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आम लोगों की निगरानी रखने संबंधी कानून की विस्तृत जानकारी देने का निर्देश
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नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से आम लोगों की निगरानी रखने संबंधी कानून के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी देने का निर्देश दिया है। अदालत ने फोन की निगरानी और टैप किए जाने के संबंध में प्रक्रिया का विवरण मांगा है। दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों की निजता के अधिकार का उल्लंघन है। वहीं केंद्र ने विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगते हुए तर्क रखा कि तय नियमों का पालन किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल एवं न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने सरकार से आम लोगों की फोन टैपिंग, इंटरनेट व अन्य माध्यमों से निगरानी रखने संबंधी सभी कानूनों के बारे में विस्तृत रूप से शपथपत्र सहित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। पीठ ने यह जानकारी एक संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) की याचिका पर सुनवाई करते हुए मांगी। अदालत ने मामले की सुनवाई 30 सितंबर तय की है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि सरकार सामान्य निगरानी तंत्र के माध्यम से आम लोगों की निगरानी कर रही है और उसके बारे में पर्याप्त मात्रा में जानकारी एकत्र कर रही है। यह जानकारी फोन टैपिंग, इंटरनेट पर निगरानी रखकर, उनके कहीं दूसरे जगह यात्रा करने या दूसरे शहर में यात्रा करने आदि के माध्यम से एकत्रित की जा रही है।
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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि वे इसके लिए विशेष रूप से केंद्रीकृत निगरानी प्रणाली (सीएमएस), नेटवर्क और यातायात विश्लेषण और राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड का प्रयोग कर रहे हैं। ये निगरानी प्रणाली सरकार को मोबाइल फोन, लैंडलाइन और इंटरनेट के माध्यम से व्यक्तियों के संचार की निगरानी करने की अनुमति देती है।
भूषण ने कहा कि जिस तरह से टेलीफोन इंटरसेप्शन की अनुमति दी जा रही है, उसका मतलब है कि यह नियमित तरीके से किया जा रहा है। उन्होंने न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उक्त रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय गृह सचिव हर महीने लगभग 7,500 से अधिक फोन टैपिंग की अनुमति दे रहे हैं।
एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से आग्रह किया कि वह उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के तत्वावधान में एक समिति का गठन करें ताकि यह पता लगाया जा सके कि सरकार क्या कर रही है। उन्होंने कहा कि मौजूदा मामले में सरकार का यह जवाब तर्कहीन है कि सब कुछ कानून के अनुसार है।
उन्होंने कहा कि पेगासस सॉफ्टवेयर द्वारा कथित लक्षित निगरानी का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और तत्काल याचिका में यह मुद्दा फोन टैपिंग से अधिक है।
वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सभी निगरानी गतिविधियों को कानून के अनुसार और अपेक्षित अनुमति के साथ किया जा रहा है। यह जनहित का मुद्दा नहीं है। उन्होंने कहा कि वे मामले में शपथपत्र सहित विस्तृत जवाब दाखिल करेंगे। स्पष्ट किया कि याचिका में जो भी महत्वपूर्ण तथ्य है उनका जवाब जरूर दिया जाएगा।
केंद्र ने कहा है कि तीन निगरानी कार्यक्रमों के तहत किसी भी संदेश या सूचना के अवरोधन या निगरानी या डिक्रिप्शन के लिए किसी भी एजेंसी को कोई व्यापक अनुमति नहीं दी गई है।
सरकार ने निगरानी प्रणाली की आवश्यकता का बचाव करते हुए कहा कि ‘आतंकवाद, कट्टरता, साइबर अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी से देश के लिए गंभीर खतरों को कम या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए, तेजी से कार्रवाई योग्य खुफिया सूचनाओं के संग्रह के लिए एक मजबूत तंत्र होना जरूरी है।
