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Corona Side effects : बेटियों की मजबूरी, स्मार्टफोन के भरोसे शिक्षा अधूरी

Fri, 27 May 2022 06:43 AM IST
दुष्यंत शर्मा परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 27 May 2022 06:43 AM IST
सार

कोरोना के कारण स्कूल बंद थे, किसी के घर नहीं था फोन तो किसी के पिता-भाई ने देने से किया इनकार। ऐसे में इन घरों के बच्चे पढ़ाई जारी नहीं रख सके, जिनमें बेटियों की संख्या अधिक है। कुछ परिवारों ने तो पढ़ाई छुड़वाकर बच्चियों का पैतृक गांव ले जाकर ब्याह कर दिया।

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 education incomplete on the basis of smartphone The daughters of most of the lower class families were left behind
जद्दोजहद... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लॉकडाउन के बाद शैक्षणिक संस्थान बंद होने से बेशक ऑनलाइन शिक्षा की रफ्तार तेज हुई, लेकिन अधिकांश निम्न वर्गीय परिवारों की बेटियां पिछड़ गईं। किसी के घर में स्मार्टफोन नहीं था तो किसी के पिता-भाई ने देने से इंकार कर दिया। ऐसे में इन घरों के बच्चे पढ़ाई जारी नहीं रख सके, जिनमें बेटियों की संख्या अधिक है। कुछ परिवारों ने तो पढ़ाई छुड़वाकर बच्चियों का पैतृक गांव ले जाकर ब्याह कर दिया।

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ऐसी कई कहानियां दिल्ली के मोहन गार्डन, उत्तम नगर, जेजे और यमुना खादर में हैं। बच्चों की शिक्षा को लेकर 2021 में जब सर्वे हुआ तो पता चला कि आठ से 14 साल के 90 फीसदी बच्चे ग्रेड 2 लेवल का एग्जाम पास नहीं कर सके। मोहन गार्डन निवासी अनीता (बदला हुआ नाम) ने स्वीकारा कि लॉकडाउन हटने के बाद अक्तूबर 2020 में बिहार के आरा जिला स्थित अपने गांव पहुंचीं और बेटी का ब्याह कर दिया। उन्होंने बताया, घर में सिर्फ तीन लोग हैं। 
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पति ने नौकरी पर जाना छोड़ दिया। वह साफ सफाई का काम करती हैं, लेकिन कोरोना के कारण वह भी बंद हो गया। एक एनजीओ संचालक विवेक सचदेवा बताते हैं, चार अलग-अलग एनजीओ ने मिलकर एक सर्वे किया, जिसमें बच्चों की पढ़ाई के बारे में जांच की गई थी, लेकिन सर्वे में 10 में से नौ बच्चे ग्रेड 2 लेवल तक नहीं पहुंच पाए। वहीं, प्रोत्साहन इंडिया की सीईओ सोनल कपूर का कहना है कि निम्न वर्गीय परिवारों के बच्चे खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा काफी प्रभावित हुई हैं। कोई बाल विवाह तो कोई घरेलू हिंसा की शिकार हुईं। कई लड़कियों की पढ़ाई छूट गई और उन्हें मजदूरी पर जाना पड़ा।
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यहां गरीबी नहीं, लेकिन बच्चे ठीक भी नहींः  नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के ताजा अध्ययन में पता चला है कि मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से मोटापा, मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, सोशल मीडिया की लत, भूख न लगना, नींद न आना जैसी परेशानियों हो रही हैं। वहीं निम्न वर्गीय परिवारों के बच्चे तकनीक के अभाव में शिक्षा से पिछड़ रहे हैं।

कहां से लाती बेटी के लिए स्मार्टफोन...
एक महिला ने कहा, साहब... आपके सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं है। बेटी ने बताया था कि ऑनलाइन क्लास के लिए फोन चाहिए। वह जिन घरों में काम करती हैं वहां से मदद के तौर पर 10 हजार रुपये लाई थीं, लेकिन रात में ही बेटे ने सभी पैसे चुरा लिए ऐसे में वह चाहकर भी बेटी को फोन नहीं दिला पाईं। बेटा नशा और जुए में पूरी रकम उड़ा गया। नवंबर 2020 में बेटी का ब्याह कर दिया।

हर बच्चे पर पड़ा तकनीक का असर
दिल्ली एम्स के बिहेवियरल एडिक्शन सेंटर के प्रभारी डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा बताते हैं, तकनीक का असर हर बच्चे पर पड़ा है। कई बच्चे उनके यहां तकनीक की लत के चलते इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। हर सप्ताह ऐसे तीन से चार मामले दर्ज हो रहे हैं। जबकि इसी तकनीक का इस्तेमाल न कर पाने की वजह से कई परिवारों के बच्चे मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे।


बच्चों का बजट नहीं रहा खास

  • साल 2021-22 में कुल बजट का 2.46 फीसदी बच्चों के लिए था, जो 2022-23 में 2.35 फीसदी आवंटित हुआ
  • 2021-22 की तुलना में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट 7.56 फीसदी कम आवंटित
  • बच्चों के लिए सक्षम व पोषण 2.0 योजना के बजट में 2022-23 के दौरान 11.28 फीसदी की कमी
  • महामारी के बीच प्रवासी पलायन के बावजूद मनरेगा का बजट इस साल 98 से 73 हजार करोड़ रहा


दिल्ली में पॉक्सो के मामले बढ़े

  • दिल्ली पुलिस के अनुसार साल 2020 में 850 मामले पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज हुए, जिनमें 990 यानी लगभग 95 फीसदी मामले कोर्ट तक पहुंचे
  • 2021 में पॉस्को एक्ट के तहत एक हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें अधिकांश पीड़ित बच्चियां और किशोरियां हैं
  • बाल कल्याण समिति के अनुसार अधिकांश मामलों में बच्चों की कम जागरूकता और इंटरनेट का इस्तेमाल शामिल है। बच्चों और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते आपराधिक मामलों में प्रवासी आबादी, आर्थिक तंगी जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं
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