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Supreme Court: शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं, रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए स्कूल की मांग पर सुप्रीम कोर्ट

Wed, 12 Feb 2025 01:42 PM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Wed, 12 Feb 2025 01:42 PM IST
सार

Rohingya Refugees: न्यायालय ने आज मामले की सुनवाई करते हुए कहा, "शिक्षा के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।" न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि न्यायालय सिर्फ यह जानना चाहता है कि ये रोहिंग्या परिवार कहां रह रहे हैं, किसके घर में रह रहे हैं और उनका विवरण क्या है।

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No discrimination in education: SC on plea for schools to Rohingya refugees
Supreme Court - फोटो : PTI

विस्तार

Supreme Court: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि शिक्षा के मामले में किसी भी बच्चे के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने इसके साथ ही उस याचिका पर सुनवाई अगले सप्ताह के लिए तय की जिसमें केन्द्र और दिल्ली सरकार को शहर में रोहिंग्या शरणार्थियों को सरकारी स्कूलों और अस्पतालों तक पहुंच प्रदान करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। 

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न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शिक्षा में किसी तरह के भेदभाव न करने की बात कहते हुए कहा कि अदालत सिर्फ यह जानना चाहती है कि ये रोहिंग्या परिवार कहां रह रहे हैं, किसके घर में रह रहे हैं और उनका विवरण क्या है।

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अगली सुनवाई 10 दिन बाद

एनजीओ रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस ने कहा कि उन्होंने एक हलफनामा दायर कर विस्तृत जानकारी दी है और बताया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के पास यूएनएचसीआर (शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त) कार्ड हैं।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यदि इन रोहिंग्या परिवारों के पास ये कार्ड होंगे तो एनजीओ के लिए विवरण देना आसान हो जाएगा।

इसके बाद गोंजाल्विस ने अदालत को अधिक विवरण देने के लिए कुछ समय मांगा।

शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 10 दिन बाद तय की है।

सुप्रीम कोर्ट ने गोंसाल्वेस से क्या कहा?

31 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ से कहा कि वह कोर्ट को बताए कि रोहिंग्या शरणार्थी शहर में कहां बसे हैं और उन्हें क्या-क्या सुविधाएं मिल रही हैं। कोर्ट ने गोंसाल्वेस से भी कहा कि वह हलफनामा दाखिल करके बताए कि दिल्ली में वे कहां बसे हैं।

गोंजाल्विस ने कहा कि एनजीओ ने रोहिंग्या शरणार्थियों को सार्वजनिक स्कूलों और अस्पतालों तक पहुंच प्रदान करने की मांग की थी, क्योंकि आधार कार्ड न होने के कारण उन्हें वहां तक पहुंच से वंचित रखा गया था।

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गोंजाल्विस का जवाब

उन्होंने कहा, "वे शरणार्थी हैं जिनके पास यूएनएचसीआर (शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त) कार्ड हैं और इसलिए उनके पास आधार कार्ड नहीं हो सकते। लेकिन आधार के अभाव में उन्हें सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है।"

गोंसाल्वेस ने कहा कि रोहिंग्या शरणार्थी दिल्ली के शाहीन बाग, कालिंदी कुंज और खजूरी खास इलाकों में रहते हैं।

उन्होंने कहा, "शाहीन बाग और कालिंदी कुंज में वे झुग्गियों में रह रहे हैं और खजूरी खास में वे किराए के मकान में रह रहे हैं।"

शीर्ष अदालत ने कहा था कि उसने ये प्रश्न यह समझने के लिए पूछे थे कि यदि वे शिविरों में रहते तो राहत की प्रकृति जनहित याचिका में उल्लिखित प्रकृति से भिन्न होती।

जनहित याचिका में प्राधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे सभी रोहिंग्या बच्चों को आधार कार्ड के बावजूद निशुल्क प्रवेश दें तथा उन्हें पहचान पत्र के लिए सरकार के आग्रह के बिना कक्षा 10वीं, 12वीं और स्नातक सहित सभी परीक्षाओं में भाग लेने की अनुमति दें।

जनहित याचिका में सरकारी अस्पतालों में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं, अंत्योदय अन्न योजना के तहत उपलब्ध सब्सिडी वाले खाद्यान्न और खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाभ जैसे सभी सरकारी लाभ रोहिंग्या परिवारों को भी अन्य नागरिकों की तरह उपलब्ध कराने की मांग की गई है, चाहे उनकी नागरिकता कुछ भी हो।

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