जम्मू-कश्मीर : जानिए क्या थे अनुच्छेद-370 और 35ए, जिनके कारण आज भी गर्म है सियासत
पहले जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं माना जाता था। लेकिन 370 हटने से देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी ये गतिविधियां अपराध की श्रेणी में आ गईं।
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जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर सेना के साथ-साथ सियासी हलचल भी तेज है। स्कूल-कॉलेजों से लेकर उच्च गति की इंटरनेट सेवाएं तक बंद कर दी गई हैं। कोरोना महामारी के कारण परीक्षाएं पहले से ही रद्द और स्थगित हैं। कई जगहों पर धारा-144 लागू कर दी गई है। इन सबके मूल में एक वजह है, वह 2019 में निरस्त किए गए अनुच्छेद-370 और 35ए के विवादित प्रावधान हैं। अब सवाल ये है कि आखिर ये अनुच्छेद हटने से जम्मू-कश्मीर में ऐसा क्या बदल गया? क्यों इस पर इतना बवाल हो रहा है? आगे समझें इन सवालों के जवाब...
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35ए के प्रावधान 17 नवंबर, 1952 से लागू थे। ये अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर और यहां के नागरिकों को कुछ अधिकार और सुविधाएं देते थे, जो देश के अन्य हिस्सों से अलग हैं। जब सरकार अनुच्छेद-370 के अधिकांश प्रावधानों को निरस्त कर दिया और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया तो वहां की राजनीतिक तस्वीर ही बदल गई। साथ ही साथ यहां के नागरिकों को मिलने वाले कुछ विशेष अधिकारों और सुविधाओं में भी कटौती हुई। यहां जानिए, वे कौन सी अहम चीजें हैं जो बदल गईं ...
- पहले जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती थी। इस राज्य का अपना झंडा भी था। अनुच्छेद-370 के प्रावधान हटने से ये चीजें खत्म हो गईं।
- पहले जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं माना जाता था। लेकिन 370 हटने से देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी ये गतिविधियां अपराध की श्रेणी में आ गईं।
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश पहले जम्मू-कश्मीर में मान्य नहीं होते। अब वहां के नागरिकों को भी शीर्ष अदालत के आदेश मानने पड़ते हैं।
- पहले रक्षा, विदेश, संचार छोड़कर अन्य मामलों में जम्मू-कश्मीर विधानसभा की सहमति लेनी पड़ती थी, अब वहां केंद्र सरकार अपने कानून लागू कर सकती है।
- पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह साल का होता था। अब अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटने से वहां भी अन्य सभी राज्यों की तरह विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्षों का होगा।
- हालांकि, अभी वहां विधानसभा नहीं है। अनुच्छेद-370 के प्रावधान निरस्त करने के साथ जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया था।
- जम्मू-कश्मीर दिल्ली और पुड्डुचेरी की तर्ज पर विधानसभा युक्त केंद्र शासित प्रदेश है। जबकि लद्दाख चंडीगढ़ की तरह बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश है।
- पहले कश्मीर में हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों को 16 फीसदी आरक्षण नहीं मिलता था। अब अनुच्छेद-370 के प्रावधान निरस्त होने से वहां भी अल्पसंख्यकों को आरक्षण का लाभ मिल पा रहा है।
वहीं, अनुच्छेद-35A के जरिए जम्मू-कश्मीर के स्थायी नागरिकता के नियम और नागरिकों के अधिकार तय होते थे। जैसे -
- इस प्रावधान के अनुसार, 14 मई, 1954 या इससे पहले 10 सालों से राज्य में रहने वालों और वहां संपत्ति हासिल करने वालों को ही जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक बताया गया था। इन निवासियों को विशेष अधिकार प्राप्त होते थे।
- स्थायी निवासियों को ही राज्य में जमीन खरीदने, सरकारी नौकरी पाने, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के अधिकार मिले हुए थे। बाहरी / अन्य लोगों को यहां जमीन खरीदने, सरकारी नौकरी पाने, संस्थानों में दाखिला लेने का अधिकार नहीं था।
- अगर जम्मू-कश्मीर की कोई महिला भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर लेती थी, तो उसके अपनी पैतृक संपत्ति पर से अधिकार छिन जाते थे। लेकिन पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं था।
- अब देश का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर राज्य में जमीन खरीद पा रहे हैं। वे वहां सरकारी नौकरी भी कर सकते हैं।
- देश के किसी भी राज्य के विद्यार्थी वहां उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला ले सकते हैं।
- जम्मू-कश्मीर में महिला और पुरुषों के बीच अधिकारों को लेकर भेदभाव खत्म हो गया है।
- इतना ही नहीं, अब देश का कोई भी व्यक्ति कश्मीर में जाकर बस सकता है।
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