जानें नानावती आयोग को, जिसने गुजरात दंगा मामले में पीएम मोदी को दी क्लीन चिट
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गुजरात में साल 2002 में हुए दंगे (गोधरा कांड) पर जस्टिस नानावती-मेहता आयोग की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राहत मिल गई है। यह रिपोर्ट 11 दिसंबर को गुजरात विधानसभा में पेश की गई। इसमें पीएम मोदी को क्लीन चिट दे दी गई है। इस बात की जानकारी गृह मंत्री प्रदीप सिंह ने विधानसभा में दी।
आयोग की रिपोर्ट में पीएम मोदी के साथ-साथ तत्कालीन मंत्री हरेन पांड्या, भरत बारोट और अशोक भट्ट को भी राहत दी गई है। हालांकि राहुल शर्मा, आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और आरबी श्रीकुमार की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।
क्या था गोधरा कांड? दंगों के मामले में पीएम मोदी पर क्या था आरोप? क्या है नानावती आयोग? कब और किस काम के लिए हुआ था नानावती आयोग का गठन? इन सभी सवालों के जवाब आगे पढ़ें।
क्या है नानावती आयोग
- आज से करीब 18 साल पहले, 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा में साबरमति एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों को जला दिया गया था। इस घटना के बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। इन्हीं दंगों की जांच के लिए 3 मार्च 2002 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने नानावती-मेहता आयोग का गठन किया था।
- सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति जीटी नानावती को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। वहीं, न्यायमूर्ति केजी शाह इस आयोग के दूसरे सदस्य थे।
- शुरुआत में इस आयोग को साबरमति एक्सप्रेस में आगजनी से जुड़े तथ्यों की जांच सौंपी गई थी। फिर जून 2002 में गोधरा कांड के बाद राज्यभर में भड़की हिंसा की जांच की भी जिम्मेदारी दे दी गई।
- आयोग ने दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी, उनके मंत्रिमंडल सहयोगियों व वरिष्ठ अफसरों की भूमिका की भी जांच की।
- 2009 में न्यायमूर्ति केजी शाह के निधन का निधन हो गया। इसके बाद न्यायमूर्ति अक्षय मेहता को आयोग का सदस्य बनाया गया।
कब-कब सौंपी गई रिपोर्ट
- इस आयोग ने गोधरा कांड पर अपनी पहली रिपोर्ट दंगों के करीब 6 साल बाद, सितंबर 2008 में पेश की थी। इसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी गई थी।
- तब आयोग ने साबरमती एक्सप्रेस की बोगी संख्या-6 में आग लगाए जाने को सुनियोजित साजिश का परिणाम बताया था।
- तब से अब तक, करीब 12 सालों में 24 बार आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया।आयोग ने 45 हजार शपथ पत्रों और हजारों गवाहों के बयान के बाद करीब ढाई हजार पेज की रिपोर्ट तैयार की। इसे 18 नवंबर 2014 को तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सौंप दिया गया था।
- अब जाकर इसे अंतिम रूप से विधानसभा में पेश किया गया।
- एक आरटीआई (RTI) के अनुसार, इस पूरी जांच में सात करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए।
गोधरा कांड - कब क्या हुआ
- 27 फरवरी 2002 : गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में भीड़ द्वारा आग लगाए जाने के बाद 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी। इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
- 28 फरवरी 2002 : गुजरात के कई इलाकों में दंगे भड़क गए। जिनमें 1200 से अधिक लोग मारे गए। दंगों में मारे गए लोगों में ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के थे।
- 03 मार्च 2002 : गोधरा में ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया था।
- 06 मार्च 2002 : गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया।
- 09 मार्च 2002 : पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) लगाई।
- 25 मार्च 2002 : केंद्र सरकार के दबाव के कारण सभी आरोपियों पर से पोटा हटा लिया गया।
- 18 फरवरी 2003 : गुजरात में दोबारा भाजपा सरकार चुनी गई और आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया गया।
- 21 नवंबर 2003 : उच्चतम न्यायालय ने गोधरा में ट्रेन जलाए जाने के मामले समेत दंगे से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक सुनवाई पर रोक लगाई।
- 04 सितंबर 2004 : जब राजद नेता लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री थे, तब केद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश यूसी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति गठित हुई। इस समिति को घटना के कुछ पहलुओं की जांच का काम दिया गया।
- 21 सितंबर 2004 : नई गठित संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और अरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया।
- 17 जनवरी 2005 : यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की। इसमें बताया कि ट्रेन की एस-6 में लगी आग एक ‘दुर्घटना’ थी। समिति ने बाहरी तत्वों द्वारा आग की साजिश की आशंका खारिज कर दी।
- 16 मई 2005 : पोटा समीक्षा समिति ने राय दी कि आरोपियों पर पोटा के तहत आरोप नहीं लगाए जाएं।
- 13 अक्तूबर 2006 : गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि यूसी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है। नानावती-शाह आयोग पहले ही दंगे के हर पहलू की जांच कर रहा है। बनर्जी समिति की जांच रिपोर्ट भी अमान्य करार दे दी गई।
- 18 सितंबर 2008 : नानावती आयोग ने गोधरा कांड की जांच सौंपी। इसमें कहा कि यह पूर्व नियोजित षड्यंत्र था और एस-6 कोच को भीड़ ने पेट्रोल डालकर जलाया।
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- 01 मई 2009 : उच्चतम न्यायालय ने गोधरा मामले की सुनवाई से प्रतिबंध हटाया। सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता वाले विशेष जांच दल ने गोधरा कांड व दंगों से जुड़े आठ अन्य मामलों की जांच शुरू की।
- 01 जून 2009 : गोधरा कांड की सुनवाई अहमदाबाद के साबरमती केंद्रीय जेल के अंदर ही शुरू हुई।
- 06 मई 2010 : उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई अदालत को गोधरा कांड समेत गुजरात दंगों से जुड़े नौ अन्य संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने से रोका।
- 28 सितंबर 2010 : सुनवाई पूरी हुई। लेकिन शीर्ष अदालत की रोक के कारण फैसला नहीं सुनाया गया।
- 18 जनवरी 2011 : उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाए जाने से रोक हटाई।
- 22 फरवरी 2011 : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया। वहीं, 63 अन्य को बरी किया गया।
- 1 मार्च 2011 : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई।
- 18 नवंबर 2014 : गोधरा कांड की जांच कर रहे नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट गुजरात सरकार को सौंपी।
- 11 दिसंबर 2019 : नानावती-मेहता आयोग की अंतिम रिपोर्ट गुजरात विधानसभा में पेश की गई।
क्या था आरोप
विधानसभा में रिपोर्ट पेश करते हुए गुजरात के गृह मंत्री प्रदीप सिंह ने कहा कि 'तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा था कि किसी को कोई जानकारी दिए बिना वह गोधरा गए थे। दूसरा ये कि गोधरा रेलवे स्टेशन पर ही सभी 59 कारसेवकों का शवों का पोस्टमार्टम किया गया था।'
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प्रदीप सिंह ने बताया कि पहले आरोप को आयोग ने खारिज कर दिया है। कहा गया है कि इसके बारे में सभी सरकारी एजेंसियों को जानकारी थी। वहीं दूसरे आरोप के मामले में भी आयोग ने कहा है कि मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अधिकारियों के आदेश से पोस्टमार्टम किया गया था।