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केजरीवाल के मास्टर, जिन्होंने देश-विदेश घूमकर सुधारी दिल्ली के सरकारी स्कूलों की दशा

Tue, 11 Feb 2020 06:08 PM IST
Trainee Trainee डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Trainee Trainee Updated Tue, 11 Feb 2020 06:08 PM IST
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Kejriwal master who roamed country and abroad improved condition of government schools in Delhi
Arvind Kejriwal - फोटो : ANI
दिल्ली के सरकारी स्कूलों की कायापलट करने के लिए अरविंद केजरीवाल ने 200 मास्टरों को देश-विदेश के बेहतरीन संस्थानों से ट्रेनिंग दिलाई। उनका मकसद था कि विदेशों की बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था को दिल्ली लाया जाए। इसके लिए उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया एवं उनकी सलाहकार अतिशी मार्लेना को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। पहले यह पता लगाया गया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में कमी कहां पर है। क्या वह सिस्टम के तहत है या टीचरों की वजह से है।
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इसी पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर केजरीवाल को सौंपी गई। इस रिपोर्ट में कई बातें शामिल रहीं। जैसे, सरकारी स्कूलों के गिरते स्तर को ऊपर उठाने के लिए चौतरफा काम करना होगा। शिक्षा तकनीक के अलावा संसाधन और स्टाफ बाबत भी विशेष नीति बनाने पर बल दिया गया। 2017 में दिल्ली सरकार के 36 हजार से अधिक शिक्षकों को राज्य शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद से ट्रेनिंग दिलाई गई। 2018 में अनेक मास्टरों को ट्रेनिंग के विदेश भेजा गया। जब ये मास्टर अपनी ट्रेनिंग पूरी कर वापस लौटे तो उन्हें 'मेंटर टीचर' का दर्जा दिया गया।
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ये टीचर दूसरे सरकारी स्कूलों में पहुंच कर मास्टरों को ट्रेनिंग देने लगे। यहीं से दिल्ली के सरकारी स्कूलों की कायापलट शुरू हो गई। 2015 में मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल ने सबसे पहले दिल्ली की दयनीय शिक्षा व्यवस्था की हालत सुधारने का बीड़ा उठाया। उन्हें जो रिपोर्ट सौंपी गई, उसमें दिल्ली के हर स्कूल का उल्लेख था। वे जानते थे कि यह एक ऐसा मुद्दा है जो सभी लोगों से सीधे जुड़ा है। सरकारी स्कूलों का स्तर ऐसा हो गया था कि गरीब लोग भी अपने बच्चों को आसपास के पब्लिक स्कूलों में भेज रहे थे।
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चाहे उनकी आर्थिक स्थिति इसकी मंजूरी न दे, लेकिन इसके बावजूद वे निजी स्कूल में ही अपने बच्चों को पढ़ाना पसंद करते हैं। केजरीवाल ने अभिभावकों की इस नब्ज को अच्छी तरह पकड़ लिया था। दिल्ली में बिजली पानी फ्री था और अब बच्चों की पढ़ाई का स्तर भी सुधर जाए तो इसका राजनीतिक फायदा आप को मिल सकता है। चुनाव में यही हुआ। विपक्षी दल केजरीवाल को शाहीन बाग जैसे मुद्दे पर घेर रहे थे, जबकि आप संयोजक लोगों के सामने यह कह रहे थे कि आपको पांच साल का कामकाज ठीक लगा हो तो वोट दे देना, अन्यथा मत देना। मनीष सिसोदिया और संजय सिंह सहित दूसरे आप नेताओं ने अपनी जनसभाओं में शिक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा जोरशोर से उठाया। मनीष सिसोदिया ने कहा, देश का यह पहला चुनाव रहा है जिसमें शिक्षा भी एक मुद्दा बन गया।


पहले देश फिर विदेश में मास्टरों को दिलाया विशेष प्रशिक्षण
आप सरकार ने 2017 में एक अलग तरह का प्रयोग किया। दिल्ली के सरकारी मास्टर जो कि लंबे समय से पढ़ा रहे थे, उन्हें भी ट्रेनिंग देने का निर्णय लिया गया। यह ट्रेनिंग बाकायदा राज्य शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) से दिलाई गई। दिल्ली के 36 हजार से अधिक मास्टर इस ट्रेनिंग का हिस्सा बने। इन मास्टरों में 26 हजार प्रशिक्षित ग्रेजुएट टीचर (टीजीटी) और दस हजार पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) शामिल हैं। शिक्षा के मौजूदा स्तर को पूरी तरह बदलने का प्रयास किया गया।

2018 में 200 मास्टरों को विश्व के बेहतरीन शिक्षकों यानी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, से ट्रेनिंग दिलाई गई। जब ये मास्टर अपना प्रशिक्षण पूरा कर वापस लौटे तो उन्हें 'मेंटर टीचर' का दर्जा दिया गया। एक मास्टर को छह स्कूल दिए गए। ये मास्टर वहां पढ़ा रहे अध्यापकों को ट्रेनिंग देने लगे। पढ़ाने और सिखाने की नई तकनीक से दूसरे शिक्षकों को अवगत कराया गया। इसके बाद दिल्ली सरकार ने स्कूलों का माहौल बदलने की योजना पर काम किया। क्लासरूम की कायापलट की गई। स्मार्ट क्लास की शुरुआत हुई। यह पता लगाया गया कि बच्चे सरकारी स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं।


ऐसे छात्रों की सूची बनाई गई जो नए सिस्टम के मुताबिक खुद को नहीं ढाल पा रहे थे। उनके लिए अतिरिक्त क्लास लगाई गई। चुनौती प्रोजेक्ट के जरिए नौवीं तक के छात्रों के शिक्षा स्तर को काफी हद तक सुधारा गया। इससे विद्यार्थियों का पास प्रतिशत बढ़ गया। विद्यार्थी जो बीच में पढ़ाई छोड़ देते थे, उनकी संख्या में खासी गिरावट देखने को मिली। कक्षा 11 के छात्रों का पास प्रतिशत दस फीसदी बढ़ गया। पास प्रतिशत 2017-18 में 71 था, वहीं, 2018-19 में ये बढ़ कर 80 प्रतिशत हो गया। कक्षा आठवीं से 12 तक के नतीजों में भी लगातार सुधार आता दिखाई दे रहा है।
  
 
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