रहे शामिल
दोपहर दो से शाम पांच बजे तक आयोजित किए जा रहे इस कार्यक्रम में  यूपी बोर्ड, सीबीएसई और सीआईएससीई के 10वीं और 12वीं के शिक्षक भी शामिल हो रहे हैं। प्रोफेसर वर्मा इस सभी को सरल तरीके से भौतिकी पढ़ाने की कला सिखाएंगे और शिक्षकों के सवालों का जवाब भी देंगे। 

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