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NEET UG Counselling: चॉइस फिलिंग और चॉइस लॉकिंग... दोनों में क्या अंतर? समझें दोनों स्टेप्स में क्या होता है

Tue, 11 Aug 2026 07:00 AM IST
Akash Kumar एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Akash Kumar Updated Tue, 11 Aug 2026 07:00 AM IST
सार

NEET UG Counselling 2026: काउंसलिंग में कॉलेज और कोर्स चुनना ही काफी नहीं है। उम्मीदवार को यह भी समझना जरूरी है कि चॉइस फिलिंग के बाद चॉइस लॉकिंग क्यों की जाती है। दोनों चरणों में छोटी-सी गलती सीट आवंटन के नतीजे पर असर डाल सकती है।
 

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NEET UG Counselling: Choice Filling vs Choice Locking, Know the Key Difference
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

NEET UG Counselling 2026: नीट यूजी काउंसलिंग में शामिल उम्मीदवारों के लिए सिर्फ रैंक हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होता। काउंसलिंग के दौरान कई ऐसे चरण होते हैं, जिनमें उम्मीदवार को खुद फैसले लेने होते हैं। इनमें चॉइस फिलिंग और चॉइस लॉकिंग सबसे अहम चरणों में शामिल हैं।

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खासकर पहली बार काउंसलिंग में हिस्सा लेने वाले छात्रों को अक्सर इन दोनों प्रक्रियाओं में अंतर समझने में परेशानी होती है। दोनों के नाम एक-दूसरे से जुड़े हुए लगते हैं, लेकिन इनका काम अलग है।
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सीधे शब्दों में समझें तो पहले उम्मीदवार अपनी पसंद के कॉलेज और कोर्स की सूची तैयार करता है। इसके बाद वह उस सूची को अंतिम रूप देता है। यही अंतर चॉइस फिलिंग और चॉइस लॉकिंग के बीच है।

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Choice Filling में उम्मीदवार को क्या करना होता है?

चॉइस फिलिंग वह चरण है, जिसमें उम्मीदवार काउंसलिंग पोर्टल पर उपलब्ध कॉलेज और कोर्स में से अपनी पसंद दर्ज करता है। उम्मीदवार अपनी रैंक, पसंद और उपलब्ध सीटों को ध्यान में रखते हुए विकल्पों की सूची तैयार कर सकता है। इस सूची में एक से ज्यादा कॉलेज और कोर्स शामिल किए जा सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चॉइस फिलिंग के दौरान उम्मीदवार को अपनी सूची में बदलाव करने की सुविधा मिलती है। यानी अगर बाद में उसे लगता है कि किसी कॉलेज को ऊपर रखना चाहिए या किसी दूसरे विकल्प को हटाना है, तो वह ऐसा कर सकता है।

चॉइस फिलिंग में क्या-क्या बदला जा सकता है?

  • अपनी पसंद का नया कॉलेज या कोर्स जोड़ा जा सकता है।
  • पहले से चुने गए किसी विकल्प को हटाया जा सकता है।
  • कॉलेज और कोर्स की प्राथमिकता बदली जा सकती है।
  • पसंद की सूची में किसी विकल्प को ऊपर या नीचे किया जा सकता है।
  • काउंसलिंग की तय समय सीमा के भीतर सूची को दोबारा व्यवस्थित किया जा सकता है।


इसलिए चॉइस फिलिंग को आप अपनी अंतिम पसंद की तैयारी के चरण के रूप में समझ सकते हैं। इस दौरान उम्मीदवार के पास अपनी प्राथमिकताओं को सुधारने का मौका रहता है।

Choice Locking में क्या होता है?

चॉइस लॉकिंग का मतलब है कि उम्मीदवार अपनी तैयार की गई पसंद की सूची को अंतिम रूप दे देता है। जब उम्मीदवार अपनी चॉइस लॉक करता है, तो उसके द्वारा बनाई गई सूची को अंतिम माना जाता है। इसके बाद आम तौर पर उस सूची में बदलाव करने की अनुमति नहीं होती।

यानी चॉइस फिलिंग के दौरान जो सूची तैयार की गई थी, चॉइस लॉकिंग के बाद वही अंतिम सूची बन जाती है। सीट आवंटन की प्रक्रिया इसी अंतिम रूप से तय की गई पसंद को ध्यान में रखकर की जाती है।

चॉइस लॉक करने से पहले क्या जांचना चाहिए?