वहीं याची ने कहा केंद्र को निगरानी परियोजनाओं, सीएमएस, नेत्रा और नेटग्रिड के निष्पादन और संचालन को स्थायी रूप से रोकने के लिए निर्देश दिए जाए, जो व्यक्तिगत डेटा के बड़े स्तर पर संग्रह और विश्लेषण की अनुमति देता है। याचिका के अनुसार सीएमएस एक निगरानी प्रणाली है जिसके तहत टेलीफोन कॉल, व्हाट्सएप संदेश और ई-मेल जैसे सभी प्रकार के संचार को रोक दिया जाता है और निगरानी की जाती है।
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मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल एवं न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने सरकार से आम लोगों की फोन टैपिंग, इंटरनेट व अन्य माध्यमों से निगरानी रखने संबंधी सभी कानूनों के बारे में विस्तृत रूप से शपथपत्र सहित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। पीठ ने यह जानकारी एक संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) की याचिका पर सुनवाई करते हुए मांगी। अदालत ने मामले की सुनवाई 30 सितंबर तय की है।
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याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि सरकार सामान्य निगरानी तंत्र के माध्यम से आम लोगों की निगरानी कर रही है और उसके बारे में पर्याप्त मात्रा में जानकारी एकत्र कर रही है। यह जानकारी फोन टैपिंग, इंटरनेट पर निगरानी रखकर, उनके कहीं दूसरे जगह यात्रा करने या दूसरे शहर में यात्रा करने आदि के माध्यम से एकत्रित की जा रही है।
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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि वे इसके लिए विशेष रूप से केंद्रीकृत निगरानी प्रणाली (सीएमएस), नेटवर्क और यातायात विश्लेषण और राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड का प्रयोग कर रहे हैं। ये निगरानी प्रणाली सरकार को मोबाइल फोन, लैंडलाइन और इंटरनेट के माध्यम से व्यक्तियों के संचार की निगरानी करने की अनुमति देती है।
भूषण ने कहा कि जिस तरह से टेलीफोन इंटरसेप्शन की अनुमति दी जा रही है, उसका मतलब है कि यह नियमित तरीके से किया जा रहा है। उन्होंने न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उक्त रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय गृह सचिव हर महीने लगभग 7,500 से अधिक फोन टैपिंग की अनुमति दे रहे हैं।
एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से आग्रह किया कि वह उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के तत्वावधान में एक समिति का गठन करें ताकि यह पता लगाया जा सके कि सरकार क्या कर रही है। उन्होंने कहा कि मौजूदा मामले में सरकार का यह जवाब तर्कहीन है कि सब कुछ कानून के अनुसार है।
उन्होंने कहा कि पेगासस सॉफ्टवेयर द्वारा कथित लक्षित निगरानी का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और तत्काल याचिका में यह मुद्दा फोन टैपिंग से अधिक है।
वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सभी निगरानी गतिविधियों को कानून के अनुसार और अपेक्षित अनुमति के साथ किया जा रहा है। यह जनहित का मुद्दा नहीं है। उन्होंने कहा कि वे मामले में शपथपत्र सहित विस्तृत जवाब दाखिल करेंगे। स्पष्ट किया कि याचिका में जो भी महत्वपूर्ण तथ्य है उनका जवाब जरूर दिया जाएगा।
केंद्र ने कहा है कि तीन निगरानी कार्यक्रमों के तहत किसी भी संदेश या सूचना के अवरोधन या निगरानी या डिक्रिप्शन के लिए किसी भी एजेंसी को कोई व्यापक अनुमति नहीं दी गई है।
सरकार ने निगरानी प्रणाली की आवश्यकता का बचाव करते हुए कहा कि ‘आतंकवाद, कट्टरता, साइबर अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी से देश के लिए गंभीर खतरों को कम या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए, तेजी से कार्रवाई योग्य खुफिया सूचनाओं के संग्रह के लिए एक मजबूत तंत्र होना जरूरी है।
वहीं याची ने कहा केंद्र को निगरानी परियोजनाओं, सीएमएस, नेत्रा और नेटग्रिड के निष्पादन और संचालन को स्थायी रूप से रोकने के लिए निर्देश दिए जाए, जो व्यक्तिगत डेटा के बड़े स्तर पर संग्रह और विश्लेषण की अनुमति देता है। याचिका के अनुसार सीएमएस एक निगरानी प्रणाली है जिसके तहत टेलीफोन कॉल, व्हाट्सएप संदेश और ई-मेल जैसे सभी प्रकार के संचार को रोक दिया जाता है और निगरानी की जाती है।