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दिल्ली दंगा: उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुनवाई, पुलिस व गवाहों के बयानों में विरोधाभास, 715 मामले में एक में भी नाम नहीं

Mon, 23 Aug 2021 06:17 PM IST
सुशील कुमार कुमार पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: सुशील कुमार कुमार Updated Mon, 23 Aug 2021 06:17 PM IST
सार

खालिद के साथ-साथ कई अन्य लोगों के खिलाफ सख्त आतंक रोधी कानून यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन पर फरवरी 2020 की हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप है।

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Hearing on Umar Khalid bail plea in Delhi riot case many contradictions in police claims told cooked up
उमर खालिद

विस्तार

दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी एवं जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद ने कहा कि पूरा मामला विरोधाभासी पूर्ण बयानों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ दर्ज साजिश की प्राथमिकी में एक भी ऐसा साक्ष्य नहीं है, जिसमें उन्होंने लोगों को भड़काया। इतना ही नहीं किसी भी प्राथमिकी में उनका नाम तक नहीं है। यह एक तैयार किया गया मामला है। खालिद ने अपनी जमानत पर उक्त तर्क रखा।

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खालिद के साथ-साथ कई अन्य लोगों के खिलाफ सख्त आतंक रोधी कानून यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन पर फरवरी 2020 की हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। दंगों में 53 लोग मारे गए थे और सैंकड़ों घायल हुए थे।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष खालिद की ओर से पेश अधिवक्ता त्रिदीप पाइस ने तर्क रखा कि एफआईआर को एक तरह से तैयार किया गया था और अनावश्यक रूप से उनके मुवक्किल को निशाना बनाने और फ्रेम करने के लिए चुनिंदा तथ्यों का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा कि पुलिस के दावों में कई विरोधाभास हैं और इसे तैयार किया गया मामला कहा जाता है।
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उन्होंने दिल्ली पुलिस के दावों में दो विरोधाभासों की ओर इशारा किया करते हुए अदालत को महाराष्ट्र में खालिद के भाषण की 21 मिनट की वीडियो क्लिप दिखाई, जिसे अभियोजन पक्ष ने कथित तौर पर भड़काऊ करार दिया था। उन्होंने अदालत से कहा कि वीडियो देखने से स्पष्ट है कि उनके मुवक्किल ने भाषण के माध्यम से हिंसा का कोई आह्वान नहीं किया और वास्तव में लोगों को एकता का संदेश दिया। 

उन्होंने कहा कि उस दिन उमर खालिद ने गांधी जी पर आधारित एकता का संदेश दिया था और पुलिस ने इसे आतंकी करार दिया। वीडियों को सुनने से स्पष्ट है कि इसमें सामग्री देशद्रोही वाली नहीं है। वह लोकतांत्रिक शक्ति की बात कर रहे हैं, उसने गांधी का जिक्र किया है।

उन्होंने कहा दूसरी तरफ पुलिस मामले के अनुसार खालिद ने 8 जनवरी को अन्य आरोपियों के साथ मिलकर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान दंगे की साजिश रची थी। यह अलग बात है कि राष्ट्रपति के दौरे की खबर फरवरी में ही घोषित हुई थी। ऐसे में राष्ट्रपति के दौरे की घोषणा से पूर्व ही उनक मुवक्किल कैसे दंगो की साजिश रख सकता है, यह गोपनीय दौरा होता है। स्पष्ट है कि ये झूठ की तरह नगण्य हैं, यह एक मजाक है।

उन्होंने कहा यह एफआईआर एक पकी हुई यानि पहले से तैयार थ्योरी है। क्या लोगों पर मुकदमा चलाना इतना आसान है? क्या अभियोजन के रूप में आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर फंसाया गया है। पुलिस ने दंगो के मामले में 715 मामले दर्ज किए हैं, लेकिन एक भी मामले में उनके मुवक्किल का नाम तक नहीं है।

उन्होंने अदालत से कहा कि यूएपीए एफआईआर अनावश्यक है और सीएए के विरोध के आधार पर लोगों को चुनिंदा निशाना बनाने के लिए इसका मसौदा तैयार किया गया है और अदालत में दायर किया गया है। पाइस ने अदालत को बताया कि दंगों की प्रत्येक प्राथमिकी में एक संज्ञेय अपराध का खुलासा किया गया है, हालांकि मौजूदा एफआईआर में ऐसी कोई बात नहीं है।

उन्होंने कहा कि आरोपपत्र को फर्जी तरीके से बनाया गया है और चुनिंदा गवाहों को उनके मुवक्किल के खिलाफ बोलने के लिए तैयार किया गया है। यह एफआईआर खोखली है और इसमें हास्यास्पद बयान दिए गए हैं। ऐसे में उनके मुवक्किल की जमानत स्वीकार की जाय। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर तय की है।

दिल्ली पुलिस ने हाल ही में जमानत आवेदन पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि वर्तमान में याचिका स्वीकार योग्य नहीं है। उन्होंने आरोपपत्र का हवाला देते हुए कहा था कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य सामने आए हैं।

अप्रैल में जेएनयू के पूर्व छात्र को दंगे के एक मामले में जमानत दे दी गई थी। अदालत ने उसे जमानत देते समय कहा था कि आरोपी घटना की तारीख को घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। उनके अलावा जेएनयू की छात्राएं नताशा नरवाल और देवांगना कलिता, जामिया समन्वय समिति के सदस्य सफूरा जरगर, आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और कई अन्य लोगों पर भी इस मामले में कड़े कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है।

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