लोकसभा : रक्षा राज्य मंत्री बोले- एपीएस छात्रों को बदलने पड़ते हैं शहर, क्षेत्रीय भाषाएं पढ़ाने से बढ़ेंगी मुश्किलें
Army Public Schools: केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री ने शुक्रवार को संसद में जवाब देते हुए कहा कि आर्मी पब्लिक स्कूलों में तीन भाषाओं को पढ़ाया जाना तय किया गया है। इनमें हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत शामिल है। यह व्यवस्था कोई नई व्यवस्था नहीं है, ऐसा 1950 में स्कूलों की स्थापना के साथ ही तय कर दिया गया था।
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आर्मी वेलफेयर एंड एजुकेशन सोसाइटी की ओर से संचालित आर्मी पब्लिक स्कूलों (APS) में क्षेत्रीय भाषाओं को नहीं पढ़ाए जाने को, सरकार ने उचित ठहराया है। केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री ने शुक्रवार को संसद में जवाब देते हुए कहा कि आर्मी पब्लिक स्कूलों के बच्चों के शहर अक्सर बदलते रहते हैं। इसलिए उन्हें क्षेत्रीय भाषाएं नहीं पढ़ा सकते हैं। अगर उन्हें क्षेत्रीय भाषा को और उसमें पढ़ाया जाएगा तो भविष्य में शहर और राज्य के बदल जाने पर उन्हें बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इससे उनके करियर पर अतिरिक्त बोझ भी बढ़ सकता है।
सैन्यकर्मियों के बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए खोले गए थे स्कूल
रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने लोकसभा में लिखित जवाब में कहा कि आर्मी पब्लिक स्कूलों की स्थापना भारतीय सेना के कर्मियों के बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए की गई है। जोकि विभिन्न धर्मों, राज्यों और क्षेत्रों से आते हैं। अन्य स्कूलों जहां स्थानीय बच्चों की बाहुल्यता होती है, की अपेक्षा सभी 136 आर्मी पब्लिक स्कूलों में प्राथमिकता के आधार पर सैन्यकर्मियों के बच्चों को दाखिला दिया जाता है। मंत्री ने कहा कि सैन्य कर्मियों को जिम्मेदारियों और सैन्य सेवा की आवश्यकता के आधार पर समय-समय पर एक से दूसरे स्थान पर तत्काल प्रभाव से स्थानांतरित किया जाता रहता है।
यह व्यवस्था 1950 से ही चली आ रही है
केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि कई बार तो ट्रांसफर एकेडमिक सेशन के बीच में ही हो जाता है। कई बार परिवार से काफी दूर रहना पड़ता है। ऐसे में इनके बच्चों की पढ़ाई निर्बाध रूप से सुनिश्चित करते हुए आर्मी पब्लिक स्कूलों में तीन भाषाओं को पढ़ाया जाना तय किया गया है। इनमें हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत शामिल है। यह व्यवस्था कोई नई व्यवस्था नहीं है, ऐसा 1950 में स्कूलों की स्थापना के साथ ही तय कर दिया गया था।
छात्रों पर अनावश्यक दबाव और बोझ बढ़ेगा
मंत्री ने अपने जवाब में कहा कि अकादमिक सत्र के बीच में क्षेत्रीय भाषा बदलने से छात्रों पर अनावश्यक दबाव और बोझ बढ़ेगा। जबकि सैन्य अधिकारियों के तबादले छोटी-छोटी अवधि में होते रहते हैं। उनके बच्चों को पढ़ाई प्रभावित होने से उनके जीवन में भावनात्मक असर पड़ सकता है। ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं को पढ़ाना उचित नहीं है।
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