चॉइस लॉक करने से पहले उम्मीदवार को पूरी सूची को एक बार नहीं, बल्कि अच्छी तरह जांच लेना चाहिए। खासकर कॉलेज और कोर्स की प्राथमिकता में किसी तरह की गलती नहीं होनी चाहिए। चेक करें:

  • सबसे पसंदीदा कॉलेज और कोर्स सबसे ऊपर है या नहीं।
  • सभी जरूरी कॉलेज और कोर्स सूची में शामिल हैं या नहीं।
  • किसी विकल्प को गलती से हटाया तो नहीं गया है।
  • कॉलेज और कोर्स की प्राथमिकता सही क्रम में है या नहीं।
  • अंतिम सूची वही है, जिसे आप वास्तव में सीट आवंटन के लिए रखना चाहते हैं।

Choice Filling और Choice Locking में आखिर क्या अंतर है?

दोनों प्रक्रियाओं को एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी उम्मीदवार ने मेडिकल कॉलेजों की अपनी पसंद की सूची बनाई है। वह सूची तैयार करना चॉइस फिलिंग है। अब जब उम्मीदवार उस सूची को देखकर तय करता है कि यही उसकी अंतिम पसंद है और उसे लॉक कर देता है, तो यह चॉइस लॉकिंग है।

इसलिए दोनों प्रक्रियाओं को एक ही समझना सही नहीं है। चॉइस फिलिंग में उम्मीदवार अपनी पसंद बनाता और व्यवस्थित करता है, जबकि चॉइस लॉकिंग में उसी पसंद को अंतिम मंजूरी देता है।

सीट अलॉटमेंट में आपकी चॉइस का क्या असर पड़ता है?

काउंसलिंग में सीट आवंटन कई चीजों पर निर्भर करता है। इसमें उम्मीदवार की रैंक, आरक्षण से जुड़े नियम, उपलब्ध सीटें और उम्मीदवार द्वारा दी गई तथा लॉक की गई प्राथमिकताएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उदाहरण के लिए, अगर उम्मीदवार ने अपनी पसंद की सूची में किसी कॉलेज को ऊपर रखा है और उसकी रैंक तथा उपलब्ध सीटों के आधार पर वह विकल्प मिल सकता है, तो सीट आवंटन उसी प्राथमिकता को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

इसी वजह से चॉइस का क्रम बहुत महत्वपूर्ण है। केवल ज्यादा कॉलेज चुन लेना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही प्राथमिकता के साथ रखना भी जरूरी है।

सीट आवंटन से पहले इन बातों का ध्यान रखें

  • अपनी पसंद के कॉलेज को प्राथमिकता के हिसाब से ऊपर रखें।
  • पसंदीदा कोर्स और कॉलेज का क्रम सोच-समझकर तय करें।
  • केवल एक-दो विकल्पों पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध और पसंदीदा विकल्पों की उचित सूची बनाएं।
  • चॉइस लॉक करने से पहले पूरी सूची दोबारा जांचें।
  • रैंक और उपलब्ध सीटों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक विकल्प भी शामिल करें।

इन गलतियों से बचें

  • बिना जानकारी के कॉलेज और कोर्स का क्रम तय न करें।
  • केवल नाम देखकर किसी कॉलेज को प्राथमिकता न दें।
  • चॉइस लॉक करने से पहले सूची की दोबारा जांच करना न भूलें।
  • अंतिम तारीख का इंतजार न करें।
  • काउंसलिंग के आधिकारिक नियमों को नजरअंदाज न करें।
  • यह मानकर न चलें कि हर काउंसलिंग में चॉइस लॉक न करने पर सिस्टम अपने आप चॉइस लॉक कर देगा।

 

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