{"_id":"61e20ec3e2580c1c4e56a0b1","slug":"research-by-recognizing-the-severity-of-sepsis-treatment-will-be-easier-now","type":"story","status":"publish","title_hn":"शोध : सेप्सिस की गंभीरता पहचानकर अब इलाज हो जाएगा आसान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शोध : सेप्सिस की गंभीरता पहचानकर अब इलाज हो जाएगा आसान
Sat, 15 Jan 2022 05:31 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 15 Jan 2022 05:31 AM IST
सार
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने सेप्सिस संबंधी जटिलताओं में श्वेत रक्त कोशिका की भूमिका पहचानी।
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं ने सेप्सिस (रक्त संक्रमण) से जुड़ी जटिलताओं में व्हाइट ब्लड सेल (डब्ल्यूबीसी) की भूमिका की पहचान की है, जिससे सेप्सिस की गंभीरता की जानकारी हासिल कर समय पर उचित इलाज करने में मदद मिलेगी। अनुसंधान के नतीजों को अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ इम्यूनोलॉजिस्ट (एएआई) की आधिकारिक शोध पत्रिता जर्नल ऑफ इम्युनोलॉजी में प्रकाशित किया गया था। इंडियन इम्यूनोलॉजी सोसायटी ने इस शोध पत्र को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया।
विज्ञापन
शोध दल के मुताबिक रक्त में न्यूट्रोफिल, मोनोसाइट और मैक्रोफेज जैसी श्वेत कोशिकाएं होती हैं, जो मृत कोशिकाओं और शरीर के बाहर से आने वाले कणों मसलन विषाणु (वायरस) व जीवाणु (बैक्टीरिया) को शरीर से निकालने का काम करती हैं। यह कोशिकाएं रक्त के जरिये उस स्थान पर पहुंचती हैं, जहां पर अवांछित तत्व होते हैं। इसके बाद ये कोशिकाएं, अवांछनीय कणों को नष्ट करने व शरीर से बाहर निकालती हैं।
विज्ञापन
लेकिन, जब यह प्रक्रिया अनियंत्रित हो जाती है तो इसे सेप्सिस कहा जाता है। इसमें रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं की असामान्य क्रियाशीलता और जमाव देखा जाता है। सारंगी ने बताया कि जब ये कोशिकाएं रक्त धमनियों से गुजरते हुए ऊत्तकों के बीच के रास्तों से संक्रमण के स्थान पर जाती हैं, तो वे कोलेजन या फाब्रोनेक्टिन से भी जुड़ जाती हैं। जुड़ने की यह प्रक्रिया ग्राही कण के जरिये होता है, जिसे इंटीग्रिन्स कहते हैं जो कोशिकाओं की सतह पर होता है।
विज्ञापन
इंटीग्रिन्स ग्राही प्रतिरोधक कोशिका को आसपास के सांचे से जुड़ने में मदद करते हैं, जिससे कोशिकाओं को एक स्थान से दूसरे पर जाने में आसानी होती है। सारंगी ने बताया कि जब संक्रमण होता है तो मोनोसाइट कोशिकाएं रक्त धमनियों और अस्थि मज्जा के जरिये संक्रमित या सूजे हुए ऊत्तकों की ओर बढ़ती है। एक बार ऊत्तक में प्रवेश करने के बाद मोनोसाइट परिपक्व होकर मैक्रोफेज में तब्दील हो जाती हैं। इसके बाद सेप्सिस बनने के बाद ये कोशिकाएं अन्य रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं का दमन करने लगती हैं। आम तौर पर इसी स्थिति को रक्त संक्रमण बोला जाता है। एजेंसी
अहम अंग हो जाते हैं प्रभावित
आईआईटी रुड़की में बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रोफसेर परिणिता पी सारंगी ने बताया कि जब कि ये कोशिकाएं समूह में शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जाती हैं तो फेफड़े, गुर्दा व जिगर जैसे अहम अंगों में जमा होने लगती हैं। इनके अत्यधिक जमाव से कई बार ये अंग अपना काम नहीं कर पाते हैं और पूरी तरह से बेकार हो सकते हैं। यहां तक कि इसकी वजह से व्यक्ति की मौत हो सकती है।