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विश्व गौरेया दिवस आज : घरौंदा छिनने से गुम हुआ राजधानी का राज्य पक्षी
Sat, 20 Mar 2021 05:06 AM IST
दुष्यंत शर्मा
संतोष कुमार, नई दिल्ली
संतोष कुमार, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 20 Mar 2021 05:06 AM IST
सार
- विशेषज्ञों की राय, सही तरीके से कोशिश की जाए तो लौट सकते हैं राज्य पक्षी के दिन
- राजधानी में विकसित हो रहे पार्कों के नजदीक बनाया अपना अशियाना
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गौरैया
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कभी घर-आंगन में चहकने वाली गौरैया बेशक मौजूदा वक्त में कम नजर आती हो, लेकिन दिल्ली में अभी इसने प्रजनन क्षमता नहीं खोई है। राजधानी की राज्य पक्षी को अगर रहने के लिए प्राकृतिक घरौंदा मिल जाए तो वह दोबारा दिल्ली की शान बन सकती है। गांवों के नजदीक विकसित यमुना बायो डायवर्सिटी पार्क के इर्द-गिर्द गौरैया की चहचहाहट से यह साबित भी होता है।
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गांवों में पर्याप्त खाना मिलने और पार्क की रिहायश में उसने रहना स्वीकार कर लिया है। पिछले कुछ समय से इस पार्क की परिधि पर 40 से 50 गौरैया झुंड के रूप में नजर आ जाती हैं। पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि यमुना बायो डायवर्सिटी समेत दूसरे पार्कों में गौरैया की वापसी हो रही है, लेकिन यह इस बात का भी सुबूत है कि पर्यावास खत्म होने से इस चिड़िया ने दूसरे स्थानों पर दिखाई देना बंद कर दिया है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि जीवाश्मीय प्रमाण मिले हैं कि अस्तित्व में आने के बाद से ही गौरैया की मनुष्यों पर निर्भरता बनी रही। इंसानी बस्तियों के नजदीक इनका रहना हुआ है। पेड़-पौधों ने उन्हें रिहायश दी थी। घरों से निकले तरह-तरह के कच्चे व पके अनाज और कीट-पतंगे इनके व इनके चूजों का पेट भरने का जरिया थे। दिल्ली के बीते 20 साल के विकास ने पूरे सिस्टम में उलटफेर कर दिया है, जो पक्षियों की संख्या में गिरावट के तौर पर देखा गया है।
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बायो डायवर्सिटी पार्क के इंचार्ज डॉ. फैय्याज खुदसर बताते हैं कि बावजूद इन दिक्कतों के अभी उम्मीद खत्म नहीं हुई है। इसमें सबसे अहम यह है कि दिल्ली में गौरैया की प्रजनन क्षमता अभी खत्म नहीं हुई है। प्राकृतिक पर्यावास खत्म होने से यह यहां से खत्म होती जा रही हैं। अगर गौरैया के रहने व खाने का अनुकूल माहौल मिले तो दोबारा दिल्ली में उसकी चहचहाहट सुनी जा सकती है।
तीन गांवों और पार्क की सीमा पर बड़ी संख्या में रिहायश
यमुना बायो डायवर्सिटी पार्क के नजदीक तीन गांव हैं, जगतपुर, संगम विहार व बाबा कालोनी। बड़ी संख्या में गौरैया ने गांव व पार्क की सीमा पर आशियाना बना रखा है। गांव में उन्हें खाना मिल जाता है और पार्क की परिधि पर रहने लायक जगह। इससे उनकी आबादी तेजी से बढ़ी है। इस वक्त वहां 40 से 50 चिड़िया झुंड में भी देखी जाती हैं। दिलचस्प यह है कि गौरैया पार्क के बीच में नहीं दिखती। विशेषज्ञ मानते हैं कि घने जंगल को गौरैया आसानी से स्वीकार नहीं करती है। तिलपत और अरावली के पार्क की भी यही कहानी है।
इंसानों की दोस्त है यह नन्हीं चिड़िया
विशेषज्ञों का कहना है कि गौरैया इंसानों की दोस्त भी है। घरों के आसपास रहने की वजह से यह उन नुकसानदेह कीट-पतंगों को अपने बच्चों के भोजन के तौर पर इस्तेमाल करती थी, जिनका इस वक्त प्रकोप इंसानों पर भारी पड़ता है। कीड़े खाने की आदत से इसे किसान मित्र पक्षी भी कहा जाता है। अनाज के दाने, जमीन में बिखरे दाने भी यह खाती है। मजेदार बात यह कि खेतों में डाले गए बीजों को चुगकर यह खेती को नुकसान भी नहीं पहुंचाती। यह घरों से बाहर फेंके गए कूड़े-करकट में भी अपना आहार ढूंढती है।
दिल्ली की है राज्य पक्षी
दिल्ली सरकार ने गौरैया के संरक्षण के लिए इसे राज्य पक्षी का दर्जा दे रखा है। सरकार की कोशिश है कि गौरैया को फिर से दिल्ली में वापस लाया जाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि गौरैया की 40 से ज्यादा प्रजातियां हैं, लेकिन शहरी जीवन में आए बदलावों से इनकी संख्या में 80 फीसदी तक कम हुई है।
अक्सर झुंड में रहती है
गौरैया अमूमन झुंड में रहती है। भोजन की तलाश में यह 2 से 5 मील तक चली जाती है। यह घोंसला बनाने के लिए मानव निर्मित एकांत स्थानों या दरारों, पुराने मकानों का बरामदा, बगीचों की तलाश करती है। अक्सर यह अपना घोंसला मानव आबादी के निकट ही बनाती हैं। इनके अंडे अलग-अलग आकार के होते हैं। अंडे को मादा गौरैया सेती है। गौरैया की अंडा सेने की अवधि 10-12 दिनों की होती है, जो सारी चिड़ियों की अंडे सेने की अवधि में सबसे कम है।